पंडित सलिल भट्ट के वीणा के सुर हो, या फिर नृत्यांगना गरिमा आर्य के तबले की थाप पर थिरकते कदम। हर कलाकार संगीत की अपनी साधना के जरिए तबला के सूरमा रहे पंडित चतुर लाल की याद ताजा करने की भरपूर कोशिश कर रहा था।
प्रांशु चतुरलाल ने भी अपने परफॉरमेंस के जरिए संगीतप्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर दिया। सितार के धुन और राग की बदौलत गौरव मजूमदार ने लोगों को संगीत की गहराइयों में डूबकी लगाने पर मजबूर कर दिया। राग बिहाग से लेकर तीन ताल में राग किरवानी को उन्होंने कुछ इस अंदाज में पेश किया कि मानों संगीत का ये रंग सबके दिलों में उतर गया हो।
तबला के उस्ताद पंडित चतुर लाल की याद में भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य फेस्टिवल 'स्मृतियां' का आयोजन पंडित चतुरलाल मेमोरियल सोसाइटी ने किया था।
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शुक्रवार, 3 मार्च 2017
भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य फेस्टिवल 'स्मृतियां'
तबले की थाप...घुंघरू की खनक...और वीणा के सुर...संगीत से सजी ये महफिल तबला के महान उस्ताद पंडित चतुर लाल की याद में आयोजित की गई है।
दरअसल यहां मौजूद हर कलाकार ने अपनी साज के जरिए संगीत के इस महान विभूति को सच्ची श्रद्धांजलि दी। दो दिनों के इस कार्यक्रम में पंडित चतुर लाल की याद में संगीत के साधकों ने अपने परफॉरमेंस के जरिए सभागार में मौजूद लोगों का मन मोह लिया। कलाकारों ने अपनी कला के जरिए मंच पर शास्त्रीय संगीत और नृत्य की ऐसी धारा बहाई, मानों संगीत और नृत्य का ऐसा संगम शायद ही पहले कहीं और देखने को मिला हो।
पंडित सलिल भट्ट के वीणा के सुर हो, या फिर नृत्यांगना गरिमा आर्य के तबले की थाप पर थिरकते कदम। हर कलाकार संगीत की अपनी साधना के जरिए तबला के सूरमा रहे पंडित चतुर लाल की याद ताजा करने की भरपूर कोशिश कर रहा था।
प्रांशु चतुरलाल ने भी अपने परफॉरमेंस के जरिए संगीतप्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर दिया। सितार के धुन और राग की बदौलत गौरव मजूमदार ने लोगों को संगीत की गहराइयों में डूबकी लगाने पर मजबूर कर दिया। राग बिहाग से लेकर तीन ताल में राग किरवानी को उन्होंने कुछ इस अंदाज में पेश किया कि मानों संगीत का ये रंग सबके दिलों में उतर गया हो।
तबला के उस्ताद पंडित चतुर लाल की याद में भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य फेस्टिवल 'स्मृतियां' का आयोजन पंडित चतुरलाल मेमोरियल सोसाइटी ने किया था।
पंडित सलिल भट्ट के वीणा के सुर हो, या फिर नृत्यांगना गरिमा आर्य के तबले की थाप पर थिरकते कदम। हर कलाकार संगीत की अपनी साधना के जरिए तबला के सूरमा रहे पंडित चतुर लाल की याद ताजा करने की भरपूर कोशिश कर रहा था।
प्रांशु चतुरलाल ने भी अपने परफॉरमेंस के जरिए संगीतप्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर दिया। सितार के धुन और राग की बदौलत गौरव मजूमदार ने लोगों को संगीत की गहराइयों में डूबकी लगाने पर मजबूर कर दिया। राग बिहाग से लेकर तीन ताल में राग किरवानी को उन्होंने कुछ इस अंदाज में पेश किया कि मानों संगीत का ये रंग सबके दिलों में उतर गया हो।
तबला के उस्ताद पंडित चतुर लाल की याद में भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य फेस्टिवल 'स्मृतियां' का आयोजन पंडित चतुरलाल मेमोरियल सोसाइटी ने किया था।
शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017
मुंबई का काला घोड़ा फेस्टिवल
उत्सव के रंग में रंगा कला और संस्कृति का ये अनोखा संगम मुंबई की खास पहचान है। इसे लोग काला घोड़ा फेस्टिवल के नाम से जानते हैं।
आठ दिनों तक चलने वाले इस फेस्टिवल में आपको हर वो रंग देखने को मिलेगा, जिसकी ख्वाहिश एक कलाप्रेमी को होती है। इस फेस्टिवल का
मकसद न सिर्फ मुंबई की संस्कृति और परंपरा को संजोना है, बल्कि इससे दुनिया की नज़रों में लोकप्रिय भी बनाना है। यहां अलग-अलग संस्कृति
