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बुधवार, 25 मार्च 2015

दिल्ली पुलिस, एफआईआर और बंदर

दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है, जो अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं है। दिल्ली पुलिस की एफआईआर डायरी में दर्ज इस आरोपी का नाम सुनकर आप हैरान-परेशान रह जाएंगे। जानकारों की माने तो दिल्ली पुलिस ने इस बार गुनाह का इल्जाम जिसके नाम दर्ज किया है वह इंसान की तरह बोल नहीं सकता। वह इंसान की भाषा समझ नहीं सकता। ना ही इंसान उसकी भाषा समझ सकते हैं। क्योंकि दिल्ली पुलिस का ये नया नवेला आरोपी बंदरों का एक झुंड है। अब आप कहेंगे कि देश की सबसे स्मार्ट माने जाने वाली दिल्ली पुलिस को आखिर क्या हो गया है कि वह अब बंदरों के नाम से भी एफआईआर दर्ज करने लगी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि बंदर के अक्ल की तरह पुलिस के कुछ तथाकथित समझदार और तेजतर्रार अफसर और जवान दिल्ली पुलिस की बची-खुची इमेज को भी ठिकाने लगाने की तैयारी कर चुके हैं। अगर ऐसा नहीं है तो दिल्ली पुलिस अक्ल और शक्ल के मामले में बंदरों के साथ मुकाबला क्यों कर रही है। अगर उसे सही मायने में दिल्ली की चिंता है तो वह अपराधियों पर नकेल कसने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा रही। दिल्ली के गुनहगारों को सलाखों के पीछे भेजने के बजाए दिल्ली पुलिस बंदरों के पीछे हाथ धोकर क्यों पड़ी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दिल्ली की दिनोंदिन बिगड़ती कानून व्यवस्था के लिए बंदर जिम्मेदार है। काश बंदर अगर इंसान की भाषा बोल पाते तो यहीं कहते कि दिल्ली पुलिस मुझे तो बक्श दो। आइए अब आपको बताते है कि असल में पूरा मामला है क्या और क्यों हम दिल्ली की स्मार्ट पुलिस को सवालों के घेरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली के पांडव नगर थाने के समझदार पुलिस अफसरों ने एक ऐसा मुकदमा दर्ज किया है, जिसमें इलाके के बंदरों को आरोपी बनाया गया है। शायद देश में यह अपनी तरह का पहला मामला होगा, जिसमें आरोप किसी इंसान पर नहीं बल्कि बंदर पर लगाया गया है। मयूर विहार फेज-2 में रहने वाले अरविंद जब रोजाना की तरह सुबह अपने ऑफिस जाने के लिए घर से निकले तो रास्ते में बंदरों के झुंड ने उन पर हमला कर दिया। इलाके के लोगों ने बंदरों के चंगुल से अरविंद को छुड़ाने की पूरी कोशिश की। लेकिन बदमाश बंदरों ने अरविंदों को जगह जगह काटकर बुरी तरह जख्मी कर दिया। पांडव नगर और उसके आसपास के इलाकों में बंदरों के उत्पात मचाने की यह कोई पहली कहानी नहीं है। इलाके की जनता पिछले काफी समय से बंदरों को लेकर परेशान है। लेकिन एमसीडी के अधिकारी कान में तेल डालकर सोने की अपनी वर्षों पुरानी नीति पर आज भी कायम है। लिहाजा बंदरों के इस उत्पात को लेकर अरविंद पुलिस के पास एमसीडी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने थान पहुंचे। लेकिन स्मार्ट दिल्ली पुलिस के समझदार अफसर ने बिना कुछ सोचे समझे एफआईआर दर्ज कर ली और वह भी इलाके के बंदरों के खिलाफ। जी हां दिल्ली पुलिस ने इलाके के बंदरों को ही इस मामले में आरोपी बना दिया। हद तो तब हो गई जब इस एफआईआर में पुलिसवालों ने इलाके के बंदरों पर भारतीय दंड संहिता यानि आईपीसी की धारा 124 भी लगा दी। यानि पांडव नगर के बंदरों ने अरविंद के साथ मार-पीट की और किसी घातक हथियार से उन्हें घायल कर दिया। कानून के मुताबिक IPC की धारा 324 के तहत दोषी साबित होने पर 3 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन क्या दिल्ली पुलिस इस मामले में किसी बंदर को वाकई में पहचानती है। क्या वह आरोपी बंदर को पकड़ पाएगी। क्या ऐसे मामले में बंदर को आरोपी बनाया जा सकता है। आमतौर पर ऐसे मामले में दिल्ली नगर निगम या उसके संबंधित अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज किया जाता है। लेकिन दिल्ली पुलिस ने एमसीडी या उसके अधिकारियों को आरोपी क्यों नहीं बनाया। क्या दिल्ली पुलिस और एमसीडी के अफसरों के बीच कोई सांठगांठ है? क्या दिल्ली पुलिस एमसीडी से डरती है? क्या दिल्ली पुलिस को ऐसे मामले में किसे आरोपी बनाया जाता है इसका पता नहीं है? अगर ऐसा है तो वाकई में दिल्ली पुलिस के अफसरों और जवानों को सख्त ट्रेनिंग देने की ज़रुरत है। क्योंकि सवाल देश की राजधानी दिल्ली की सुरक्षा का है। ...

