रविवार, 19 सितंबर 2010

आशानुकूल रही रिजर्व बैंक की दरों में वृध्दि

भारतीय रिजर्व बैंक ने मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही की मौद्रिकनीति की समीक्षा के बाद प्रमुख दरों में एक बार फिर वृध्दि की है । दरों में इस वर्ष यह चौथी वृध्दि है । रिजर्व बैंक ने रिपो दर में 25 अंकों अर्थात चौथाई प्रतिशत की वृध्दि की है । अब यह दर 5.57 प्रतिशत हो गई है । इसी प्रकार रिवर्स रिपो दर में 50 अंकों की यानी आधा प्रतिशत की बढोतरी की गई है । यह दर अब 4.5 प्रतिशत हो गई है । रिपो दर वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को त्रऽण देता है और रिवर्स रिपो दर वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों से कर्ज लेता है ।
दोनों दरों में वृध्दि से बाजार में तरलता में कमी आएगी , क्योंकि वाणिज्यिक बैंकों को रिजर्व बैंक से त्रऽण वापस लेने के लिये ज्यादा पैसे चुकाने होंगे । इससे बैंकों को अपना पैसा रिजर्व बैंक के पास जमा रखने को प्रोत्साहन मिलता है, क्योंकि जमा धन पर अधिक लाभ (ब्याज) मिलता है । इस प्रकार न्यूनतम दरों में वृध्दि से बाजार में नकदी के प्रवाह में कमी आएगी और उसे बाहर निकालने के प्रयास में तेजी आएगी । उद्देश्य यह है कि मुद्रास्फीति पर मांग का दबाव कम हो, जो पिछले पांच महीनों से लगातार दहाई अंकों में बनी हुई है और जो सरकार के लिये चिंता का विषय बनी हुई है । जून में मुद्रास्फीति की दर 10.55 प्रतिशत थी ।
नई दरों से मुद्रास्फीति से सख्ती से निपटने और स्थायी विकास के अनुकूल वातावरण के निर्माण के बारे में सरकार के संकल्प का आभास होता है । नई दर आशानुरुप ही हैं । रिजर्व बैंक की समीक्षा से पहले ही अनुमान लगाया जा रहा था कि मुख्य दरों में 25 अंकों की वृध्दि की जा सकती है परन्तु रिवर्स रिपो दर में आधा प्रतिशत की वृध्दि आशा से कुछ अधिक है । आरबीआई ने दरों में कोई ज्यादा वृध्दि नहीं की, इससे यह पता चलता है कि केन्द्रीय बैंक विकास प्रक्रिया को किसी भी प्रकार से प्रभावित किये बिना बाजार में नकदी के प्रवाह को रोकने के लिये धीरे-धीरे सोच समझकर कदम उठा रहा है । ब्याज दरों में अधिक वृध्दि से आर्थिक सुधार की प्रक्रिया तो प्रभावित होती ही साथ ही बैंकिंग प्रणाली में नकदी की समस्या भी आ सकती थी ।
अधिसूचित बैंकों द्वारा रिजर्व बैंक में अनिवार्य रूप से जमा की जाने वाली राशि के अनुपात सी आर आर में कोई घट बढ न क़रते हुए केन्द्रीय बैंक ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि उसकी नीति पिछले दो वर्षों की वैश्विक मंदी के प्रभाव से ऊपर रही अर्थव्यवस्था से किसी भी प्रकार की छेडछाड़ नहीं करने की है । साधारणत: अर्थशास्त्रियों का विश्वास है कि प्रमुख दरों में हालिया मामूली वृध्दि से बैंको की त्रऽण दरों में वृध्दि नहीं होगी क्योंकि बैंक इतनी वृध्दि तो मान कर ही चल रहे थे । कुछ अर्थशास्त्रियों का विश्वास है कि इससे बैंकों की त्रऽण दरों में मामूली वृध्दि होगी । आर बी आई ने स्पष्ट संकेत दिये है कि वह जमा और उधार दोनों ही दरों में वृध्दि देखना चाहता है ताकि जहां एक ओर बैंकों से कर्ज लेना थोड़ा मंहगा हो वहीं बैंकों में लोगों की जमा राशि में वृध्दि भी हो ।
रिजर्व बैंक की तिमाही समीक्षा से दो और बातें साफ होती हैं । इसने मौजूदा वित्त वर्ष में विकास दर का लक्ष्य 8 से बढाक़र 8.5 प्रतिशत कर दिया है, वहीं आशा जताई है कि मार्च 2011 तक मुद्रास्फीति की दर 5.5 से 6 प्रतिशत के आसपास रहेगी । वित्त मंत्रालय को भी आशा है कि अच्छे मानसून की संभावना को देखते हुए मुद्रास्फीति दिसम्बर तक कम होकर 6 प्रतिशत रह जाएगी ।