के रंग को देखकर शायद भूल जाएंगे कि आप मायानगरी मुंबई में है। इस फेस्टिवल में कला और कलाकार की काबलियत देखकर आप हैरानी में पड़ जाएंगे।
यह जानकर आपको हैरानी होगी इस फेस्टिवट का मकदस सिर्फ कला और संस्कृति की खूबसूरती से दुनिया को रुबरू कराना नहीं है,
हक़ीक़त में इसके जरिए लोगों को पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों से दो-चार कराना है। यहां आने के बाद आप तेज़ रफ्तार की जिंदगी
का गम भूल जाएंगे। रंग-बिरंगे कलाकृति जैसे विशिंग ट्री, फ्लाइंग हॉर्स और ह्यूमन ट्री को देखकर आपको ऐसे सुकून का अहसास होगा,
मानों लंबे समय से आपको इसी पल का इंतजार था। गौर करने वाली बात है कि विशिंग ट्री में करीब एक हज़ार एलईडी बल्ब का इस्तेमाल
किया गया है। लेकिन लेकिन बिजली की खपत महज 0.5K व्हाट होती है। कला और मस्ती के इस फेस्टिवल में हर उम्र और वर्ग के
लोगों के लिए कुछ न कुछ खास है।
काला घोड़ा फेस्टिवल में हर स्टॉल की अपनी अलग खासियत और पहचान है। कई स्टॉल तो ऐसे हैं, जिसे देखकर आप बचपन की यादों
में खोने को मजबूर हो जाएंगे। यहीं नहीं यहां कला, संस्कृति और मस्ती के साथ ही विकास की झलक भी देखने को मिलती है।
काला घोड़ा फेस्टिवल में मुंबई मेट्रो के तीसरे फेज के बारे में जानकारी दी गई है। इसके रूट और संचालन के बारे में बताया गया है।
यहीं नहीं अगर आपके पास ऊर्जा संरक्षण को लेकर कोई आइडिया है तो आप इसे भी साझा कर सकते हैं। ओपन एयर ऑटो रिक्शा को
देखकर आपको फिल्मी सीन का अहसास होगा। यहां की गलियों में थियेटर, कलाकार से लेकर डायरेक्टर तक अपने टैलेंट का हुनर आजमाते
हुए दिख जाएंगे। क्योंकि ये फेस्टिवल मुंबई का इकलौता ऐसा मंच है, जहां मौके अनलिमिटेड है वो भी बिलकुल फ्री ऑफ कॉस्ट।
काला घोड़ा फेस्टिवल में हर स्टॉल की अपनी अलग खासियत और पहचान है। कई स्टॉल तो ऐसे हैं, जिसे देखकर आप बचपन की यादों
में खोने को मजबूर हो जाएंगे। यहीं नहीं यहां कला, संस्कृति और मस्ती के साथ ही विकास की झलक भी देखने को मिलती है।
काला घोड़ा फेस्टिवल में मुंबई मेट्रो के तीसरे फेज के बारे में जानकारी दी गई है। इसके रूट और संचालन के बारे में बताया गया है।
यहीं नहीं अगर आपके पास ऊर्जा संरक्षण को लेकर कोई आइडिया है तो आप इसे भी साझा कर सकते हैं। ओपन एयर ऑटो रिक्शा को
देखकर आपको फिल्मी सीन का अहसास होगा। यहां की गलियों में थियेटर, कलाकार से लेकर डायरेक्टर तक अपने टैलेंट का हुनर आजमाते
हुए दिख जाएंगे। क्योंकि ये फेस्टिवल मुंबई का इकलौता ऐसा मंच है, जहां मौके अनलिमिटेड है वो भी बिलकुल फ्री ऑफ कॉस्ट।
मंगलवार, 3 जनवरी 2017
साइकिल के जरिए सत्ता की खातिर समाजवादियों की जंग
लखनऊ में शुरू हुई समाजवादी पार्टी के कुनबे की कलह ने पहले परिवार में दरार पैदा की। उसके बाद समाजवादी पार्टी को दो हिस्सों में बांटा और अब समाजवादियों की लड़ाई दिल्ली में चुनाव आयोग के दफ्तर में लड़ी जा रही है। पहले मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, अमर सिंह और जयप्रदा की टोली ने सोमवार को चुनाव आयोग के सामने चुनाव चिन्ह साइकिल पर अपने दावे को लेकर अपना पक्ष रखा। आज सीएम अखिलेश यादव खेमे के नेता नरेश अग्रवाल, किरणमय नंदा और रामगोपाल यादव ने भी चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष रखा और कहा कि 90 फीसदी पार्टी के कार्यकर्ता सीएम अखिलेश यादव के साथ है, लिहाजा विधानसभा चुनाव में साइकिल कि सवारी करने का हक उन्हें ही मिलना चाहिए। सूत्रों के मुताबिक अखिलेश यादव ने प्लान बी भी तैयार कर रखा है। इसके अनुसार अगर उन्हें साइकिल चुनाव चिन्ह नहीं मिला तो वह साइकिल की दोनों टायर पंचर भी कर सकते हैं यानि चुनाव आयोग से लेकर अदालत तक में इस बात को लेकर गुहार लगा सकते हैं कि साइकिल चुनाव चिन्ह को फिलहाल फ्रीज कर दिया जाए। हालांकि ज्यादातर विशेषज्ञों का भी यहीं मानना है कि चुनाव की तारीख बेहद करीब है ऐसे में इस तरह के मामलों की सुनवाई और उस पर अंतिम फैसला देने में करीब-करीब 6 महीने का