सोमवार, 23 मार्च 2015

राष्ट्रीय सेवा योजना एक अनोखी शुरुआत

राष्‍ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) एक केंद्र प्रायोजित योजना है। इस योजना की शुरूआत 1969 में की गई थी और इसका प्राथमिक उद्देश्‍य स्‍वैच्छिक सामुदायिक सेवा के जरिये युवा छात्रों का व्‍यक्तित्‍व एवं चरित्र निर्माण था। एनएसएस की वैचारिक अनुस्‍थापना महात्‍मा गांधी के आदर्शों से प्रेरित है और इसका आदर्श वाक्‍य ''मैं नहीं, लेकिन आप'' हैं। एनएसएस को उच्‍चतर माध्‍यमिक स्‍कूलों, कॉलेजों एवं विश्‍वविद्यायल में कार्यान्वित किया जा रहा है। एनएसएस की परिकल्‍पना में इस बात पर ध्‍यान दिया गया है कि इस योजना के दायरे में आने वाले प्रत्‍येक शैक्षिक संस्‍थान में एनएसएस की कम से कम एक इकाई हो और उसमें सामान्‍यत: 100 छात्र स्‍वयंसेवक हों। इस इकाई की अगुवाई एक शिक्षक करता है जिसे कार्यक्रम अधिकारी का दर्जा दिया जाता है। प्रत्‍येक एनएसएस की इकाई एक गांव अथवा मलिन बस्‍ती (स्‍लम) को गोद लेती है। एक एनएसएस कार्यकर्ता को निम्‍न कार्य अथवा गतिविधियों को पूरा करना होता है। ·नियमित एनएसएस गतिविधि – प्रत्‍येक एनएसएस स्‍वयंसेवक को सामुदायिक सेवा के लिए दो वर्षों की अवधि में प्रतिवर्ष न्‍यूनतम 120 घंटे और दो वर्षों में 240 घंटे काम करना होता है। इस कार्य को अध्‍ययन की अवधि समाप्‍त होने अथवा सप्‍ताहांत के दौरान किया जाना है और एनएसएस की स्‍कूल/कॉलेज इकाई जिन गांवों अथवा स्‍लम को गोद लेती है वहां जाकर यह छात्र अपनी गतिविधियों को पूरा करते हैं। ·विशेष शिविर कार्यक्रम- प्रत्‍येक एनएसएस इकाई जिन गांवों और शहरी स्‍लम बस्तियों को गोद लेती है वहां के स्‍थानीय समुदायों को शामिल करके कुछ विशेष परियोजनाओं के लिए सात दिन का विशेष शिविर आयोजित करती है। यह शिविर छात्रों की अवकाश अवधि के दौरान भी आयोजित किया जाता है। प्रत्‍येक छात्र स्‍वयंसेवक को दो वर्ष की अवधि में कम से कम एक बार इस तरह के विशेष शिविर में हिस्‍सा लेना जरूरी है। एनएसएस के तहत गतिविधियों का ब्‍यौरा- संक्षेप में एनएसएस कार्यकर्ता सामाजिक प्रासंगिकता से जुड़े विभिन्‍न मुद्दों पर कार्य करते हैं। जिसके जरिये समुदाय की आवश्‍यकताओं की प्रतिक्रिया हासिल की जाती है। यह गतिविधियां नियमित एवं विशेष शिविर गतिविधियों के रूप में होती हैं। ऐसे विषयों में (1) साक्षरता एवं शिक्षा (2) स्‍वास्‍थ्‍य, परिवार कल्‍याण एवं पोषण (3) पर्यावरण संरक्षण (4) सामाजिक सेवा कार्यक्रम (5) महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम (6) आर्थिक विकासात्‍मक गतिविधियों से जुडे कार्यक्रम (7) प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत एवं बचाव कार्यक्रम आदि, शामिल हैं। प्रशासनिक ढांचा- एनएसएस को केंद्र एवं राज्‍यों द्वारा संयुक्‍त रूप से कार्यान्वित किया जा रहा है। केंद्रीय स्‍तर पर एनएसएस का कार्यान्‍वयन, एनएसएस संगठन के जरिये किया जाता है जो युवा मामलों के विभाग से सम्‍बद्ध कार्यालय है। