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बुधवार, 9 मार्च 2016
अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए सरकार ने उठाए ठोस कदम
केंद्र सरकार ने अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में परिणाम मूलक प्रयास किए हैं, जिनके नतीजे भी मिलने शुरू हो गए हैं। इस्पात एवं खान मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि वर्तमान सरकार ने अल्प समय में ही इस्पात और खान उद्योग में विकास की गति को तेज कर दिया है। श्री तोमर ने कहा कि बुनियादी ढांचे, गांवों में बिजली पहुंचाने, ग्रामीण क्षेत्र, रेल नेटवर्क और सड़क निर्माण पर ध्यान देने से अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी तथा इस्पात और खान जैसे क्षेत्रों को लाभ होगा। उन्होंने इस्पात उद्योग को समर्थन देने तथा खनन क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए सरकार द्वारा किए जाने वाले प्रयासों का विवरण दिया।
श्री तोमर ने कहा कि खनन क्षेत्र में किए जाने वाले सुधारों के नतीजे मिलने लगे हैं और खनिज उत्पादन सूचकांक में 11.7 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों के दौरान खनिजों के उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई। लौह अयस्क के संबंध में 2015 की अंतिम तिमाही के दौरान 45 प्रतिशत वृद्धि हुई, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में बहुत अधिक है। अप्रैल-दिसंबर, 2015 के दौरान बॉक्साइट में 32.7 प्रतिशत, क्रोमाइट में 13.4 प्रतिशत, तांबा सांद्र में 30.4 प्रतिशत, सीसा सांद्र में 40.8 प्रतिशत और जस्ता सांद्र में 11.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
मंत्री महोदय ने बताया कि प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना से खनन क्षेत्र के लोगों और खास तौर से जनजातीय लोगों के कल्याण तथा क्षेत्र के विकास में बहुत सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार की अन्वेषण संबंधी पहलें अभूतपूर्व हैं।
मंत्री महोदय ने पत्रकारों को बताया कि वर्तमान सरकार के आने के बाद देश की इस्पात उत्पादन क्षमता 16 मिलियन टन बढ़ी है तथा इसे और बढ़ाने की योजना है। इस्पात उत्पादन में पहले विश्व में भारत का चौथा स्थान था। अब भारत तीसरे स्थान पर है।
इस्पात उद्योग पर आम बजट और रेल बजट के प्रभाव की चर्चा करते हुए श्री तोमर ने कहा कि विभिन्न निर्णयों से इस्पात उद्योग को बहुत लाभ होगा क्योंकि मांग बढ़ने पर उत्पादन भी बढ़ेगा। इनका ब्यौरा इस प्रकार है-
• आम बजट और रेल बजट में संरचना विकास के लिए संयुक्त रूप से 2,21,246 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जिससे आने वाले वर्षों में इस्पात की मांग बढ़ेगी और विकास की गति तेज होगी। इसके अलावा सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य 1 मई, 2018 रखा गया है। इसके तहत खंभों, इस्पात, तार इत्यादि जैसे उत्पादों की मांग बढ़ेगी।
• उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम और पूर्वी तट के लिए डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के निर्माण से इस्पात की मांग बढ़ेगी। रेलवे ने अगले वर्ष तक 2800 किमी. नई रेल लाइन बिछाने का लक्ष्य रखा है। इससे भी इस्पात की मांग बढ़ेगी।
• रेल बजट में बंदरगाह संपर्कता पर बहुत जोर दिया गया है। नेटवर्क बढ़ाने, आमान बढ़ाने, इंजनों की उत्पादन और गोदाम विकास आदि जैसे नए निवेश प्रस्तावों से भारतीय इस्पात उद्योग को फायदा पहुंचेगा।
• खासतौर से गरीब और जरूरतमंद लोगों को रसोई गैस प्रदान करने की नए नीति से एलपीजी ग्रेड एचआर क्वाइल की मांग बढ़ेगी। इस कदम से इस्पात उद्योग को सीधा फायदा पहुंचेगा।
• सिंचाई, रूरबन समूह संरचना के विकास सहित ग्रामीण क्षेत्र में भारी निवेश की योजना है। इससे भी इस्पात की मांग बढ़ेगी।
• रेल बजट में माल भाड़े में वृद्धि की घोषणा नहीं की गई है। इस कदम से मौजूदा मामूली महंगाई परिस्थितियों में भी मालभाड़े में कोई वृद्धि न होने के कारण इस्पात उद्योग को फायदा होगा।
मंत्री महोदय ने आम बजट में भारत के खनन क्षेत्र को दिए जाने वाले समर्थन का स्वागत किया। एल्युमिनियम और जस्ते में आयात शुल्क में बढ़ोतरी से घरेलू उद्योगों को फायदा होगा। उन्होंने कहा कि लो ग्रेड लौह अयस्क, बॉक्साइट और क्रोमियम में निर्यात शुल्क की कटौती से बेशी खनिज के निर्यात को प्रोत्साहन मिलेगा।
विज्ञापन के जरिए मुनाफा बढ़ाने के लिए रेलवे अर्नेस्ट एंड यंग की मदद लेगी