मुद्रास्फीति में इन दिनों जो बढोतरी हो रही है, वह मुख्यत: पिछले वर्ष अच्छी वर्षा न होने के कारण ही है । वर्षा के अभाव में देश में प्राय: सभी कृषि उत्पादनों में कमी आई जिससे खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति में वृध्दि हुई । खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति शैन: शनै:-शनै: अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित करने लगी और थोक मूल्य सूचकांक में वृध्दि के साथ ही स्थिति संकट पूर्ण होने लगी ।
रिजर्व बैंक का कहना है कि मुद्रास्फीति का दबाव बढ रहा है और इस पर मांग का दबाव स्पष्ट दिखाई देता है, जिससे मंहगाई आम हो गई है । बैंक का कहना है कि मुद्रास्फीति के विस्तार और उसके बने रहने के स्वभाव को देखते हुए मांग पक्ष की मुद्रास्फीति के दबाव को काबू में करना होगा ।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का कहना है कि आरबीआई की नीति से पहले से ही कम हो रही मुद्रास्फीति में और भी कमी आएगी । उनका विचार है कि इससे हम विकास के रास्ते पर भी भलीभांति बने रहेंगे । आरबीआई की मौद्रिक नीति इस दिशा में उठाया गया सोचा समझा कदम है ।
परन्तु सच्चाई यह है कि ब्याज दरों में वृध्दि केवल मांग पक्ष की मुद्रास्फीति को काबू में कर सकती है, जो कि समस्या का केवल एक अंश है । मुद्रास्फीति पर प्रभावी नियंत्रण के लिये हमें विशेष तौर पर खाद्यान्न उत्पादन बढाने के साथ-साथ आपूर्ति पक्ष के दबावों में भी कमी लानी होगी। इसके लिये हमें मुख्यत: इंद्र देव की कृपा का ही आसरा होता है । दीर्घकालिक दृष्टि से कृषि पर और गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।
इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह ने हाल ही में हुई राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में राज्य सरकारों से कृषि क्षेत्र पर और अधिक ध्यान देने का आग्रह किया ताकि मंहगाई पर प्रभावी रोक लगाई जा सके । कृषि चूंकि राज्यों का विषय है, इस विषय पर उन्हें ही अधिक ध्यान देना होगा । उन पर यह बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है । यद्यपि सफल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर में कृषि का योगदान मात्र 18 से 20 प्रतिशत ही है, तथापि अपने देशव्यापी विस्तार और अपनी गतिविधियों से देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या को प्रभावित करने के कारण इसकी भूमिका निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है ।
कृषि क्षेत्र पर अधिक ध्यान देना और ढीली-ढाली मौद्रिक नीति से योनजाबध्द ढंग से बाहर आना, देश में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के महत्वपूर्ण सूत्र हैं । आपूर्ति पक्ष के अभावों पर भी और तेजी से ध्यान देने की जरूरत है ।
जैसा कि अन्य देशों के केन्द्रीय बैंकों द्वारा किया जाता है, आर बी आई ने भी अपनी मध्यावधि समीक्षाओं से चौंकाने वाला तत्व समाप्त करने का निर्णय लिया है । ये समीक्षायें तिमाही समीक्षाओं के डेढ महीने बाद की जाया करेंगी ताकि आवश्यकतानुसार बीच रास्ते ही सुधार किया जा सके । इससे अर्थव्यवस्था को मौजूदा स्थिति को समझने और तदनुसार कदम उठाने में मदद मिलेगी ।

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