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर एनएसएस का एक कार्यक्रम सलाहकार प्रकोष्‍ठ और क्षेत्रीय स्‍तर पर 15 क्षेत्रीय कार्यालय हैं। राज्‍यों/संघ शासित प्रदेशों में राज्‍य सरकार के विभागों में से एक विभाग को एनएसएस की गतिविधियों का संचालन करने का जिम्‍मा सौंपा जाता है। इस विभाग के पास एक राज्‍य एनएसस प्रकोष्‍ठ और एनएसएस के लिए एक राज्‍य जन संपर्क अधिकारी होता है। एनएसएस की विभिन्‍न गतिविधियों के लिए केंद्र सरकार, राज्‍यों को धनराशि जारी करती है जहां से इसे अन्‍य कार्यान्‍वयन एजेंसियों को आवंटित किया जाता है। राज्‍य स्‍तर से नीचे एनएसएस का प्रशासनिक ढांचा इस प्रकार है। ·विश्‍वविद्यालय/+2 परिषद स्‍तर पर- प्रत्‍येक विश्‍वविद्यालय में एक एनएसएस प्रकोष्‍ठ और एक मनोनीत कार्यक्रम समन्‍वयक की व्‍यवस्‍था है जो विश्‍वविद्यालय एवं उससे सम्‍बद्ध कॉलेजों में एनएसएस की सभी इकाईयों में उससे जुडी गतिविधियों के समन्‍वय का कार्य करती हैं। इसी प्रकार वरिष्‍ठ माध्‍यमिक स्‍कूलों में एनएसएस प्रकोष्‍ठ, वरिष्‍ठ माध्‍यमिक शिक्षा निदेशालय में होता है। ·एनएसएस इकाई स्‍तर पर: प्रत्‍येक शिक्षण संस्‍थान में प्रत्‍येक एनएसएस प्रकोष्‍ठ का नेतृत्‍व एक शिक्षक करता है जिसे कार्यक्रम अधिकारी (पीओ) का दर्जा दिया जाता है। इसके अलावा राष्‍ट्रीय, राज्‍य, विश्‍वविद्यालय और शिक्षण संस्‍थानों के स्‍तर पर एनएसएस सलाहकार समितियां होती हैं जिनमे अधिकारी एवं गैर अधिकारी सदस्‍य होते हैं और यह एनएसएस संबंधी गतिविधियों को आवश्‍यक निर्देश प्रदान करते हैं। इनके अतिरिक्‍त कार्यक्रम अधिकारियों को प्रशिक्षण देने के लिए विभिन्‍न कॉलेजों/ विश्‍वविद्यालयों में 19 पैनल प्रशिक्षण संस्‍थान ईटीआई भी हैं। वित्‍तीय व्‍यवस्‍था- यह स्थिति इस प्रकार है ·एनएसएस के तहत प्रमुख गतिविधियों की वित्‍तीय व्‍यवस्‍था- एनएसएस की गतिविधियों के लिए प्रत्‍येक स्‍वयंसेवक को ढाई सौ रूपये प्रतिवर्ष (नियमि‍त गतिविधियों के लिए) और साढे चार सौ रूपये (दो वर्ष में एक बार) विशेष शिविर गतिविधियों के लिए प्रदान किए जाते हैं। इस प्रकार एनएसएस कार्यक्रम की कुल लागत 475 रूपये प्रति कार्यकर्ता प्रति वर्ष है (क्‍योंकि किसी विशेष वर्ष में विशेष शिविर अभियान में केवल 50 प्रतिशत कार्यकर्ताओं को ही शामिल किया जाता है)। इन गतिविधियों पर आने वाले खर्च को राज्‍य एवं संघशासित सरकारें एक निर्धारित अनुपात में वहन करती हैं। ·एनएसएस के तहत अन्‍य गतिविधियों/खर्चों के लिए धनराशि- उपरोक्‍त के अलावा एनएसएस के तहत अन्‍य घटकों पर राशि व्‍यय की जाती है जो पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वहन की जाती है। इसके तहत आने वाला खर्च इस प्रकार है।(1) एनएसएस के कार्यक्रम अधिकारियों का ईटीआई के जरिये प्रशिक्षण (2) राष्‍ट्रीय स्‍तर के कार्यक्रम जैसे स्‍वतंत्रता दिवस परेड कैंप, मेगा कैंप, जोखिम कैंप, आईजीएनएसएस अवार्ड (3) एनएसएस के एसएलओ के लिए प्रतिस्‍थापन व्‍यय (4) एनएसएस कार्यक्रम सलाहकार प्रकोष्‍ठ और एनएसएस के क्षेत्रीय केंद्रों के लिए प्रतिस्‍थापन व्‍यय। ·एनएसएस की शुरूआत 1969 में 37 विश्‍वविद्यालयों में 40,000 कार्यकर्ताओं को लेकर की गई थी। आज 336 विश्‍वविद्यालयों, 15,908 कॉलेजों/तकनीकी संस्‍थानों और 11,809 वरिष्‍ठ माध्‍यमिक स्‍कूलों में एनएसएस के लगभग 33 लाख कार्यकर्ता हैं। विश्‍व के इस सबसे बड़े छात्र स्‍वयंसेवक कार्यक्रम से अभी तक 4.25 करोड़ छात्र लाभान्वित हुए हैं। इसके अतिरिक्‍त एनएसएस ने सामूहिक साक्षरता, पर्यावरण संरक्षण, स्‍वास्‍थ्‍य शिक्षा और सामुदायिक शिक्षा के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण योगदान किया है। प्राकृतिक आपदाओं के समय एनएसएस कार्यकर्ताओं ने राहत एवं पुनर्वास कार्यक्रम में हमेशा अग्रणी भूमिका निभाई है।