स्टेशनों और रेलगाडि़यों के जरिये विज्ञापन क्षमता के दोहन के लिए भारतीय रेलवे ने अर्नेस्ट एंड यंग को सलाहकार नियुक्त किया है। अर्नेस्ट एंड यंग विज्ञापन के उद्देश्य के लिए 7000 से ज्यादा रेलवे स्टेशनों की परिसम्पत्ति और मूल्य रणनीति की पहचान करेगा। पहली बार देश में रेलवे के लिए विज्ञापनों पर इस तरह की व्यापक परियोजना शुरू की गई है। रेल मंत्री सुरेश प्रभु की ओर से गैर किराया बॉक्स रूट के जरिये राजस्व बढ़ाना लक्ष्य है। इससे विज्ञापनदाताओं के कारोबार को सुगम बनाने और जिम्मेदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी, साथ ही, विशिष्ट जनसंख्यागत और भौगोलिक जरूरतों को बढ़ाने में भी सहायता मिलेगी। इस माध्यम से विज्ञापनदाताओं को अपने निवेश की वापसी संबंधी आकलन में भी मदद मिलेगी। अर्नेस्ट एंड यंग बीमा, टैक्स, कारोबार और परामर्श सेवाओं का वैश्विक नेतृत्वकर्ता है।
भारतीय रेलवे ने अर्नेस्ट एंड यंग को अपने व्यापक विज्ञापन अभियान में शामिल किया है। यह वैश्विक कंपनी भारतीय रेलवे में योगदान से विभाग स्टेशनों और रेलगाडि़यों में व्यापक रूप से विज्ञापन क्षमता के अवसरों की पहचान और उसे पूरा करने के तौर-तरीकों पर सलाहकार के रूप में अपनी भूमिका निभायेगी। अर्नेस्ट एंड यंग बहुराष्ट्रीय पेशवर सेवाएं देने वाली कंपनी है और इसका मुख्यालय लंदन में है। यह बीमा, टैक्स, लेन-देन व्यापार और परामर्श सेवाएं प्रदान करने वाली अग्रणी वैश्विक कंपनी भी है। इसका कई देशों के साथ कारोबार है और यह अलग से कानूनी कार्यक्रम भी चलाती है। रेलवे जैसे सार्वजनिक उपक्रम के तहत राइट्स सलाहकार विभाग है और इसने अर्नेस्ट एंड यंग को बहुपार्टी नीलामी संबंधी सेवाएं दे रखी हैं।
रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभाकर प्रभु हमेशा विज्ञापनों के जरिये नॉन फेयर बॉक्स रूट से राजस्व बढ़ाने पर जोर देते रहे हैं। शुरुआती पहल इस बात का संकेत है कि अगले कुछ वर्षों में भारतीय रेलवे अपने विज्ञापन पर 5000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करेगा।
अर्नेस्ट एंड यंग को भारतीय रेलवे ने अपनी क्षमताओं का विज्ञापन करने के मद में समूचे देश के करीब 7,000 रेलवे स्टेशनों के व्यापक नेटवर्क के तहत चलने वाली रेलगाडि़यों और उसकी पूंजी क्षमता को जांचने के लिए यह जिम्मेदारी सौंपी है। अर्नेस्ट एंड यंग ने अपने विशिष्ट कार्यक्रमों के तहत मार्केटिंग एंड एडवरटाइजिंग रिस्क सर्विसेज (मार्स) को रेलवे की सेवाओं के लिए प्रस्तुत करने का प्रस्ताव किया है। इससे समूचे भारत के रेलवे स्टेशनों की क्षमता की पहचान करने में मदद मिलेगी और विज्ञापनदाताओं को अपनी मूल्यगत रणनीति को विकसित करने में सहूलियत होगी। कंपनी ने अपना काम शुरू कर दिया है।
रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष श्री ए. के. मित्तल ने विभाग के अधिकारियों और अर्नेस्ट एंड यंग के अधिकारियों के बीच हुई बातचीत के बारे में कहा कि ‘दोनों के बीच वार्ता का दौर समाप्त हो गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय रेलवे ने इस पहल के जरिये यात्रियों पर कोई बोझ बढ़ाये बिना राजस्व बढ़ाने का फैसला किया है। अर्नेस्ट एंड यंग और भारतीय रेलवे परिसम्पत्तियों के अधिकतम असरदार दोहन के लिए इस परियोजना के जरिये अग्रणी विज्ञापन उत्पन्न करने वाली कंपनी होगी। अतीत में रेलवे ने विज्ञापन के जरिये राजस्व कमाये थे लेकिन गाडि़यों और स्टेशनों पर विज्ञापन के लिए जगह सीमित रही है। पहली बार देश में व्यापक पैमाने पर परियोजना की पहचान की गई और समूचे भारत में विज्ञापन के मौकों का सूत्रपात हुआ।’ अर्नेस्ट एंड यंग के भागीदार और मीडिया और मनोरंजन के राष्ट्रीय सूत्रधार श्री फारूख बलसारा ने कहा, ‘इतने व्यापक पैमाने पर परिसम्पत्ति के विज्ञापन के वास्ते दोहन और इस काम के लिए राष्ट्रव्यापी मूल्यांकन कभी नहीं हुआ था। हमें बेहद खुशी है और परियोजना में भारतीय रेलवे के जुड़ने पर हमें गर्व भी है। इस कार्य से विज्ञापन के जरिये राजस्व बढ़ेगा और इसके बदले यात्रियों की सेवाओं में सुधार और रेल नेटवर्क का विस्तार होगा। इस कार्य से कामकाज में बेहतरी आयेगी।’ भारत में अर्नेस्ट एंड यंग निदेशक भारत राजमणि ने बताया, ‘इस पहल से हम अपने लक्ष्य यानी यात्रियों तक पहुंचेंगे और विज्ञापनदाता के रूप में नया माध्यम भी पैदा होगा। भारतीय रेलवे अपनी उच्च पहुंच और भारी-भरकम कार्यों में गतिशीलता आयेगी। इससे स्थानीय और राष्ट्रीय ग्राहकों दोनों को फायदा होगा।’
भारतीय रेलवे की इस अनोखी पहल से निवेश की भरपाई में स्वाभाविक मदद मिलेगी। इसके अलावा, विज्ञापन के परम्परागत तौर-तरीके से निजात मिलने के साथ ही ज्यादा समय के लिए ज्यादा यात्रियों और ग्राहकों को लाभ पहुंचाना सुनिश्चित होगा। इसके अतिरिक्त, रेलवे अपनी टिकटिंग और स्टेशन से जुड़े आंकड़े को व्यवस्थित कर पायेगा।
मंगलवार, 8 मार्च 2016
मतदाताओं के हक में चुनाव आयोग का बड़ा फैसला