वक्त लग जाता है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त वाइ एस कुरैशी ने भी तेलगु देशम पार्टी के मामले में एनटीआर औऱ चंद्रबाबू नायडू के मामले का हवाला देते हुए कहा कि उस वक्त इसलिए फैसला दिया जा सका क्योंकि चुनाव सिर पर नहीं था। दूसरी बात उन्होंने यह कही कि लोकतंत्र में संख्या का बड़ा ही महत्व होता है। लिहाजा विधायक, सांसदों और पार्टी कार्य़कर्ताओं की संख्या जिसके पास ज्यादा होगी, असल में पार्टी पर उसी का हक ज्यादा बनता है। इस लिहाज से देखें तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का दावे में भी दम नज़र आता है। मुलायम खेमा यह दावा कर रहा है कि अखिलेश और रामगोपाल यादव को पार्टी में वापस लेने की घोषणा तो की गई लेकिन इस बारे में औपचारिक तौर पर कोई आदेश नहीं जारी किया गया। लिहाजा ऐसे में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव को समाजवादी पार्टी के नाम पर आपात राष्ट्रीय महाधिवेशन बुलाने का कोई हक़ नहीं है। लेकिन रामगोपाल यादव का कहना है कि महाधिवेशन बुलाने की घोषणा उन्होंने तब की थी जब वह समाजवादी पार्टी में बतौर महासचिव काम कर रहे थे और उन्हें उस वक्त पार्टी से नहीं निकाला गया था। और जब वह महाधिवेशन में हिस्सा ले रहे थे उससे एक दिन पहले समाजवादी पार्टी में उनकी वापसी हो चुकी थी। ऐसे में उन्होंने जो कुछ भी किया वह समाजवादी पार्टी के संविधान के अनुसार ही है। लेकिन मुलायम खेमा और अखिलेश खेमा दोनों एक दूसरे के दावों को नकार रहे हैं।
पिछले तीन महीने से समाजवादी पार्टी में जारी घमासान में हर दिन परिवार से लेकर पार्टी तक में तकरार, दरार और दंगल की खबरें लगातार आ रही है। कुछ लोगों के लिए यह रोचक हो सकता है। लेकिन ज्यादातर लोगों का मानना है कि यह बाप और बेटे के बीच की लड़ाई है। कभी पिता पुत्र पर भारी दिखाई देता है तो कभी बेटा इस लड़ाई में दो कदम आगे दिखाई देता है। इस मामले में अंदरुनी जानकारी रखने वालों का कहना है कि पूरे फसाद की जड़ कहीं और है। इस मामले का सबसे अहम पहलू मुलायम सिंह यादव के परिवार में उनकी दूसरी पत्नी साधना गुप्ता, दूसरी पत्नी का बेटा प्रतीक यादव और उनकी पत्नी अपर्णा यादव हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अखिलेश यादव के बढ़ते कद से मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता, बेटे प्रतीक यादव और उनकी पत्नी अपर्णा यादव को परेशानी हो रही थी। इनसभी लोगों को यह लग रहा था कि जिस तरीके से अखिलेश मुलायम सिंह यादव के बेटे है उसी तरीके से प्रतीक भी है। लेकिन हकीकत में मुलायम सिंह की राजनीतिक विरासत का असली वारिस तो अखिलेश यादव बनते जा रहे हैं। यहीं सही वक्त है कि अखिलेश को आगे बढ़ने से रोका जाए। अगर ऐसा अभी नहीं किया गया तो आगे चलकर अखिलेश यादव को रोकना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा। इस बात की भनक जैसे ही शिवपाल और अमर सिंह को लगी। दोनों बेहद खुश हुए। क्योंकि उन्हें तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई। उन्हें ऐसे ही मौके की तलाश थी। दोनों ने मिलकर साधना गुप्ता के जरिए मुलायम सिंह का ब्रेनवाश किया और पहले अमर सिंह सांसद बने, फिर परिवार में साधना गुप्ता और प्रतीक यादव को आगे बढ़ाने के नाम पर सीएम अखिलेश यादव के लिए मुश्किले खड़ी करने के खेल की शुरुआत कर दी गई।
पिछले तीन महीने से समाजवादी पार्टी में जारी घमासान में हर दिन परिवार से लेकर पार्टी तक में तकरार, दरार और दंगल की खबरें लगातार आ रही है। कुछ लोगों के लिए यह रोचक हो सकता है। लेकिन ज्यादातर लोगों का मानना है कि यह बाप और बेटे के बीच की लड़ाई है। कभी पिता पुत्र पर भारी दिखाई देता है तो कभी बेटा इस लड़ाई में दो कदम आगे दिखाई देता है। इस मामले में अंदरुनी जानकारी रखने वालों का कहना है कि पूरे फसाद की जड़ कहीं और है। इस मामले का सबसे अहम पहलू मुलायम सिंह यादव के परिवार में उनकी दूसरी पत्नी साधना गुप्ता, दूसरी पत्नी का बेटा