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

भारत में छपाई की शुरुआत कैसे हुई?

छपाई एक कलाकृति है। यह प्रारंभिक चित्र के समान प्रकार में लगभग विविधता की अनुमति देती है। भारत में छपाई का इतिहास 1556 से शुरू होता है। इस युग में गोवा में पुर्तगालियों ने छपाई की मशीन लगाई। अंतर्राष्‍ट्रीय संदर्भ में देखने पर यह ज्ञात होता है कि कला की यह विधा ग्‍यूटेर्नबर्ग की बाइबल की एक शताब्‍दी बाद भारत में आई। प्रसिद्ध कालाकार थोमस डैनियल (1749-1840) तथा विलियम डैनियल (1769-1837) ने ओरियन्‍टल सिनरी शीर्षक से कलमकारी की 6 श्रृंखलाओं को प्रस्‍तुत किया। 1786 में डैनियल ने ट्वेल्‍व व्‍यूज ऑफ कलकत्‍ता शीर्षक वाले एक रंग की कालमकारी का एलबम प्रकाशित किया। यह पहला मौका था जब भारत में लिथोग्राफी एक ही कागज पर छपाई की संभावना की तलाश की गई। 1822 में फ्रांसीसी कलाकार डी. सैविगनैक ने एक ही कागज पर लिथोग्राफी रूप में छपाई की। 1870 के दशक में कैलेन्‍डर, पुस्‍तक तथा अन्‍य प्रकाशनों के लिए छपी हुई तस्‍वीरों की मांग बढ़ी। इसके परिणाम स्‍वरूप एक ही कागज परछपाई की लोकप्रियता बढ़ी। आगे पूरे भारत में अनेक आर्ट स्‍टूडियो तथा छापेखाने तैयार हुए। कोलकाता के शोवा बाजार और चितपुर बट-ताला को 19वीं शताब्‍दी के प्रमुख छपाई केंद्र के रूप में देखा गया। मुंशी नवल किशोर ने 1858 में लखनऊ में नवल किशोर प्रेस तथा बुक डिपो की स्‍थापना की। इसे एशिया में सबसे पुराने छपाई और प्रकशन प्रतिष्‍ठान के रूप में मान्‍यता मिली और यहीं स्‍टोनब्‍लॉक के साथ अखबार और किताबों की छपाई होने लगी। इसके अतिरिक्‍त 19वीं शताब्‍दी के अंत में राजा रवि वर्मा ने मुंबई केघाटकोपर में लिथोग्राफी प्रेस स्‍थापित किया। रवि वर्मा के प्रेस को प्रसिद्धि मिली और उनके अनेक धार्मिक और धर्म निस्‍पेक्ष चित्रों की कॉपियों तैयार हुई और आम जनता के लिए तैल चित्र रूप में इनकी छपाई हुई। 20वीं शताब्‍दी के दूसरे दशक में अबनींद्रनाथ टैगोर, गगनेंद्रनाथ टैगोर तथा समरेंद्रनाथ टैगोर द्वारा छपाई को सृजनात्‍मक माध्‍यम का रूप दिया गया। इन तीनों ने सामूहिक रूप से बिचित्र क्‍लब की स्‍थापना की ताकि कटी हुई लकड़ी तथा कटे हुए पत्‍थरों से चित्रकारी और छपाई हो सके। इस क्‍लब के एक अन्‍य प्रमुख व्‍यक्‍ति थे मुकुलचंद्र डे,जिन्‍हें 1916 में रवींद्रनाथ टैगोर ने जेम्‍स ब्‍लाइंडिंग स्‍लोन से नक्‍काशी तकनीक सीखने के लिए अमेरिका भेजा। 1921 में शांति निकेतन में नंदलाल बोस ने कला भवन की स्‍थापना की। इसके साथ भारत में छपाई कला लोकप्रिय हुई। 1924 में चीन और जापान की यात्रा से वह चीनी घिसाई तथा जापानी रंग वाली लकड़ी से छपाई का माध्‍यम लेकर आए। इस कारण कला भवन के विद्यार्थियों ने सुदूर पूर्व की मौलिक छपाई के साथ सीधा संपर्क स्‍थापित किया। 1930 से 40 के बीच बिनोदबिहारी मुखर्जी तथा रामकिंकर बैज ने इस माध्‍यम का उपयोग किया। चित्‍तप्रसाद तथा सोमनाथ होर ने वामपंथी विचारों, सुधारवादी विषयों तथा 1943 केबंगाल अकाल और तेभाग आंदोलन के परिप्रेक्ष्‍य में सामाजिक-आर्थिक आलोचनाओं का प्रसार लाइनोकट तथा वुडकट के इस्‍तेमाल से किया। सोमनाथ होर 1979 में शांति निकेतन के ग्राफिक आर्ट विभाग के अध्‍यक्ष बने। सनत कार, लालू प्रसाद शॉ, पुलक दत्‍त, निर्मलेंदू दास, अजित सियाल और सलिल साहनी जैसे विशेषज्ञों ने शांति निकेतन के इस विभाग को बाद के वर्षों में समृद्ध बनाया। इसी तरह दिल्‍ली में जगमोहन चोपड़ा, (ग्रुप 8 के संस्‍थापक)जय स्‍वामीनाथन अनुपम सुध, परमजीत सिंह, मंजीत बाबा तथा कृष्‍ण आहूजाने योगदान दिया। 1955 में कमलकृष्‍ण तथादेवयानी कृष्‍ण द्वारा छापेखाने लगाने से दिल्‍ली में नई ऊर्जाका संचार हुआ और बहुरंगी इंटेग्‍लियों तथा कॉलेग्राफी की तकनीक आई। विलियम हेटर (एटीलियर 17 के संस्‍थापक) तथा कृष्‍णा रेड्डी के मार्ग निर्देशन में अनेक युवा बहुरंगी इंटेग्‍लियों तकनीक सीखने पेरिस गए। के. जी. सुब्रह्मण्‍यम ने अपनी कला में लिथोग्राफी, कलमकारी और सेरीग्राफी को शामिल किया। महाराजा सयाजी राव विश्‍वविद्यालय बड़ोदरा के शिक्षक के रूप में उन्‍होंने बच्‍चों की पुस्‍तकों की व्‍याख्‍या में इन विधाओं का उपयोग किया। इस क्षेत्र में एम बी जोगलेकर,ज्‍योतिभट्टजयराम पटेल, शांति दबे, वी. आर. पटेल तथा पीडीधूमल जैसे प्रमुख कलाकारों ने योगदान दिया। इटली तथा न्‍यूयॉर्क के प्रैट ग्राफिक सेंटर में अध्‍ययन के बाद 1960 में ज्‍योतिभट्ट बडोदरा के कलासंकाय में शामिल हुए और विजुअल अभिव्‍यक्‍ति के क्षेत्र में युवाओं को प्रोत्‍साहित किया। 1970 से लक्ष्‍मा गौड़, देवराज डाकोजीतथा डीएलएन रेड्डी ने हैदराबाद, आरएम पलनियप्‍पन तथा आरपी भास्‍करण ने चेन्‍नई में तथा चित्‍त प्रसाद भट्टाचार्य अतिन बसाक में तथा अमिताभ बनर्जी ने कोलकाता में इस क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण छाप छोड़े। इंटैग्‍लियोतकनीक ने चित्रकारों तथा शिल्‍पकारों को प्रभावित किया। इनमें दत्‍तात्रेय आपटे, नैना दलाल, जयंत पारीख, विजय बगोडी, वाल्‍टर डिशूजा प्रमुख हैं। अहमादाबद में रॉबर्ट राउसनबर्ग तथा नई दिल्‍ली के एनजीएमए की छपाई संग्रह से पूरी दुनिया में अपनाए गए विभिन्‍न व्‍यवहारों की छाप दिखाई दी। 1990 के दशक में भारतीय प्रिंट मेकर्स गिल्‍ड की स्‍थापना के साथ आशा की नई किरण जगी। गिल्‍ड के सदस्‍यों में आनंदमय बनर्जी, दत्‍तात्रेय आप्‍टे,जयंतगजेरा, के. आर. सुबन्‍ना, बुलाभट्टाचार्य, कविता नायर, कंचन चंदर, मोती झरोटिया, सुशांत गुहा, सुखविंदर सिंह, सुब्‍बाघोस तथा शुक्‍लसावंत शामिल हैं। छपाई के क्षेत्र में डिजीटल टेक्‍नोलॉजी तथा मेकेनाईज्‍ड सॉफ्वेटर के आगमन से क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। प्रायोगिक तौर पर इसमें विजुअल शब्‍दावली आई जिसे ज्‍योतिभट्ट, नटराज शर्मा, रविकाशी, गुलमोहम्‍मद शेख, रणवीर कलेका, वैजू परथन, पुष्‍पमाला एन, अकबर पद्माजी, रामेश्‍वर ब्रुटा तथा गोगी सरोजपाल ने तैयार किया।