04 मार्च, 2016 को आयोग की ओर से जारी प्रेस नोट संख्याः ईसीआई/पीएन/16/2016 के संदर्भ में सूचित किया जाता है कि आयोग ने नेशनल वोटर्स सर्विसिज पोर्टल पर पहली बार मतदाता सूची में मतदाताओं का नाम तलाशने, मतदान केन्द्र का पता जानने, मतदान केन्द्र को गूगल मानचित्र का पता ढूंढने, चुनाव कर्मियों से संपर्क करने का विवरण जानने और वेब पोर्टल पर किसी भी मतदान केन्द्र की मतदाता सूची को देखने की सुविधा उपलब्ध कराई है। मतदाताओं को अपनी मतदाता सूची प्रविष्टि और मतदान केन्द्र के विवरण संबंधी सूचना प्राप्त करने में सहायता देने के लिए एक एकीकृत मोबाइल ऐप्प के माध्यम से भी यही सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।
चुनाव मशीनरी के साथ मतदाताओं का निरंतर संपर्क सुनिश्चित करने के लिए आयोग ने पहली बार वेब पोर्टल, मोबाइल ऐप्प और एमएमएस के माध्यम से सूचना प्रदान करने की शुरूआत की है ताकि मतदाताओं को चुनाव की पूरी अवधि के दौरान उचित घटना क्रमों के बारे में सूचित किया जा सके। उपलब्ध कराई जाने वाली प्रमुख सूचना में निर्वाचन क्षेत्र के लिए चुनाव का कार्यक्रम, प्राप्त नामांकनों का विवरण, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की अंतिम सूची, मतदान और मतगणना की तिथि के बारे में याद दिलाना शामिल है।
इतना ही नहीं आयोग ने वेब पोर्टल और मोबाइल ऐप्प के माध्यम से ई-मतदाता सूचना पर्ची उपलब्ध कराने की भी पहल की है ताकि मतदाता बिना फोटो वाली अपनी मतदाता सूची प्रविष्टि का प्रिंटआउट ले सके, जिसे ईपीआईसी या पहचान के किसी अन्य वैकल्पिक दस्तावेज के साथ, जैसा कि आयोग द्वारा तय किया गया है, का इस्तेमाल मतदाता सूची की चिन्हित प्रति में से मतदाता की प्रविष्टि का पता लगाने में किया जा सकेगा। इससे मतदान केन्द्र पर मतदान की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सकेगी।
सोमवार, 7 मार्च 2016
सड़क सुरक्षा वक्त की ज़रुरत
परिवहन नेटवर्क का विस्तार वृद्धि के लिए पहली जरूरत है और शहरीकरण उसका लगभग निश्चित परिणाम है। इसलिए, अब जबकि भारत वृद्धि के पथ पर अग्रसर है, हमारे यहां शहरीकरण का बढ़ता स्तर और शहरों में जनसंख्या का भारी घनत्व है। जैसा कि अपेक्षित था, वाहनों की संख्या में समग्र व़द्धि के साथ हम देश में सड़क नेटवर्क का तेजी से विस्तार होते भी देख रहे हैं। भारत का सड़क नेटवर्क आज दुनिया के विशालतम सड़क नेटवर्क्स में से एक है। वर्ष 2003-13 की अवधि के दौरान मोटर वाहनों की तदाद यहां 10.5 प्रतिशत की संयोजित वार्षिक वृद्धि दर की रफ्तार से बढ़ी है। यह व़द्धि जहां पूरी तरह व्यवस्थित और उभरती अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक भी है, वहीं चिंता की बात यह है कि सड़क पर बढ़ते दबाव से निपटने के लिए हमने खुद को तैयार नहीं किया है। हमने समकालीन यातायात नियम बनाने और इन नियमों को अपनाने के बारे में जागरूकता जगाने सहित आधुनिक यातायात प्रबंधन प्रणालियां और पद्धतियां भी नहीं अपनायीं। इसके परिणामस्वरूप देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या बहुत अधिक है और सड़क यातायात में सुरक्षा चिंता का विषय है और सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रमुख मुद्दा बन चुकी है। देश में हर एक घंटे में 56 सड़क दुर्घटनाएं और उनमें 16 व्यक्तियों की मौत होती हैं।
सड़क यातायात की ‘सुरक्षित प्रणाली’ सुनिश्चित करने के लिए, सड़क अवसंरचना में वृद्धि, वाहनों में सुरक्षा प्रणाली विकसित करना, चालकों और सड़क का उपयोग करने वालों के व्यवहार में परिवर्तन लाना और आपातकालीन सेवाएं और दुर्घटना के बाद की सेवाएं उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है। सड़क सुरक्षा में ये चार-ई शामिल हैं- शिक्षा, प्रवर्तन, अभियांत्रिकी, पर्यावरण और आपातकालीन सेवा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2009 में सड़क सुरक्षा पर अपनी पहली वैश्विक स्थिति रिपोर्ट में सड़क दुर्घटनाओं की दुनियाभर में “सबसे बड़े कातिल” के रूप में पहचान की। रिपोर्ट में कहा गया है कि हर साल दुनियाभर में सड़क हादसों में 1.2 मिलियन लोगों की मृत्यु हो जाती है और 50 मिलियन लोग इससे प्रभावित होते है। सड़क हादसों में होने वाली मौतों में 50 प्रतिशत तक कमी लाने के लक्ष्य के साथ सड़क सुरक्षा के लिए कार्रवाई का दशक “(2011-2020)” अंगीकृत किया गया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत की पहचान ऐसे देश के रूप में की है, जो सड़क हादसों में होने वाली मौतों के मामले में सबसे आगे है, जहां अनुमानित तौर पर प्रति मिनट एक सड़क दुर्घटना होती है और हर चौथे मिनट में सड़क दुर्घटना में एक मौत होती है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार हर साल एक लाख से ज्यादा लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत होती है। अकेले 2014 में ही सड़क दुर्घटनाओं में 1.39 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई।
सरकार ने वर्ष 2010 में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा नीति में अपनायी, जिसमें सड़क सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं के बारे में जागरूकता जगाने के महत्व और इसके सामाजिक-आर्थिक निहितार्थों और सड़क सुरक्षा सूचना डाटाबेस बनाने पर बल दिया गया।