प्रतीक यादव और उनकी पत्नी अपर्णा यादव हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अखिलेश यादव के बढ़ते कद से मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता, बेटे प्रतीक यादव और उनकी पत्नी अपर्णा यादव को परेशानी हो रही थी। इनसभी लोगों को यह लग रहा था कि जिस तरीके से अखिलेश मुलायम सिंह यादव के बेटे है उसी तरीके से प्रतीक भी है। लेकिन हकीकत में मुलायम सिंह की राजनीतिक विरासत का असली वारिस तो अखिलेश यादव बनते जा रहे हैं। यहीं सही वक्त है कि अखिलेश को आगे बढ़ने से रोका जाए। अगर ऐसा अभी नहीं किया गया तो आगे चलकर अखिलेश यादव को रोकना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा। इस बात की भनक जैसे ही शिवपाल और अमर सिंह को लगी। दोनों बेहद खुश हुए। क्योंकि उन्हें तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई। उन्हें ऐसे ही मौके की तलाश थी। दोनों ने मिलकर साधना गुप्ता के जरिए मुलायम सिंह का ब्रेनवाश किया और पहले अमर सिंह सांसद बने, फिर परिवार में साधना गुप्ता और प्रतीक यादव को आगे बढ़ाने के नाम पर सीएम अखिलेश यादव के लिए मुश्किले खड़ी करने के खेल की शुरुआत कर दी गई।शनिवार, 31 दिसंबर 2016
किसे मिलेगा समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह?
30 दिसंबर 2016 की शाम समाजवादी पार्टी में विभाजन की लक्ष्मण रेखा खुद पार्टी के पितामह कहे जाने वाले मुलायम सिंह यादव ने खींच दी। सियासत में सिद्धांत को दरकिनार कर पुत्र को मुख्यमंत्री बनाकर यूपी की कमान सौंपने वाले मुलायम सिंह यादव ने कठोर फैसला लेते हुए सीएम अखिलेश और प्रोफेसर राम गोपाल यादव को समाजवादी पार्टी से 6 साल के लिए निकाल दिया। जिस वक्त मुलायम सिंह यादव अपने बेेटे सीएम अखिलेश यादव को पार्टी से निकालने की घोषणा कर रहे थे, उनके चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था कि ये फैसला वह किसी के दबाव में ले रहे हैं। संवाददाता सम्मेलन में पहले उन्होंने प्रोफेसर रामगोपाल यादव को निकालने जाने के बारे में विस्तार से बताया। लेकिन जब बात बेटा और सीएम अखिलेश यादव को निकालने की आई तो उन्होंने इसका ऐलान करने के बजाए पहले भाई शिवपाल यादव से पूछा कि अखिलेश के बारे में भी अभी ही बोल दे क्या? पहले से ही इसी मौके की ताक में बैठे शिवपाल यादव ने तुरंत ही हामी भरी और कहा हां अभी कर देते हैं।
इससे साफ है कि मुलायम सिंह यादव खुद इस फैसले को लेकर जल्दबाजी नहीं दिखाना चाह रहे थे। कल समाजवादी पार्टी में हर फैसला नेताजी मुलायम सिंह यादव से पूछ कर किया जाता था, लेकिन मौके की नजाकत देखिए कि अब वही मुलायम कोई भी फैसला लेने से पहले भाई शिवपाल सिंह यादव से पूछते हैं कि करें या नहीं करें। इससे साफ है कि मुलायम सिंह यादव दिल से नहीं चाहते थे कि अखिलेश को पार्टी से निकाला जाए। तभी तो उन्होंने कहा कि प्रोफेसर रामगोपाल यादव अखिलेश यादव का भविष्य खराब कर रहे हैं। इतना सब होने के बाद लखनऊ की सड़कों पर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं का सैलाब उमड़ आया। सीएम अखिलेश यादव के घर के बाहर भारी भीड़ जमा हो गई। ऐसा ही कुछ नजारा मुलायम सिंह यादव के घर के बाहर भी देखने को मिला। लेकिन अब आगे क्या होगा। राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा। क्या अखिलेश विधानसभा भंग करने की अनुशंसा करेंगे। मुलायम सिंह का अगला कदम क्या होगा। क्या वह सीएम अखिलेश की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश करेंगे। या अखिलेश यादव खुद ही अपने पद से इस्तीफा देकर जनता के बीच नया जनादेश लेने के लिए जाएंगे। इससे भी बड़ा सवाल है कि चुनाव में समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह पर कौन चुनाव लड़ेगा। मुलायम सिह यादव की समाजवादी पार्टी या अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी। इन तमाम बातों को लेकर सस्पेंस अभी बरकरार है। आज मुलायम और अखिलेश ने एक के बाद एक कई बैठक बुलाई है। देखना यह दिलचस्प होगा कि पार्टी के ज्यादातर विधायक और नेता इस मुश्किल घड़ी में पिता-पुत्र में से किसका साथ देते हैं। वैसे अंतिम फैसला तो चुनाव में जनता को करना है।
