बुधवार, 22 दिसंबर 2010

नीलगिरि का जनजातीय हस्‍तशिल्‍प

नीलगिरि अथवा ब्‍ल्‍यू माउंटेन का नाम जितना काव्‍यात्‍मक है, वह एक स्‍थान के रूप में भी वैसा ही है । तमिलनाडु के नीलगिरि जिले में टोडा, कोटा, कुरूम्‍बा, इरूला, पनियान और कट्टूनइक्‍कन जनजातियां रहती हैं । भारत सरकार ने इन छ: जनजातियों की प्राथमिक जनजातीय समूहों के रूप में पहचान की है । युगों-युगों से नीले पहाड़ों के जंगल उनके घर रहे हैं । सुंदर परिवेश में रहने के कारण ही वे उतने ही सुंदर हस्‍तशिल्‍पों के रचनाकार बने ।

इन छ: समूहों में टोडा जनजाति के लोग कसीदा संबंधी अपने कार्यों के लिए मशहूर हैं । टोडा जनजाति की महिलाएं कसीदाकारी में दक्ष होती हैं । उनका पारंपरिक परिधान मोटे -उजले सूती कपड़े से बना होता है और उस पर लाल, काली अथवा नीली पट्टी लगी होती है, जिस पर हाथ से कसीदा किया जाता है । कसीदाकारी में ऊनी अथवा सूती धागे का इस्‍तेमाल किया जाता है । आधुनिक आवश्‍यकताओं के अनुसार सेल फोन की थैली, टेबल क्‍लाथ, स्‍कार्फ और शॉल, स्‍कर्ट और टॉप, पर्स और बैग, फ्रॉक आदि भी बनाए जाते हैं । अम्‍बेडकर हस्‍तशिल्‍प विकास योजना के अधीन यह संभव हो पाया है । कई महिला स्‍व-सहायता समूह बनाए गए हैं, जिन्‍हें मिलाकर एक संघ बना दिया गया है । हालांकि टोडा जनजाति के लोग भैंसों का झुंड रखते थे और दूध के उत्‍पादों का व्‍यापार करते थे, किंतु कालांतर में भूमि के इस्‍तेमाल में आए बदलावों के कारण वे इससे वंचित हो गए । हालांकि उनका बेजोड़ हस्‍तशिल्‍प का आस्‍तित्‍व समय के साथ कायम रहा ।

कोटा जनजाति के लोग सात बस्‍तियों में रहते है जिन्‍हें आमतौर पर कोटागिरी या कोकल कहा जाता है । गांव के ये शिल्‍पकार बढ़ईगिरी, लुहार और मिट्टी के बर्तन बनाने का काम अच्‍छी तरह कर लेते हैं । समय बदलने के साथ सिर्फ कुछ ही परिवार ऐसे हैं जो इन कौशलों पर निर्भर हैं। ये पट्टा भूमि के छोटे टुकड़ों पर खेती करके अपना जीवन बसर करते हैं ।

कुरुम्‍बा जनजाति के लोग बांस की टोकरियां बनाने तथा बांस से संबंधित अन्‍य कार्यों में निपुण हैं । कुरूम्‍बा जनजाति के लोगों का पारंपरिक कार्य, शहद और वनों में उत्‍पन्‍न अन्‍य चीजों को एकत्र करना है । ये जड़ी-बूटियों से औषधियां बनाने और पारंपरिक चीजों से उपचार करने में भी माहिर हैं । अब ये ज्‍यादातर खेती बाड़ी ही करते हैं और जिनके पास अपनी भूमि नहीं है वो यदा-कदा कृषि मजदूर की तरह काम करते हैं।

अन्‍य तीन समूह – इरूला, पनियान और कट्टूनइक्‍कन की दस्‍तकारी में कोई पारंपरिक विरासत नहीं है । ये आमतौर पर खाद्य पदार्थों या वन में उत्‍पन्‍न चीजों को एकत्रित करते हैं । अब ये कृषि क्षेत्र में अस्‍थायी मजदूरों के रूप में कार्य कर रहे हैं ।

2001 की गणना के अनुसार तमिलनाडु में कुल लगभग 651321 आदिवासी हैं जो कि कुल जनसंख्‍या का 1.02 प्रतिशत हैं । तमिलनाडु में 36 जनजातियां और उपजातियां हैं। लगभग हर जिले में इनकी उपस्‍थिति है और वन प्रबंध में इनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है ।

इन समूहों में साक्षरता की दर 27.9 प्रतिशत है । राज्‍य में ज्‍यादातर जनजातियां जीविका के लिए खेती बाड़ी तथा कृषि मजदूर के रूप में काम करती हैं या वे अपनी आजीविका के लिए वनों पर भी निर्भर रहती हैं । सिर्फ इन 6 समूहों को ही प्राचीन जनजाति का दर्जा दिया गया है ।

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