सरकार यातायात उल्लंघनों के लिए कड़ी दंडात्मक कार्रवाई और जुर्माने सहित सड़क परिवहन और सुरक्षा विधेयक, 2014 का मसौदा भी लेकर आयी और प्रस्तावित कानून में सड़क सुरक्षा का एक प्रमुख संघटक भी बनाया गया। विधेयक, 2014 जनता की टिप्पणियों के लिए अब सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की वेबसाइट पर पोस्ट किया गया है। यह विधेयक सड़क परिवहन अवसंरचना के आधुनिकीकरण, सड़क पर चलने वाले वाहनों की गुणवत्ता में सुधार और पूरे देश के लिए एकीकृत ड्राइवर लाइसेंसिंग सिस्टम के माध्यम से ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण किया गया है।
प्रस्तावित अधिनियम में सभी यात्रियों के लिए हेलमेट और सीट बेल्ट का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया है। दुपहिए वाहनों के लिए पिछली सीट पर बैठने वाले यात्रियों के लिए भी हेलमेट, सीट बेल्ट और उच्च दृश्यता वाले कपड़े पहनना जरूरी बना दिया गया है। बच्चों की सुरक्षा को भी ध्यान में रखते हुए बाल सुरक्षा और रोकथाम प्रणालियों के उपयोग को अनिवार्य बनाया गया है। प्रस्तावित बिल में पहले 5 वर्षों के दौरान 2 लाख जीवन बचाने और सड़क परिवहन की सुरक्षा और निपुणता में सुधार करके राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद को चार प्रतिशत बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। मेक इन इंडिया के तहत इसका उद्देश्य सड़क परिवहन क्षेत्र में अधिक निवेश करके 10 लाख रोजगार सृजन करने का है।
सरकार ने कुछ राजमार्ग खंडों जैसे राष्ट्रीय राजमार्ग-8 के गुड़गांव/जयपुर खंड पर 2013-14 में, रांची राष्ट्रीय राजमार्ग-33 के रांची-राड़गांव-महुलिया खंड और राष्ट्रीय राजमार्ग-8 के वडोडरा, मुंबई खंड पर 2014-15 में पहले ही सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में बिना पैसे के इलाज के लिए एक पायलट परियोजना शुरू कर रखी है। गोल्डन आवर अर्थात् पहले 48 घंटों के दौरान सड़क दुर्घटनाओं के शिकार लोगों का जीवन बचाने के लिए तुरंत उचित चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराने की यह एक पहल है। जिसमें खर्च की सीमा 30 हजार रूपये है। इन राजमार्गों के इन खंडों में 24x7 टॉल फ्री नंबर 1033 को भी एक्टिवेट किया गया है। पायलट प्रोजेक्ट के आंकड़ों को सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों के कैसलैस इलाज के लिए पेन-इंडिया योजना को तैयार करने में उपयोग किया जाएगा।
सड़क सुरक्षा जनता की भलाई के लिए है। सड़क सुरक्षा नीति और प्रस्तावित अधिनियम, दोनों में जनता के बीच जागरूकता फैलाने और सड़क यात्रा को सुरक्षित बनाने में जनता की भूमिका के बारे में उसे शिक्षित करने पर जोर दिया गया है।इस बात को ध्यान में रखते हुए विभिन्न हितधारकों को जागरूक बनाने के लिए हर साल जनवरी में ‘सड़क सुरक्षा सप्ताह’ का आयोजन किया जाता है। इस अभियान का उद्देश्य मात्र साधारण नियम लागू करते हुए सुरक्षित सड़क यात्रा की जरूरत उजागर करना है।
सड़क सुरक्षा के तौर-तरीकों और आवश्यकताओं के बारे में विविध प्रकार के कार्यक्रम जैसे वाहन चलाते समय हेल्मेट्स या सीट बेल्ट्स का इस्तेमाल, मेडिकल जांच शिविर, शैक्षिक संस्थानों में ड्राइविंग प्रशिक्षण कार्यशालाओं और प्रतिस्पर्धात्मक कार्यक्रमों का आयोजन, विभिन्न समूहों जैसे सड़क पर यात्रा करने वालों, चालकों तथा स्कूली बच्चों, छात्रों और युवाओं के समूहों को लक्षित करते हुए किया जाता है।दूसरी ओर, सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को बेहतर बनाने, यातायात व्यवस्था के उचित प्रबंधन और उत्सर्जन नियमों का सख्ती से पालन कराने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। हर साल जागरूकता जगाने के लिए एक विशिष्ट विषय का चयन किया जाता है। कुछ ऐसे विषयों में ‘’स्थायी आपूर्ति श्रृंखला बनाने के लिए सुरक्षा की संस्कृति की रचना कीजिए’’, ‘’ सुरक्षा महज एक नारा नहीं है, जीवन शैली है’’, ‘’ वॉक फॉर रोड सेफ्टी’’, ‘’स्टे अलाइव, डोंट ड्रिंक एंड ड्राइव’’ और ‘’सड़क सुरक्षा मिशन है, विराम नहीं’’ आदि पहले ही सप्ताह के आयोजन के दौरान प्रदर्शित किए जाते रहे हैं।
27वां सड़क सुरक्षा सप्ताह 11 जनवरी (सोमवार) से 17 जनवरी (रविवार) तक आयोजित किया गया। इस साल के अभियान के दौरान ‘’रोड सेफ्टी- टाइम फॉर एक्शन’’ पर ध्यान केंद्रित किया गया। सड़क सुरक्षा के लिए अभियान सिर्फ तभी सफल हो सकता है, जब सभी हितधारक जैसे परिवहन, बीमा, स्वास्थ्य, विधि व्यवसायियों, राजमार्ग अभियंताओं और वाहनों के निर्माताओं को साथ जोड़ा जाए। बच्चों तथा स्कूल एवं कॉलेज के छात्रों को शुरूआत से ही सड़क उपयोग करने के तरीका सिखाया जाना चाहिए। सड़क सुरक्षा शिक्षा स्कूल पाठ्यक्रम का भाग होना चाहिए ताकि सुरक्षा शुरूआत से ही आदत और जीवन शैली बन सके।