इससे साफ है कि मुलायम सिंह यादव खुद इस फैसले को लेकर जल्दबाजी नहीं दिखाना चाह रहे थे। कल समाजवादी पार्टी में हर फैसला नेताजी मुलायम सिंह यादव से पूछ कर किया जाता था, लेकिन मौके की नजाकत देखिए कि अब वही मुलायम कोई भी फैसला लेने से पहले भाई शिवपाल सिंह यादव से पूछते हैं कि करें या नहीं करें। इससे साफ है कि मुलायम सिंह यादव दिल से नहीं चाहते थे कि अखिलेश को पार्टी से निकाला जाए। तभी तो उन्होंने कहा कि प्रोफेसर रामगोपाल यादव अखिलेश यादव का भविष्य खराब कर रहे हैं। इतना सब होने के बाद लखनऊ की सड़कों पर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं का सैलाब उमड़ आया। सीएम अखिलेश यादव के घर के बाहर भारी भीड़ जमा हो गई। ऐसा ही कुछ नजारा मुलायम सिंह यादव के घर के बाहर भी देखने को मिला। लेकिन अब आगे क्या होगा। राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा। क्या अखिलेश विधानसभा भंग करने की अनुशंसा करेंगे। मुलायम सिंह का अगला कदम क्या होगा। क्या वह सीएम अखिलेश की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश करेंगे। या अखिलेश यादव खुद ही अपने पद से इस्तीफा देकर जनता के बीच नया जनादेश लेने के लिए जाएंगे। इससे भी बड़ा सवाल है कि चुनाव में समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह पर कौन चुनाव लड़ेगा। मुलायम सिह यादव की समाजवादी पार्टी या अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी। इन तमाम बातों को लेकर सस्पेंस अभी बरकरार है। आज मुलायम और अखिलेश ने एक के बाद एक कई बैठक बुलाई है। देखना यह दिलचस्प होगा कि पार्टी के ज्यादातर विधायक और नेता इस मुश्किल घड़ी में पिता-पुत्र में से किसका साथ देते हैं। वैसे अंतिम फैसला तो चुनाव में जनता को करना है। शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016
समाजवादी पार्टी - पारिवारिक कलह से बगावत तक का सफर
समाजवादी पार्टी में सत्ता के लिए जारी कलह को लेकर लंबे समय तक शांति और संयम दिखाने वाले सीएम अखिलेश यादव ने अब बगावती तेवर अपना लिए है। कभी बात-बात पर नेताजी की दुहाई देने वाले मुख्यमंत्री ने अखिलेश यादव ने अब पिता मुलायम सिंह यादव के प्रति मोह का त्याग कर दिया है। अखिलेश को इस बात का अंदाजा लग गया था कि विरोधी खेमा यानि चाचा शिवपाल यादव नेताजी को उनके खिलाफ ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। यहीं नहीं नेताजी खुद भी हर कदम पर बेेटे अखिलेश का साथ देने के बजाए विरोधी खेमे के सुर में सुर मिलाते नज़र आ रहे थे। नेताजी मुलायम सिंह के बदले तेवर से परेशान सीएम अखिलेश के लिए बदले हुए हालात में हर दिन किसी इम्तिहान से कम नहीं था, ऊपर से चुनाव तैयारियों के लिए सीमित समय रह गया था।
नेताजी मुलायम सिंह की ओर से जारी समाजवादी पार्टी उम्मीदवारों की सूची ने पूरी तरह से साफ कर दिया कि समाजवादी पार्टी में अगर सब कुछ ऐसा ही चलता रहा तो अखिलेश यादव के लिए करने को कुछ नहीं रह जाएगा। लिहाजा समय की मांग को देखते हुए सीएम अखिलेश यादव को अपने पिता, पार्टी और उसके तथाकथित नेताओं के खिलाफ बागी तेवर अपनाना पड़ा। सपा मुखिया मुलायम सिंह के उम्मीदवारों की सूची जारी करने के एक दिन बाद ही अखिलेश ने दो सौ से ज्यादा अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। इसके कुछ घंटों के भीतर ही चाचा शिवपाल ने भी उम्मीदवारों की एक लिस्ट जारी कर दी है। अब चुनाव के मैदान में पार्टी में जारी कलह के बाद दंगल, कोहराम और संग्राम होने की उम्मीद ही बाकी रह गई है।