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

क्या है जनप्रतिनिधित्‍व अधिनियम 1951 की धारा 126


जनप्रतिनिधित्‍व अधिनियम 1951 की धारा 126 के तहत विधानसभा क्षेत्र में मतदान समाप्‍त होने के 48 घंटें पहले की अवधि के दौरान अन्‍य माध्‍यमों के साथ-साथ टेलीविजन या इसके जैसे अन्‍य संचार माध्‍यमों द्वारा किसी भी प्रकार की चुनाव सामग्री का प्रदर्शन प्रतिबंधित है। उक्‍त धारा 126 के संबंधित हिस्‍सो को दोबारा नीचे दिया जा रहा है:- 126 धारा में मतदान समाप्‍त होने के 48 घंटे पहले की अवधि के दौरान सार्वजनिक बैठकें आयोजित करने पर प्रतिबंध है। 1 कोई भी व्‍यक्ति ऐसा नहीं कर सकता- (क)किसी भी चुनाव के लिए मतदान क्षेत्र में मतदान समाप्‍त होने के समय से 48 घंटे पहले की निर्धारित अवधि के दौरान चलचित्रण, टेलीविजन या इसी प्रकार के अन्‍य माध्‍यम के जरिये किसी प्रकार की चुनाव सामग्री का सार्वजनिक प्रदर्शन; (ख)ऐसा कोई भी व्‍यक्ति जो उपधारा (1) के प्रावधानों का उल्‍लंघन करता है तो उसे जेल की सजा हो सकती है जिसकी अवधि दो वर्ष के लिए बढाई जा सकती है या हर्जाना या दोनों सजाएं मिल सकती हैं। (ग)इस धारा में चुनाव सामग्री का मतलब ऐसी सामग्री से है जिसका मकसद एक चुनाव के परिणाम को प्रभावित करना है। 2 चुनाव के दौरान टीवी चैनलों द्वारा अपने पैनल विचार-विमर्श/बहस और अन्‍य समाचार और वर्तमान मामलों के प्रसारण में जन प्रतिनिधि अधिनियम 1951 की उपरोक्‍त धारा 126 के प्रावधानों का कभी-कभी उल्‍लंघन करने के आरोप लगाए जाते हैं। आयोग ने पहले भी स्‍पष्‍ट किया है कि उपरोक्‍त धारा 126 में किसी मतदान क्षेत्र में मतदान समाप्‍त होने के समय से 48 घंटे पहले की निर्धारित अवधि के दौरान टेलीविजन या इसी प्रकार के अन्‍य माध्‍यम के जरिये किसी प्रकार की चुनाव सामग्री का प्रदर्शन प्रतिबंधित है। उक्‍त धारा में चुनाव सामग्री को ऐसी सामग्री के रूप में परिभाषित किया गया है जो चुनाव परिणाम को प्रभावित करने के मकसद से तैयार की गई हो। धारा 126 के प्रावधान का उल्‍लंघन करने पर अधिकतम 2 वर्ष की जेल या हर्जाना या दोनों सजाएं हो सकती हैं। 3 इस संदर्भ में जनप्रतिनिधित्‍व अधिनियम 1951 की धारा 126ए पर भी ध्‍यान दिलाया जाता है जिसके तहत निर्धारित अवधि यानि मतदान शुरू होने के लिए निर्धारित घंटे से मतदान समाप्‍त होने के बाद के समय के दौरान एक्जिट पोल और उनके परिणाम का प्रसारण प्रतिबंधित है। 4 आयोग ने फिर जोर दिया कि टीवी/रेडियो तथा केबल नेटवर्क को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि धारा 126 में बताई गई 48 घंटों की अवधि के दौरान उनके द्वारा अपने कार्यक्रम के प्रसारण/प्रदर्शन में पैनलिस्‍ट/प्रतिभागियों के विचार/अपील सहित ऐसी कोई सामग्री न हो जिससे किसी दल विशेष या उम्‍मीदवार (उम्‍मीदवारों) अथवा चुनाव परिणाम पर असर/प्रभावित हो। इसमें किसी एक्जिट पोल के परिणाम का प्रदर्शन और बहस, विश्‍लेषण, दृश्‍य और साउंड बाइट सहित अन्‍य सामग्री शामिल है। 5इस अवधि के दौरान धारा 126 या धारा 126ए के प्रावधानों कें अंतर्गत न आने वाली समय अवधि के दौरान संबंधित टीवी/रेडियो/केबल/एफएम चैनल किसी कार्यक्रम के प्रसारण के लिए आवश्‍यक अनुमति के लिए राज्‍य/जिला/स्‍थानीय अधिकारी के पास जा सकते हैं लेकिन इसमें शालीनता और सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखने आदि से संबधित केबल नेटवर्क (नियामक) अधिनियम के तहत सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा निर्धारित मॉडल आचार संहिता और कार्यक्रम कोड के प्रावधान का पालन किया जाना चाहिए। उनके द्वारा पेड न्‍यूज और संबंधित मामलों के बारे में 27 अगस्‍त 2012 के आयोग के दिशा निर्देशों के प्रावधानों का भी पालन करना आवश्‍यक है। इस तरह की अनुमति देते समय संबंधित मुख्‍य निर्वाचन अधिकारी/जिला निर्वाचन अधिकारी को कानून और व्‍यवस्‍था की स्थिति सहित सभी संबंधित पहलुओं को ध्‍यान में रखना चाहिए। 6 प्रिंट मीडिया पर भी ध्‍यान दिया गया है और चुनाव के दौरान अनुपालन के लिए भारतीय प्रेस परिषद द्वारा निम्‍नलिखित दिशानिर्देश जारी किए गए हैं:- i.प्रेस का यह कर्त्‍तव्‍य है कि चुनाव और उम्‍मीदवारों के बारे में वस्‍तुनिष्‍ठ रिपोर्ट दी जाये। समाचार पत्रों से यह उम्‍मीद नहीं की जा सकती कि वे चुनाव प्रचार में शामिल हों, किसी उम्‍मीदवार/दल के बारे में बढ़ा चढ़ाकर खबर दें चुनाव के दौरान की घटनाओं के बारे में बतायें। आमतौर पर दो या तीन निकट प्रतिद्वंदियों पर पूरे मीडिया का ध्‍यान रहता है। जबकि वास्‍तविक प्रचार पर रिपोर्टिंग के दौरान एक समाचार पत्र को किसी उम्‍मीदवार के ऊपर व्‍यक्तिगत हमला करने के बजाय उसके द्वारा उठाये गये महत्‍वपूर्ण बिंदुओं को महत्‍व देना चाहिए। ii चुनाव कानूनों के तहत सांप्रदायिक या जाति पर आधारित चुनाव प्रचार प्रतिबंधित है इसलिए प्रेस को ऐसी रिपोर्ट से बचना चाहिए जिससे धर्म, जाति, नस्‍ल, समुदाय या भाषा के आधार पर लोगो के बीच दुश्‍मनी या घृणा की भावना बढ़े। iii. प्रेस को किसी उम्‍मीदवार के चरित्र और आचरण या उम्‍मीदवारी के संबंध में अथवा किसी उम्‍मीदवार के नाम वापसी के बारे में झूठे या गंभीर वक्‍तव्‍य छापने से बचना चाहिए जिससे चुनाव में उस उम्‍मीदवार के भविष्‍य पर असर न पडे। प्रेस को किसी उम्‍मीदवार/दल के खिलाफ आरोप की पुष्टि किये बिना खबर नहीं छापनी चाहिए। iv.प्रेस को एक उम्‍मीदवार/पार्टी को बढावा देने के लिए किसी प्रकार का प्रोत्‍साहन, वित्‍तीय या अन्‍य सामान नहीं स्‍वीकारना चाहिए। उसे किसी उम्‍मीदवार/दल की तरफ से दिये गये किसी प्रकार के आदर सत्‍कार या अन्‍य सुविधाएं नहीं लेनी चाहिए। v.प्रेस को किसी विशेष उम्‍मीदवार/पार्टी के प्रचार में शामिल नहीं होना चाहिए। अगर वह ऐसा करती है तो उसे अन्‍य उम्‍मीदवार/दल को इसका उत्‍तर देना होगा। vi. प्रेस को एक दल/सत्‍ता में सरकार की उपलब्धियों के बारे में सरकारी खजाने की कीमत पर कोई विज्ञापन स्‍वीकार/प्रकाशित नहीं करना चाहिए। vii.