गुरूत्वाकर्षी लहरें : आइंस्टीन की विरासत
एल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत की अंतिम भविष्यवाणी गुरूत्वाकर्षी लहरें हैं। गुरूत्वाकर्षी लहरों की पहली बार पहचान करने की घोषणा 11 फरवरी को एडवान्स्ड लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्जरवेट्री (एलआईजीओ) ने की थी। एलआईजीओ के दो विशाल डिटेक्टर हैं। पहला डिटेक्टर लिविंगस्टोन, लुइसियाना में है और दूसरा हैनफोर्ड, वाशिंगटन में है। इस नई खोज ने भौतिकी में तीन मील के पत्थर स्थापित किए-
1. गुरूत्वाकर्षी लहरों की सीधी पहचान
2. बाइनेरी ब्लैकहोल प्रणाली की पहली पहचान
3. आइंस्टीन के सिद्धांत द्वारा प्रतिपादित की ब्लैकहोल पदार्थ हैं, उनके बारे में प्रत्यक्ष प्रमाण
न्यूटन के भौतिक सिद्धांतों के अनुसार गुरूत्वाकर्षण एक ऐसा बल है, जो दो पदार्थों को एक-दूसरे की तरफ खींचता है। आइंस्टीन ने 1915 में सापेक्षता सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए गुरूत्वाकर्षण के बारे में एक नई अवधारणा पेश की थी।
एलआईजीओ ने दो ब्लैकहोलों से गुरूत्वाकर्षी लहरों के संकेतों का पता लगाया था। यह लहरें प्रकाश गति से संबंधित हैं, जबकि गुरूत्वाकर्षण की न्यूटन अवधारणा अनन्त गति का प्रतिपादन करती है।
गुरूत्वाकर्षी लहरों के संबंध में भारत का भी बहुत योगदान है। पिछले दो दशकों के दौरान भारतीय वैज्ञानिक समुदाय गुरूत्वाकर्षी लहरों पर काम कर रहा था। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने गुरूत्वाकर्षी लहरों का पता लगाने वाले दल में शामिल भारतीय वैज्ञानिकों की प्रशंसा की है। उन्होंने इस संबंध में ट्वीट करते हुए कहा, ‘गुरूत्वाकर्षी लहरों का पता लगाने वाला ऐतिहासिक कार्य ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बढ़ाएगा। मुझे आशा है कि इस दिशा में हम बड़ा योगदान करेंगे।’
इस खोज से गुरूत्वाकर्षी लहर खगोलशास्त्र के एक नए युग की शुरूआत हुई है और इससे हमें ब्रह्मांड के उत्पन्न होने संबंधी बुनियादी सवालों का हल मिल सकता है।
रविवार, 6 मार्च 2016
भूमिगत जल संरक्षण वक्त की ज़रुरत
देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और भारतीय अर्थव्यवस्था में भूमिगत जल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 1970 के दशक में हरित क्रांति की शुरूआत के दौरान भूमिगत जल के प्रयोग में महत्वपूर्ण वृद्धि शुरू हुई, जो अब तक जारी है जिसके फलस्वरूप जलस्तर घटने, खेतों में कुओं की कमी और सिंचाई स्रोतों की दीर्घकालिकता में हृास के रूप में पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ा। इसके अलावा देश में कई जगहों पर प्राकृतिक गुण और मानवोद्भव कारणों से सम्पर्क प्रभाव के कारण भूमिगत जल पीने योग्य नहीं रहा।
भू-जल की गुणवत्ता में गिरावट औऱ उत्पादक जलभृत क्षेत्रों में संतृप्ति में कमी के दोहरे खतरों से निपटने और विभिन्न हितधारकों के बीच व्यापक विचार-विमर्श के माध्यम से बेहतर भू-जल प्रशासन और प्रबंधन हेतू रणनीति तैयार करने के लिए, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा के कायाकल्प मंत्रालय ने 2015-16 के दौरान 'जल क्रांति अभियान' शुरू किया है। इस अभियान के तहत मंत्रालय ने हाल ही में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में 'बहुजल मंथन' शीर्षक से स्वच्छ और टिकाऊ भूजल पर एक राष्ट्रीय संवाद का आयोजन किया। मुख्य रूप से इसका उद्देश्य, बहुमूल्य संसाधनों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने औऱ पारिस्थितिकी के साथ तालमेल और सद्भाव प्राप्त करने के लिए भू-जल संसाधनों के विकास और इसके प्रबंधन में लगे विभिन्न हितधारकों के बीच सामूहिक बातचीत की आवश्यकता पर बल गया। एक दिन की बातचीत भूमि-गत जल के उपयोग पैटर्न में परिवर्तन की ओर अभिविन्यस्त की गयी थी जिसको लेकर बाद में क्षेत्रीय और स्थानीय दोनों स्तर पर विभिन्न हितधारकों के बीच गतिरोध पैदा हुआ। संगोष्ठी में उपलब्ध भू-जल के सबसे कुशल उपयोग सुनिश्चित करने के लिए उपकरण और उपाय, दीर्घकालिक भू-जल की गुणवत्ता को बनाए रखने, और बढ़ती मांग का सामना करने के लिए भू-जल के प्रबंधन से संबंधित उभरते मुद्दों को संबोधित किया गया।
विशेषज्ञों और विभिन्न मंत्रालयों, सरकार, संगठनों, गैर सरकारी संगठनों, भू-जल डोमेन पर काम कर रहे अनुसंधान संस्थानों के देश भर से आयें अधिकारियों, प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों और हितधारकों जैसे किसानों और उद्योगपतियों सहित लगभग 2000 लोगों ने इस संगोष्ठी में भाग लिया।
भारत सरकार के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में अपर सचिव, डॉ अमरजीत सिंह ने कार्यक्रम के तकनीकी सत्र का उद्घाटन किया । डॉ अमरजीत सिंह ने जल संरक्षण और प्रबंधन अभियान की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए छात्रों और युवा पेशेवरों का आह्वान किया। उन्होंने उदाहरण दे कर बताया कि किस प्रकार इस्ररायल 98 प्रतिशत वर्षा के पानी का उपयोग करता है और वैज्ञानिकों/प्रबंधकों से हमारे देश में भी यह संभव बनाने के लिए प्रौद्योगिकी में सुधार करने के लिए कहा।