नेताजी मुलायम सिंह की ओर से जारी समाजवादी पार्टी उम्मीदवारों की सूची ने पूरी तरह से साफ कर दिया कि समाजवादी पार्टी में अगर सब कुछ ऐसा ही चलता रहा तो अखिलेश यादव के लिए करने को कुछ नहीं रह जाएगा। लिहाजा समय की मांग को देखते हुए सीएम अखिलेश यादव को अपने पिता, पार्टी और उसके तथाकथित नेताओं के खिलाफ बागी तेवर अपनाना पड़ा। सपा मुखिया मुलायम सिंह के उम्मीदवारों की सूची जारी करने के एक दिन बाद ही अखिलेश ने दो सौ से ज्यादा अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। इसके कुछ घंटों के भीतर ही चाचा शिवपाल ने भी उम्मीदवारों की एक लिस्ट जारी कर दी है। अब चुनाव के मैदान में पार्टी में जारी कलह के बाद दंगल, कोहराम और संग्राम होने की उम्मीद ही बाकी रह गई है। मंगलवार, 27 दिसंबर 2016
अपनी नैया डुबोने में जुटे समाजवादी नेता
मुलायम सिंह यादव के कुनबे में मचा कोहराम, यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी की नैया डुबोकर शांत ही होगा, ऐसा हम नहीं कह रहे, बल्कि विरोधियों का मानना है कि मुलायम सिंह यादव खुद अपने बेटे की चुनावी नैया डुबोने पर तुले हैं। पांच साल पहले चुनावी जीत मिलने पर मुलायम सिंह यादव ने सबकी राय को दरकिनार कर बेटे अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था।
लेकिन पांच साल बीतते बीतते मुलायम का अखिलेश प्रेम एक दम से हवा हो गया। आखिर पिता-पुत्र के रिश्ते में दरार के पीछे की वजह क्या है। खुद सीएम अखिलेश कई बार दोहरा चुके हैं कि वह नेताजी की हर बात मानने को तैयार है। लेकिन नेताजी अब सीएम अखिलेश की कोई बात सुनने को राजी नहीं है। उन्हें तो अब अपने बेटे की कामयाबी से जलन महसूस होने लगी है। लेकिन उनकी मजबूरी है कि वह इस परेशानी का खुलकर इजहार भी नहीं कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो हालात कुछ इस कदर हो गए कि खुद सीएम अखिलेश अपने पिता के गले की हड्डी बन चुके हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव की मजबूरी कहें या कमजोरी वह चाहकर भी अखिलेश के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहने से बचते हैं। लेकिन जब भी कुछ करने की बारी आती है तो सीधे या गुजचुप तरीके से उनका निशाना अखिलेश यादव पर ही होता है। सदियों से कानूनी तौर पर पिता का वारिस उसकी औलाद को माना जाता है। यह परंपरा भारत में अघोषित तौर पर हर सियासी पार्टी में देखने को मिलती है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टीं कांग्रेस है, यहां नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक खानदानी विरासत को सियासत में आज तक आगे बढ़ाने में जुटे हैं। ऐसे में अगर अखिलेश राजनीति में खुद को नेताजी का असली वारिस मानते हैं तो इसमें गलत क्या है। बेटे की इच्छा होती है कि वह पिता के बनाए रास्ते पर आगे बढ़े और हर पिता की ये तमन्ना होती है कि उसका बेटा तरक्की की राह पर आगे बढ़े और अपने साथ खानदान का भी नाम रौशन करें। लेकिन समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह के परिवार में यही बात विवाद की असली वजह बन गई है। मुलायम को अब अपना बेटा रास नहीं आ रहा है। समाजवादी पार्टी में दो गुट बन गए हैं। एक गुट की कमान शिवपाल के हाथों में है तो दूसरा गुट मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ है। अचानक से मुलायम सिंह यादव भाई शिवपाल को लेकर कुछ ज्यादा ही प्रेम दिखाने लगे हैं। यहां तक कि शिवपाल के खिलाफ बोलने पर उन्होंने समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव तक को पार्टी से निलंबित कर दिया था। ऐसे में समाजवादी पार्टी के छोटे मोटे नेताओं की क्या औकात की वह शिवपाल यादव के खिलाफ कुछ भी बोलने की हिम्मत जुटा सके। मुलायम सिंह यादव ने पार्टी के भीतर अखिलेश यादव को कमजोर साबित करने के लिए उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पद से उन्हें हटा दिया। साथ ही यह पद अखिलेश के घोर विरोधी शिवपाल यादव को सौंप दिया। पहले से मौके की ताक में बैठे शिवपाल ने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी मिलते ही चुन-चुन कर अखिलेश के समर्थकों को समाजवादी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया है। यहीं