सोमवार, 7 मार्च 2016

गुरूत्‍वाकर्षी लहरें : आइंस्‍टीन की विरासत

एल्‍बर्ट आइंस्‍टीन के सापेक्षता सिद्धांत की अंतिम भविष्‍यवाणी गुरूत्‍वाकर्षी लहरें हैं। गुरूत्‍वाकर्षी लहरों की पहली बार पहचान करने की घोषणा 11 फरवरी को एडवान्‍स्ड लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्‍जरवेट्री (एलआईजीओ) ने की थी। एलआईजीओ के दो विशाल डिटेक्‍टर हैं। पहला डिटेक्‍टर लिविंगस्‍टोन, लुइसियाना में है और दूसरा हैनफोर्ड, वाशिंगटन में है। इस नई खोज ने भौतिकी में तीन मील के पत्‍थर स्‍थापित किए- 1. गुरूत्‍वाकर्षी लहरों की सीधी पहचान 2. बाइनेरी ब्‍लैकहोल प्रणाली की पहली पहचान 3. आइंस्‍टीन के सिद्धांत द्वारा प्रतिपादित की ब्‍लैकहोल पदार्थ हैं, उनके बारे में प्रत्‍यक्ष प्रमाण न्‍यूटन के भौतिक सिद्धांतों के अनुसार गुरूत्‍वाकर्षण एक ऐसा बल है, जो दो पदार्थों को एक-दूसरे की तरफ खींचता है। आइंस्‍टीन ने 1915 में सापेक्षता सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए गुरूत्‍वाकर्षण के बारे में एक नई अवधारणा पेश की थी। एलआईजीओ ने दो ब्‍लैकहोलों से गुरूत्‍वाकर्षी लहरों के संकेतों का पता लगाया था। यह लहरें प्रकाश गति से संबंधित हैं, जबकि गुरूत्‍वाकर्षण की न्‍यूटन अवधारणा अनन्‍त गति का प्रतिपादन करती है। गुरूत्‍वाकर्षी लहरों के संबंध में भारत का भी बहुत योगदान है। पिछले दो दशकों के दौरान भारतीय वैज्ञानिक समुदाय गुरूत्‍वाकर्षी लहरों पर काम कर रहा था। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने गुरूत्‍वाकर्षी लहरों का पता लगाने वाले दल में शामिल भारतीय वैज्ञानिकों की प्रशंसा की है। उन्‍होंने इस संबंध में ट्वीट करते हुए कहा, ‘गुरूत्‍वाकर्षी लहरों का पता लगाने वाला ऐतिहासिक कार्य ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बढ़ाएगा। मुझे आशा है कि इस दिशा में हम बड़ा योगदान करेंगे।’ इस खोज से गुरूत्‍वाकर्षी लहर खगोलशास्‍त्र के एक नए युग की शुरूआत हुई है और इससे हमें ब्रह्मांड के उत्‍पन्‍न होने संबंधी बुनियादी सवालों का हल मिल सकता है।

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