प्रेस को निर्वाचन आयोग/चुनाव अधिकारी या मुख्‍य निर्वाचन अधिकारी द्वारा समय-समय पर जारी सभी निर्देशों/आदेशों/अनुदेशों का पालन करना चाहिए। 7 तीन मार्च 2014 को एनबीएसए द्वारा जारी किये गये 'चुनाव प्रसारण के लिए दिशानिर्देश' में इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया का ध्‍यान आकर्षित किया गया है। i. समाचार प्रसारणकर्ताओं को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जन प्रतिनिधित्‍व अधि नियम 1951 के तहत नियम और कानूनों के अनुसार संबंधित चुनाव सामग्री, राजनीतिक दलों, उम्‍मीदवारों/प्रचार मुद्दों और चुनाव प्रक्रिया के बारे में लोगों को वस्‍तुनिष्‍ठ तरीके से जानकारी देने की कोशिश करनी चाहिए। ii. न्‍यूज चैनल को किसी दल या उम्‍मीदवार के साथ किसी राजनीतिक संबंध को उजागर करना चाहिए। समाचार प्रसारणकर्ताओं का यह कर्तव्‍य है कि विशेष रूप से चुनाव रिपोर्टिंग के दौरान वे संतुलित और बिना भेदभाव की रिपो‍र्टिंग करें। iii. समाचार प्रसारणकर्ताओं को राजनीतिक दलों या उम्‍मीदवारों के संबंध में विशेष रूप से अफवाह, आधारहीन अटकलबाजी और गलत जानकारी देने से बचने का प्रयास करना चाहिए। कोई उम्‍मीदवार/राजनीतिक दल जिसके बारे में अपमानजनक जानकारी दी गई हो या जानकारी गलत तरीके से दी गई हो अथवा प्रसारक द्वारा इस प्रकार के अन्‍य तरीके से नुकसान पहुंचाया गया हो तो प्रसारक को तुरंत इसमें सुधार करना चाहिए और पीडित पक्ष को उत्‍तर देने के लिए उचित समय उपलब्‍ध कराया जाना चाहिए। iv. समाचार प्रसारणकर्ताओं को ऐसे सभी राजनीतिक और वित्‍तीय दबाव से बचना चाहिए जो चुनाव और चुनाव संबंधी मामलों के कवरेज को प्रभावित कर सकते हैं। v. समाचार प्रसारणकर्ताओं को अपने समाचार चैनल पर संपादकीय और विशेषज्ञ की राय के बीच स्‍पष्‍ट अंतर करना चाहिए। vi. अगर कोई समाचार प्रसारणकर्ता राजनीतिक दलों की वीडियो सामग्री का इस्‍तेमाल करता है तो उसे इसके बारे में उजागर करना चाहिए और इस पर उचित टेग लगाना चाहिए। vii. विशेष सावधानी बरतनी चाहिए ताकि चुनाव और चुनाव संबंधी मुद्दों के समाचारों/कार्यक्रमों में कार्यक्रम, दिनांक, स्‍थान और टिप्‍प्‍णियों से संबंधित सभी तथ्‍य सही हों। अगर किसी गलती या लापरवाही से कोई गलत जानकारी प्रसारित हो जाती है तो जैसे ही प्रसारक की जानकारी में यह आता है उसे भी महत्‍व देते हुए तुरंत सुधारा जाना चाहिए। viii. समाचार प्रसारणकर्ता, उनके पत्रकार और पदाधिकारियों को धन या उपहार या अन्‍य कोई लाभ स्‍वीकार नहीं करना चाहिए जिससे प्रसारणकर्ता या उनके कार्मिकों की विश्‍वसनीयता प्रभावित हो या प्रभावित हुई लगती हो और जो उसके हितों को टकराव या हानि न पहुंचाए। ix. समाचार प्रसारणकर्ता को किसी प्रकार की नफरत फैलाने वाला या आपत्‍तिजनक शब्‍दों का कोई प्रसारण नहीं करना चाहिए जिससे हिंसा को बढ़ावा मिले या जन असंतोष को प्रोत्‍साहन मिले या अन्‍य गड़बड़ी फैले क्‍योंकि सांप्रदायिक और जातीय घटकों पर आधारित चुनाव प्रचार पर चुनाव कानून के अंतर्गत पाबंदी है। समाचार प्रसारणकर्ता को ऐसी रिपोर्टों को सख्‍ती से रोकना चाहिए जिनसे लोगों के बीच धार्मिक, वर्ग, जातीय, संप्रदाय, क्षेत्र या भाषा के आधार पर शत्रुता या घृणा की भावनाओं को प्रोत्‍साहन मिलता हो। x. समाचार प्रसारणकर्ताओं से समाचार और पेड कंटेंट के दरमियान अंतर बनाए रखना अपेक्षित है। सभी पेड घटकों पर स्‍पष्‍ट रूप से ‘पेड विज्ञापन’ या ‘पेड कंटेंट’ उल्‍लिखित होना चाहिए और पेड कंटेंट के लिए दिनांक 24.11.2011 को जारी किये गये ‘पेड समाचारों पर मानदंड और दिशा-निर्देश’ का अनुपालन किया जाना चाहिए। xi. ओपिनियन पोल की रिपोर्ट में सटीकता और निष्‍पक्षता पर विशेष ध्‍यान देना चाहिए। जिसमें दर्शकों के सामने यह खुलासा किया जाना चाहिए कि ओपिनियन पोल के आयोजन और प्रसारण को किसने आयोजित किया और किसने उसके लिए खर्च किया और समाचार प्रसारणकर्ता द्वारा ओपिनियन पोल के परिणामों या अन्‍य चुनाव पूर्वानुमान के संदर्भ, संभावना और सीमाओं की व्‍याख्‍या की जानी चाहिए। ओपिनियन पोल का प्रसारण चुनाव की महत्‍ता जैसे- इस बारे में अपनाया गया तरीका, सैंपल का आकार, गलतियों की सीमा, क्षेत्रीय कार्य की तिथियां और उपयोग किए गए आंकड़ों के बारे में सूचना दी जानी चाहिए ताकि दर्शक उसे अच्‍छी तरह समझ सकें। प्रसारणकर्ता को यह भी स्‍पष्‍ट करना चाहिए कि वोट की हिस्‍सेदारी किस प्रकार सीट की हिस्‍सेदारियों में परिवर्तित होती है। xii. भारतीय निर्वाचन आयोग चुनावों की घोषणा के समय से लेकर चुनाव परिणामों के निष्‍कर्ष और घोषणा होने तक समाचार प्रसारणों की निगरानी करेगा। सदस्‍य प्रसारणकर्ता द्वारा किए गए किसी भी उल्‍लंघन की जानकारी निर्वाचन आयोग द्वारा न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टिंग स्‍टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीएसए) को दिए जाने पर एनबीएसए द्वारा अपने विनियमों के अनुसार कार्यवाही की जाएगी। xiii. प्रसारणकर्ता संभावित सीमा तक मतदाता शिक्षा कार्यक्रमों को चलाए जिससे मतदाताओं को मतदान प्रक्रिया, मतदान करने के महत्‍व और वह अपना वोट कैसे, कब और कहां दे के साथ-साथ उसे मतदान की गोपनीयता के बारे में भी प्रभावी जानकारी दी जा सके। xiv. समाचार प्रसारणकर्ता को यह स्‍पष्‍ट घोषणा किए बिना अंतिम/औपचारिक या निश्‍चित परिणामों का प्रसारण नहीं करना चाहिए कि ये परिणाम अनौपचारिक या अपूर्ण या आंशिक या अनुमानों पर आधारित है और इन्‍हें अंतिम परिणाम के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। अंतिम परिणामों की घोषणा चुनाव अधिकारी द्वारा विधिवत घोषणा के बाद ही की जानी चाहिए। उपरोक्‍त दिशा-निर्देशों का सर्व संबंधित मीडिया द्वारा अनुपालन किया जाना चाहिए।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