नहीं शिवपाल यादव ने सीएम अखिलेश के जले पर नमक छिड़कने के इरादे से उन तमाम लोगों को पार्टी में एक-एक कर वापस लाना शुरू कर दिया है, जिसे सीएम अखिलेश यादव ने गलती करने पर पार्टी से निलंबित या निकाल दिया था। शिवपाल ने ऐसे कुछ लोगों को पार्टी में महत्वपूर्ण ओहदों पर बिठाना भी शुरू कर दिया है। ऐसे में सीएम अखिलेश की मुश्किल है कि वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि चुनाव सिर पर हैं। किसी भी तरह की जल्दबाजी सियासी तौर पर काफी नुकसानदेह साबित हो सकती है। लिहाजा वह भी मजे हुए सियासतदान की तरह हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं। लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी वह नेताजी मुलायम सिंह यादव को समझाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं। उनकी एक दूसरी परेशानी अमर सिंह भी है। कहा जाता है कि अमर सिंह ही समाजवादी कुनबे में जारी कलह की असली वजह हैं। लेकिन सुलह की तमाम कोशिशें बेकार होने के बाद अब चुनाव से ठीक पहले पार्टी में तकरार की खबरों से होने वाले नुकसान की भरपाई समाजवादी पार्टी को चुनावी हार के रुप में चुकानी पड़ सकती है।
लेकिन पांच साल बीतते बीतते मुलायम का अखिलेश प्रेम एक दम से हवा हो गया। आखिर पिता-पुत्र के रिश्ते में दरार के पीछे की वजह क्या है। खुद सीएम अखिलेश कई बार दोहरा चुके हैं कि वह नेताजी की हर बात मानने को तैयार है। लेकिन नेताजी अब सीएम अखिलेश की कोई बात सुनने को राजी नहीं है। उन्हें तो अब अपने बेटे की कामयाबी से जलन महसूस होने लगी है। लेकिन उनकी मजबूरी है कि वह इस परेशानी का खुलकर इजहार भी नहीं कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो हालात कुछ इस कदर हो गए कि खुद सीएम अखिलेश अपने पिता के गले की हड्डी बन चुके हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव की मजबूरी कहें या कमजोरी वह चाहकर भी अखिलेश के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहने से बचते हैं। लेकिन जब भी कुछ करने की बारी आती है तो सीधे या गुजचुप तरीके से उनका निशाना अखिलेश यादव पर ही होता है। सदियों से कानूनी तौर पर पिता का वारिस उसकी औलाद को माना जाता है। यह परंपरा भारत में अघोषित तौर पर हर सियासी पार्टी में देखने को मिलती है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टीं कांग्रेस है, यहां नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक खानदानी विरासत को सियासत में आज तक आगे बढ़ाने में जुटे हैं। ऐसे में अगर अखिलेश राजनीति में खुद को नेताजी का असली वारिस मानते हैं तो इसमें गलत क्या है। बेटे की इच्छा होती है कि वह पिता के बनाए रास्ते पर आगे बढ़े और हर पिता की ये तमन्ना होती है कि उसका बेटा तरक्की की राह पर आगे बढ़े और अपने साथ खानदान का भी नाम रौशन करें। लेकिन समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह के परिवार में यही बात विवाद की असली वजह बन गई है। मुलायम को अब अपना बेटा रास नहीं आ रहा है। समाजवादी पार्टी में दो गुट बन गए हैं। एक गुट की कमान शिवपाल के हाथों में है तो दूसरा गुट मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ है। अचानक से मुलायम सिंह यादव भाई शिवपाल को लेकर कुछ ज्यादा ही प्रेम दिखाने लगे हैं। यहां तक कि शिवपाल के खिलाफ बोलने पर उन्होंने समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव तक को पार्टी से निलंबित कर दिया था। ऐसे में समाजवादी पार्टी के छोटे मोटे नेताओं की क्या औकात की वह शिवपाल यादव के खिलाफ कुछ भी बोलने की हिम्मत जुटा सके। मुलायम सिंह यादव ने पार्टी के भीतर अखिलेश यादव को कमजोर साबित करने के लिए उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पद से उन्हें हटा दिया। साथ ही यह पद अखिलेश के घोर विरोधी शिवपाल यादव को सौंप दिया। पहले से मौके की ताक में बैठे शिवपाल ने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी मिलते ही