तकनीकी सत्र को निम्न विषयों पर चार भागों में विभाजित किया गया था:
1. जिओजेनिक भू-जल प्रदूषण - आर्सेनिक और फ्लोराइड के विशेष संदर्भ में, मानवजनित भू-जल प्रदूषण - शमन उपाय।
2. भू-जल पर दबाव वालें क्षेत्र - सतत उपयोग के लिए हस्तक्षेप प्रबंधन, भू-जल मानचित्रण और हालिया तकनीक का इस्तेमाल।
3. जल संरक्षण और सतही और भूमिगत जल का कुशल तरीके से संयुक्त उपयोग।
4. जलवायु परिवर्तन और रणनीतियों के लिए भू-जल तंत्र प्रतिक्रिया। भू-जल: कुशल उपयोग और उसके सतत प्रबंधन के लिए लोगों की भागीदारी।
उल्लेखित विषय के विभिन्न पहलुओं से संबंधित कुल 27 पेपर तकनीकी सत्र के दौरान प्रस्तुत किए गए। तकनीकी सत्र ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं:
• मानव स्वास्थ्य पर जिओजेनिक / मानवजनित प्रदूषण का प्रभाव बेहतर ढंग से समझने के लिए अध्ययन किया जाएगा।
• भूजल प्रदूषण के दूर करने के लिए पायलट अध्ययन और अधिक तेजी से किया जाना चाहिए।
• जन जागरूकता एवं क्षमता निर्माण अभियान के माध्यम से भू-जल प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में समुदायिक भागीदारी को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
• पूरे देश में बड़े पैमाने पर मानचित्रण का कार्य करने के लिए विद्युत प्रतिरोधकता टोमोग्राफी और हैली जनित सर्वेक्षण जैसी उन्नत भूभौतिकीय अध्ययन किए जाने चाहिए।
• सुदूर संवेदन तकनीक भू-जल री-चार्च और ड्राफ्ट की कंप्यूटिंग की वर्तमान पद्धति की पूरक हो सकती है।
• कृत्रिम पुनर्भरण तकनीक की योजना बनाई हो स्रोत पानी के लिए समुद्र और वैकल्पिक व्यवस्था में मीठे पानी समुद्री जल इंटरफेस पुश करने के लिए नियोजित किया जाना चाहिए।
• सतह और भूमिगत जल के संयुक्त उपयोग के लिए, दो प्रायोगिक परियोजनाओं का क्रियान्वयन दो बड़े नहर कमांड क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहां अध्ययन पहले ही पूरा किया जा चुका है।
• नहर के पानी के साथ संयुक्त उपयोग के लिए गहरे जलवाही स्तर से भू-जल प्रयोग का सफल प्रदर्शन किया गया है, लेकिन किसानों के उथले नलकूप पर इसके प्रभाव के कानूनी पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए।
• देश के पूर्वी राज्यों में बड़े पैमाने पर भू-जल विकास संभव है और भारत में खाद्य सुरक्षा हासिल करने के लिए इन क्षेत्रों में एक दूसरी 'हरित क्रांति' की आवश्यकता है।
• सफल कृषि पारिस्थितिकी के श्रेष्ठ कार्यों को अरक्षणीय भू-जल विकास के क्षेत्रों में दोहराये जाने करने की जरूरत है जैसे उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्र।
• एक जल विवरणिका के नीचे बड़े पैमाने पर खनन के लिए किसी प्रस्ताव की मंजूरी के लिए व्यावहारिक जल संसाधन प्रबंधन योजना को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
• देश के भू-जल संसाधनों की भरपाई करने के लिए उपयुक्त डिजाइन वाली जल संरक्षण संरचनाओं के कार्यान्वयन के माध्यम से पहाड़ी क्षेत्रों में झरनों के संरक्षण और बोरवेल के अंधाधुंध निर्माण को सीमित करके भू-जल के संरक्षण के लिए प्रयास करने होंगे ।
• विशेष रूप से कृषि जरूरतों के संबंध में जलवायु परिवर्तन के परिणाम के रूप में वर्तमान और अनुमानित पानी की कमी को पूरा करने के लिए जलवायु अनुकूलन रणनीतियों में भू-जल प्रबंधन को शामिल करना चाहिए।
• ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक के माध्यम से भूजल से पानी की क्षमता में सुधार करने के लिए जलभृत विशेषताओं को भू-जल संरचनाओं से जोड़ा जाना चाहिए।
• ग्रामीण क्षेत्रों से विशेष रूप से महिलाओं को जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से गैर-पीने योग्य पानी और उससे संबंधित सभी स्वास्थ्य खतरों से अवगत कराया जाना चाहिए। उन्हें पानी को संरक्षित करने, खुले कुओं में जल स्तर को मापने, पानी के गुणों का परीक्षण करने और उपयोग के लिए इसे सुरक्षित बनाने की विभिन्न तकनीकों को जानने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उन्हें सभी क्षेत्रों के लिए पानी के वितरण में भागीदार बनाया जाना चाहिए जिससे जिम्मेदारी, न्याय, अधिकारों का सम्मान और गरीबों की हकदारी होगी।
भू-जल मंथन के समापन सत्र को संबोधित करते जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने वर्षा जल संचयन के माध्यम से भू-जल की बर्बादी को कम करने और भरपाई के लिए अभियान में लोगों की भागीदारी की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने आम जनता से पानी के मुद्दों को विवादास्पद नहीं बनाने के साथ ही उसे समुदायों और राज्यों के बीच बेहतर संबंधों को बढ़ावा देने के लिए उपकरण के रूप में उपयोग करने के लिए अपील की।