1 करोड़ के गोल्डन शर्ट की कहानी

हर किसी की चाहत करोड़पति बनने की होती है। कोई एक करोड़ में घर या फ्लैट खरीदता है तो टाटा या अंबानी परिवार का वारिस 2 करोड़ रुपये की महंगी गाड़ी में घूमता है। मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले हर किसी का सपना किसी भी तरह से करोड़पति बनने की होती है। लेकिन ज़ी न्यूज़ टीवी चैनल के जरिए एक ऐसे शख्स के बारे में जानने और देखने का मौका मिला, जो एक करोड़ रुपये की शर्ट पहनता है। उस इंसान के बारे में जानकारी देने से पहले आपको बता दूं कि उस 1 करोड़ के शर्ट की असलियत क्या है। आखिर ऐसा क्या है उस शर्ट में कि उसकी कीमत 1 करोड़ रुपये है। दरअसल एक करोड़ की कीमत वाला शर्ट सौ फीसदी सोने का बना हुआ है। इस शर्ट को बनाने में कुल 4 किलो सोना खर्च किया गया है। इसे तैयार करने का जिम्मा मुंबई के एक मशहूर ज्वैलरी के शो रुम को दिया गया था। इस शो रुम के 18 कर्मचारियों ने इसे तकरीबन 1 महीने की कड़ी मेहनत के बाद तैयार किया। एक करोड़ की शर्ट पहनने वाले व्यक्ति का नाम पंकज पारिख है। पंकज महाराष्ट्र के नासिक जिले के रहने वाले है और इनका लंबा चौड़ा व्यवसाय है। इनके व्यवसाय का दायरे की शुरूआत रेडिमेड कपड़े के शो रुम से शुरू होती है और फिर एक सहकारी बैंक में भी इनकी अहम भूमिका है। इसके अलावा यह एक स्कूल के चेयरमैन है और नगर परिषद के भी चेयरमैन है। इन सबके अलावा फिल्मी कलाकारों बप्पी लहरी और हनी सिंह की तरह सोने के गहने पहनने का बहुत शौक है। जिस तरह से बॉलीवुड में बप्पी लाहिड़ी को लोग गोल्डनमैन के नाम से जानते है। उसी तरह से पंकज पारिख भी अपने इलाके में गोल्डमैन के रुप में मशहूर है। पंकज 45 साल के है और अपने 45वें जन्मदिन पर खासतौर से सोने की शर्ट बनवाई है। पंकज सोने की शर्ट पहनने के बाद सबसे पहले सिद्धिविनायक के दर्शन करने मुंबई पहुंचे। इनके जानकारों का कहना है कि पंकज को बचपन से ही सोने के आभूषण पहनने का बहुत शौक है। अपनी शादी में भी पंकज पारिख ने अपनी पत्नी से ज्यादा सोने के गहने खुद पहने थे। सोने की प्रति बचपन से जारी लगाव अब दीवानगी का रुप ले चुकी है। पहले सोने की अंगूठी, फिर सोने के कंगन, उसके बाद सोने के हार और फिर न जाने बदलते समय के साथ पंकज अपनी हर पसंदीदा चीज को सोने के रुप में ढालने लगे। यह सिलसिला काफी लंबे समय से जारी है और अब पंकज ने सोने की शर्ट पहनना शुरू कर दिया है। संभावना यह भी जताई जा रही है कि अगले कुछ सालों में पंकज सोने की शर्ट के साथ साथ सोने के पैंट पहने हुए भी नज़र आ सकते हैं।

बुधवार, 30 जुलाई 2014

पासपोर्ट जारी करने में देरी से बचने के उपाय

पासपोर्ट के लिए आवदेन करने के बाद महीनों चक्कर काटने का सिलसिला अब जल्द ही खत्म हो जाएगा। सरकार ने इस दिशा में कई पहल किए है। इसकी बदौलत अब पासपोर्ट जारी होने की राह में आने वाली दिक्कतों को दूर करने के लिए कारगर कदम उठाए जा रहे है। इसके तहत उन तमाम कारणों का पता लगाया जाएगा,जिसकी वजह से पासपोर्ट जारी करने में ज्यादा देरी होती है। हलांकि पहले की तुलना में हाल के वर्षों में पासपोर्ट जारी करने में लगने वाले समय में कमी आई है। आमलोगों को पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया कई बार निम्नलिखित कारणों से लम्‍बी हो जाती है:- 1. पुलिस से सत्‍यापन रिपोर्ट निर्धारित 21 दिन से ज्‍यादा अवधि में प्राप्‍त होना 2. अपूर्ण पुलिस रिपोर्ट मिलना 3. एक वर्ष में पासपोर्ट की मांग 15 प्रतिशत की दर से बढ़ना और 4. केन्‍द्रीय पासपोर्ट सेवाओं की बढ़ती हुई मांग से निपटने के लिए केन्‍द्रीय पासपोर्ट संगठन में मानव श्रम की कमी। सरकार ने पासपोर्ट जारी करने में होने वाली देरी को कम करने के लिए अनेक कदम उठाए हैं। चूंकि पासपोर्ट जारी करने के लिए आवेदनकर्ता के बारे में व्‍यक्तिगत जानकारी का पुलिस सत्‍यापान काफी मायने रखता है, पासपोर्ट कार्यालय पुलिस सत्‍यापन रिपोर्ट में तेजी लाने के लिए पुलिस के साथ संपर्क बनाए रखता है। पासपोर्ट कार्यालय पासपोर्टों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए समय-समय पर सप्‍ताह के अंत में पासपोर्ट मेलों का आयोजन करता है। जरूरत पड़ने पर पासपोर्ट अदालतें भी लगाई जाती हैं। पीएसके और पासपोर्ट कार्यालयों का निरीक्षण भी समय-समय पर किया जाता है ताकि सुपुर्दगी में सुधार लाया जा सके। कर्मचारी चयन आयोग के जरिए भर्ती करके वर्तमान रिक्‍त स्‍थानों को भरने के लिए भी कदम उठाए गए हैं। सरकार ने हाल ही में योग्‍य उम्‍मीदवारों से आवेदन मंगाए हैं ताकि प्रतिनियुक्ति पर पासपोर्ट अधिकारी, उप-पासपोर्ट अधिकारी और सहायक पासपोर्ट अधिकारी के स्‍तर पर खाली पदों को भरा जा सके। सरकार ने पासपोर्ट कार्यालयों में 450 डाटा एंट्री ऑपरेटरों को लगाया है। विदेश मंत्रालय और समुद्रपारीय भारतीय मामलों के राज्‍य मंत्री जनरल (सेवानिवृत) डॉ वी. के. सिंह ने राज्‍यसभा में यह जानकारी दी।