शनिवार, 5 मार्च 2016
जलवायु परिवर्तन का खेत-खलिहानों पर असर
वर्ष 2015 कृषि क्षेत्र के लिए एक चुनौतीपूर्ण साल था। देश के कई हिस्सों में रुखे मौसम और सूखे के कारण किसानों के लिए यह परेशानियों का लगातार दूसरा वर्ष था, जिसने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे के तत्काल समाधान की आवश्यकता को रेखांकित किया। इनका दुष्प्रभाव इसके बाद के वर्ष में भी दृष्टिगोचर हो रहा है, क्योंकि वर्तमान गेहूं की रबी बुआई पिछले वर्ष की तुलना में 20.23 लाख हेक्टेयर कम हुई है, दालों और सब्जियों के दाम लगातार ऊंचे बने हुए हैं।
दक्षिण-पश्चिमी मानसून इससे पिछले वर्ष में 12 प्रतिशत की कमी के बाद 2015 में लंबी अवधि औसत के सामान्य स्तर से 14 प्रतिशत कम रहा, जिसका असर खरीद फसलों पर पड़ा। इसके बाद जो उत्तर-पूर्वी मानसून आया, वह तमिलनाडू एवं आस-पास के क्षेत्रों में भारी विनाश का कारण बना। इससे वहां अभूतपूर्व बाढ़ का संकट आया, जिसने पूरी तरह धान एवं नकदी फसलों को बर्बाद कर दिया।
दाल एवं तिलहनों का उत्पादन पिछले कई वर्षों से मांग की तुलना में लगातार कम होता रहा है। इस साल अनाजों के उत्पादन को लेकर बड़ी चिंताएं बनी हुई है हालांकि वर्तमान में देश में खाद्यान अधिशेष मात्रा में है पर विशेषज्ञ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कम से कम 62.5 मिलियन टन सब्सिडी प्राप्त खाद्यान्न मुहैया कराए जाने की कानूनी प्रतिबद्धता की ओर ध्यान दिलाते हैं। यही कारण है कि देश के किसान अच्छी फसल अर्जित करने के लिए बेहतर मौसम स्थितियों को लेकर अभी से चिंताग्रस्त है। चूंिक अभी भी बुआई का काम चल ही रहा है, इसलिए उम्मीदें बनी हुई है।
इस वर्ष कम नौ राज्यों ने सूखाग्रस्त जिलों की घोषणा की है। ये हैं कर्नाटक, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना एवं झारखंड। तमिलनाडू में अधिकांश जिलें तो इस वर्ष बाढ़ से बुरी तरह ग्रस्त रहे हैं। 2014-15 के दौरान भी हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश के कई जिलें सूखे की चपेट में रहे थे।
2014-15 में खाद्यान्न उत्पादन का चौथा अग्रिम अनुमान 252.68 मिलियन टन का था, जो 2013-14 से 265.04 मिलियन टन के उत्पादन से 12.36 मिलियन टन कम है। ऐसा गेहूं के उत्पादन में 6.19 मिलियन टन की गिरावट की वजह से है। चावल का उत्पादन भी थोड़ा कम रहा था। दालों का उत्पादन 2014-15 में 19.24 मिलियन टन से कम होकर 17.20 मिलियन टन रह गया, जिसकी वजह से इन खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अभूतपूर्व तेजी का संकट उत्पन्न हो गया। उदाहरण के लिए अरहर की कीमतें एक साल पहले के 75 रुपए प्रति किलोग्राम से उछल कर 199 रुपए प्रति किलोग्राम तक पहूंच गई और अभी भी ये कीमतें नियंत्रण के बाहर हैं। न केवल अरहर, उरद की कीमतें बल्कि खुदरा बाजार में लगभग सभी प्रमुख दालों की कीमतें वर्तमान में भी लगभग 140 रुपए प्रति किलोग्राम के आस-पास बनी हुई हैं। तहबाजारियों और कालाबाजारियों पर अंकुश लगाने के सरकार के प्रयासों के अपेक्षित नतीजे अभी भी नहीं दिख रहे हैं।
वर्ष के दौरान सरकार ने प्रमुख दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 275 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। सरकार को इस वर्ष प्याज एवं दालों के लिए बार-बार बाजार में हस्तक्षेत्र करने को बाध्य होना पड़ा है। केवल नियमित सब्जियों एवं फलों की बात न करें, आलू और टमाटर तक की कीमतें इस वर्ष आसमान छूती रही है। मौसम के प्रारंभ में मटर की कीमतें 110 रुपए प्रति किलोग्राम के उच्च स्तर पर चली गई थी।
स्थिति पर नियंत्रण करने के लिए सरकार ने 500 करोड़ रुपए की एक संचित राशि के साथ एक मूल्य स्थिरीकरण कोष की स्थापना की है। इस वर्ष कुछ फंड ऐसे राज्यों में दालों की सब्सिडी प्राप्त बिक्री के लिए जारी किए गए थे, जिन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभार्थियों को किफायती दरों पर दाल मुहैया कराने के लिए अन्वेषक योजनाएं प्रस्तुत की थी।
यह देखते हुए कि 2015-16 के लिए उत्पादन अनुमान अभी भी 2013-14 की बंपर फसल की तुलना में कम है, सरकार ने अरहर एवं उरद दालों के लिए 1.5 लाख टन का बफर स्टॉक सृजित करने का फैसला किया है, जिसे बाजार दरों पर सीधे किसानों द्वारा प्राप्त किया जाएगा।
सूखे की परेशानी को कम करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जिनमें महज 33 फीसदी की तुलना में अब 50 फीसदी तक नष्ट फसल क्षेत्र पर विचार करना तथा राहत राशि में 50 की बढोतरी करना शामिल है।
बताया जाता है कि महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र, जो पिछले 4 वर्षों से सूखे की मार झेल रहा है, में इस वर्ष परेशान किसानों द्वारा सबसे अधिक आत्महत्या किए जाने की खबरे आई हैं। केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र को 3050 करोड़ रुपए की सूखा राहत राशि मुहैया कराई है। मध्य प्रदेश को 2033 करोड़ रुपए, कर्नाटक को 1540 तथा छत्तीसगढ़ को 1672 करोड़ रुपए की सूखा राहत राशि मुहैया कराई गई है। यह राशि राष्ट्रीय आपदा राशि कोष से मुहैया कराई जाएगी। केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने सूखा राहत राशि के सुस्त क्रियान्वयन के लिए तथा मांग ज्ञापन भेजने में देरी के लिए राज्यों को जिम्मेदार ठहराया है, जिसके कारण किसानों की परेशानियां बढ़ीं। मंत्री महोदय ने कहा कि क्रियान्वयन राज्यों के हाथों में है। इस वर्ष रबी की निम्न बुआई में कृषि मंत्री को आकस्मिकता योजना तैयार करने को तथा प्रभावित क्षेत्र में बीजों एवं उर्वरकों को भेजने की स्थिति के लिए तैयार रहने को प्रेरित किया। पिछले वर्ष मानसून में औसत कमी 14 प्रतिशत की थी, जबकि पंजाब और हरियाणा में यह 17 प्रतिशत थी। हालांकि इन राज्यों में सिंचाई की सुविधाएं तो हैं, लेकिन फसल पूर्व रुखे मौसम में खरी फसलों को नुकसान पहुंचाया।
निम्न उत्पादकता की समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने बड़े पैमाने पर मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना लागू की है। इस योजना का लक्ष्य अगले तीन वर्षों में 14.40 करोड़ किसानों को कार्ड मुहैया कराना है। सरकार ने इस परियोजना के लिए 568.54 करोड़ रुपए आवंटित किया है। यह कार्ड किसानों को उसकी मिट्टी में पोषकता की कमी एवं उर्वरक के उपयोग से संबंधित अनुमान प्राप्त करने में सक्षम बनाएगा। किसानों को इसके तहत एक सलाह भी दी जाएगी कि किस फसल पर कितनी मात्रा में उर्वरक आदि का उपयोग किया जा सकता है।
जैविक खेती पर अपने फोकस के साथ सरकार ने परंपरागत कृषि विकास योजना की शुरुआत की है, जो क्लस्टर खेती को प्रोत्साहित करता है, जैविक खाद्य के लिए सब्सिडी को 100 रुपए प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 300 रुपए कर दिया गया था।
भारत की कृषि का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा प्रति वर्ष पर्याप्त एवं सही समय पर वर्षा होने पर निर्भर है और हाल के सूखों ने खेती के लिए सिंचाई की सुविधा बढ़ाने की जरूरत पर और ज्यादा बल दिया है। इसी के मद्देनजर सरकार ने पिछले वर्ष प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरुआत की, जिसका लक्ष्य अधिक से अधिक हेक्टेयर जमीन को सिंचाई के अंतर्गत लाना है। इसके लिए लगभग 5300 करोड़ का बजट आवंटन किया गया जिसमें त्वरित एकीकृत लाभ कार्यक्रम के लिए कोष शामिल है। कृषि मंत्रालय का कहना है कि इस कार्यक्रम के अंतर्गत ड्रिप एवं छिड़काव परियोजना के तहत लगभग 1.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र शामिल कर लिए गए हैं।
फसल बीमा एवं किसानों की आय बढ़ाने की लंबे समय से मांग की जाती रही है। पिछले वर्ष के दौरान जहां अनाजों, दालों एवं तिलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि की गई वहीं एक उचित फसल बीमा योजना की कमी अभी भी महसूस की जा रही है। संसद में सूखे पर एक बहस में जवाब देते हुए श्री राधा मोहन सिंह ने घोषणा की है कि सरकार जल्द ही एक फसल बीमा योजना लाएगी, जिसमें किसानों पर उच्च प्रीमियम का बोझ नहीं पड़ेगा और यह फसल नुकसान के आकलन में भी ज्यादा सटीक होगी।
बाजारों एवं बाजारों से संवेदनशील जानकारियां किसानों को उनकी उपज के लिए बेहतर मूल्य दिलाने में सहायक हो सकती हैं। इसके लिए सरकार एक राष्ट्रीय कृषि बाजार की स्थापना करने की योजना बना रही है, जो किसानों को ई-मार्केटिंग के जरिए किसी भी बाजार में उनकी उपज को बेचने में सक्षम बनाएगा।
वर्ष के दौरान मंत्रालय ने किसानों को अधिकार संपन्न बनाने के लिए कई मोबाईल एप्लीकेशन लांच किए। फसल बीमा एप्लीकेशन किसानों को बीमा कवर एवं उन पर लागू होने वाली प्रीमियम के बारे में जानकारी देने में मददगार होगा। ‘एग्रीमार्केट मोबाईल’ किसानों को 50 किलोमीटर की परिधि भीतर मंडी में फसलों के बाजार मूल्य को प्राप्त करने में सक्षम बनाएगा।
परिक्षेत्रों में मोबाईल एवं कनेक्टिविटी की कमी की समस्या को दूर करने के लिए कृषि मंत्रालय ने मोबाईल प्लेटफॉर्म के जरिए अपनी सभी सेवाओं को उपलब्ध कराने का फैसला किया है। दो करोड़ से अधिक किसान फसलों एवं मौसम के बारे में एसएमएस दिशानिर्देश प्राप्त करने के लिए ‘एमकिसान पोर्टल’ के उपयोग के लिए मंत्रालय के साथ पंजीकृत हो चुके हैं।
बहरहाल, इस तथ्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि मौसम की स्थितियां आज भी कृषि विकास एवं समृद्धि के लिए सबसे आवश्यक कारकों में से एक है, खासकर आने वाले वर्ष में, जब फसल उत्पादन, उपलब्धता एवं मूल्य में बढोतरी की चिंताएं सबसे अधिक हैं। 2015 में जहां बागवानी एवं मत्स्य पालन क्षेत्रों में मजबूती बनी रही, लगातार खराब मौसम के कारण कृषि क्षेत्र की वृद्धि में गिरावट आई।
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