बुधवार, 23 जुलाई 2014

साइबर क्राइम बना पुलिस के लिए सिरदर्द


इंटरनेट अब जानकारी का जरिया नहीं बल्कि गुनाहगारों का ठिकाना बनता जा रहा है। पहले लोग इंटरनेट का इस्तेमाल ईमेल, सोशल नेटवर्किंग साइट, नई-नई सूचना और जानकारी हासिल करने के लिए किया करते थे। लेकिन बदलते वक्त के साथ इंटरनेट सूचना और जानकारी के साथ साथ लोगों को कंगाल बनाने का आसान जरिया बन चुका है। इंटरनेट की दुनिया में सब कुछ संभव है। यहां जानकारी का भंडार है तो दूसरी ओर जानकारी का बेजा इस्तेमाल करने वालों की भी लंबी कतार है। इंटरनेट पर जरा सी लापरवाही आपको ठगी के ऐसी दुनिया में धकेल देगी, जहां दुनिया के किसी कोने में बैठा शातिर ठग हज़ारों किलोमीटर दूर होने के बाद भी आपकी तिजोरी पर हाथ साफ कर, आपको घर बैठे कंगाल बना सकता है। इंटरनेट के जरिए ठगी का कारोबार चलाने वाले गिरोह तकनीक और शातिर दिमाग का इस्तेमाल कर पूरी दुनिया में अपने शिकार की तलाश में लगे रहते हैं। कभी फर्जी ईमेल के जरिए तो कभी आपके मोबाइल पर लुभावने एसएमएस के जरिए आपको लुभाने ऑफर देकर अपने जाल में फांसने की कोशिश करते हैं। आपको इस तरह लुभाने की कोशिश करेंगे, मानों वो आपको करोड़पति बनाने वाले हैं। लेकिन हक़ीक़त में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। दरअसल वह तो आपको कंगाल बनाने का चक्रव्यूह रच रहे होते हैं और आपको इसका पता तब चलता है, जब आप पूरी तरह लूट चुके होते हैं। ऐसी स्थिति में आपके पास सिवाए आंसू बहाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता है। शातिर लूटेरा कौन है, कहां बैठा है, हिंदुस्तान में है या अफ्रीका के किसी देश में बैठकर आपको कंगाल बना रहा है। इसके बारे में आपको कुछ भी पता नहीं होता है। काफी भागदौड़ करने के बाद भी अगर आपको कुछ पता चल भी जाता है तो भी आप कुछ करने की स्थिति में नहीं होते हैं। क्योंकि आम आदमी का वहां तक पहुंचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है। वजह यह है कि पहले ही वह इंसान कंगाल हो चुका होता है। ऐसी स्थिति में वह ज्यादा कुछ करने की हालत में नहीं होता है। हाल के दिनों में ऐसे गुहनगारों की तादाद दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इससे न सिर्फ आम आदमी परेशान है बल्कि ऐसे अपराधों की बढ़ती संख्या की वजह से पुलिस के लिए भी यह एक समस्या बनती जा रही है। आखिर ऐसे गुहनगारों से कैसे निपटा जाए। इंटरनेट की दुनिया में एक क्लिक के जरिए गुनाह को अंजाम देना बेहद आसान है। लेकिन यहीं आसान रास्ता इंसान को गुनाह के ऐसे चक्रव्यूह में फंसा देता है, जहां से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। क्योंकि साइबर क्राइम के आंकड़े बताते हैं कि अब हिंदुस्तान की साइबर पुलिस पहले से ज्यादा चौकन्नी है। हिंदुस्तान में साइबर क्राइम अब पुलिस के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बनता जा रहा है। इंटरनेट के जरिए गुनाह को अंजाम देने के मामले में 51 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। पिछले साल देश के अलग अलग हिस्सों में साइबर क्राइम के कुल 4356 मामले दर्ज किए गए। हैरत की बात यह है कि साइबर क्राइम के गुनहगार पढे-लिखे होते हैं। लेकिन दिमाग से शातिर होते हैं। साइबर क्राइम के ज्यादातर अपराधी 18 से 30 साल की उम्र के होते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी एक्ट के तहत सबसे ज्यादा 681 मामले महाराष्ट्र में, 635 मामले आंध्र प्रदेश में और 513 मामले कर्नाटक में दर्ज किए गए। लेकिन चौकाने वाली बात है कि साइबर क्राइम के मामले में छोटे शहरों ने महानगरों को पीछे छोड़ दिया है। एनसीआरबी के आंकड़ों की माने तो 65 फीसदी साइबर क्राइम के मामलों का ताल्लुक छोटे शहरों से होता है। साइबर क्राइम के तहत सबसे ज्यादा मामले हैकिंग, अश्लील तस्वीर भेजना, सेक्सुयल हैरेसमेंट और आर्थिक अपराध से जुड़े होते हैं। लेकिन साइबर क्राइम का फील्ड नया होने के कारण लोगों को साइबर सुरक्षा और कानून की ज्यादा जानकारी नहीं है। हिंदुस्तान में फिलहाल 22 हज़ार साइबर सुरक्षा एक्सपर्ट है। लेकिन देश में ज़रुरत तकरीबन 77 हज़ार ऐसे एक्सपर्ट की है।

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