चुन-चुन कर अखिलेश के समर्थकों को समाजवादी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया है। यहीं नहीं शिवपाल यादव ने सीएम अखिलेश के जले पर नमक छिड़कने के इरादे से उन तमाम लोगों को पार्टी में एक-एक कर वापस लाना शुरू कर दिया है, जिसे सीएम अखिलेश यादव ने गलती करने पर पार्टी से निलंबित या निकाल दिया था। शिवपाल ने ऐसे कुछ लोगों को पार्टी में महत्वपूर्ण ओहदों पर बिठाना भी शुरू कर दिया है। ऐसे में सीएम अखिलेश की मुश्किल है कि वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि चुनाव सिर पर हैं। किसी भी तरह की जल्दबाजी सियासी तौर पर काफी नुकसानदेह साबित हो सकती है। लिहाजा वह भी मजे हुए सियासतदान की तरह हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं। लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी वह नेताजी मुलायम सिंह यादव को समझाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं। उनकी एक दूसरी परेशानी अमर सिंह भी है। कहा जाता है कि अमर सिंह ही समाजवादी कुनबे में जारी कलह की असली वजह हैं। लेकिन सुलह की तमाम कोशिशें बेकार होने के बाद अब चुनाव से ठीक पहले पार्टी में तकरार की खबरों से होने वाले नुकसान की भरपाई समाजवादी पार्टी को चुनावी हार के रुप में चुकानी पड़ सकती है। शुक्रवार, 22 जुलाई 2016
भारत में खनिज का मौजूदा परिदृश्य
·खनन सेक्टर हमारी अर्थव्यवस्था का बुनियादी सेक्टर है । यह विभिन्न महत्वपूर्ण उद्योगों को बुनियादी कच्ची सामग्री उपलब्ध कराता है ।
· सी एस ओ द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार खनन सेक्टर (र्इंधन, आवणिक, प्रमुख तथा गौण खनिजों सहित) ने वर्ष 2014-15 में सकल घरेलू उत्पाद में 2.4 % का योगदान दिया है ।
· खनिजों के उत्पादन के मामले में पिछले वर्षों की तुलना में खनन सेक्टर के विकास में काफी सुधार आया है । यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि इस सेक्टर में 2011-12 और 2012-13 के पिछले दो वर्षों के दौरान 0.6% की नकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई थी। खनन सेक्टर नीतिगत अनिर्णय के कारण बहुत बुरी तरह प्रभावित था । खनन गतिविधियां न्यायाधीन प्रकरणों, पर्यावरणीय विनियामक तथा भूमि अर्जन जैसे मुद्दों के कारण थम गई थी ।
· जब से सरकार ने नीतिगत सुधारों की पहलें शुरू की हैं तब से उल्लेखनीय बदलाव आए हैं । ये बदलाव खनन एवं खदान सेक्टर में सकल मूल्य संवर्धन में वृद्धि के मामले में सर्वाधिक दिखाई देते हैं । इस सेक्टर में वर्ष 2014-15 में 2.8% की वृद्धि हुई । वर्ष 2015-16 के दौरान, अभी तक, इस सेक्टर में पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 3.6% की वृद्धि दर्ज की है ।
· भारत में खनिज उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि आई है । यह देख कर खुशी होती है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष के दौरान, मार्च तक, प्रमुख खनिजों के उत्पादन में पिछले वर्ष इसी अवधि की तुलना में 9 % की वृद्धि हुई । इस विकास गाथा में प्रमुख योगदान धात्विक सेगमेंट में बॉक्साइट (27%), क्रोमाइट (33%), तांबा सांद्र (30 %) लौह अयस्क (21%) तथा सीसा सांद्र (32%) रहा । यह वृद्धि इस इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन की अर्थव्यवस्था से आ रहे कमजोर संकेतों के चलते अंतर्राष्ट्रीय वस्तु बाजार उथल-पुथल के दौर में है ।
· हमने ‘भारत में विनिर्माण’ को वैश्विक नाम के रूप में स्थापित करने के लिए नया मिशन शुरू किया है । भावी वर्षों में, खनन उद्योग के घरेलू तथा विदेशी निवेशों को जुटाने तथा उससे अतिरिक्त रोजगार पैदा करने के लिए प्रमुख उद्योग के रूप में विकसित होने की उम्मीद है ।
खनन एक खनिज (विकास एवं निनियम) अधिनियम में संशोधन
· सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि खनिज सेक्टर को विनियमित करने वाले खान एवं खनिज(विकास एवं विनियमन) अधिनियम को संशोधित करने की थी ।
· इस संशोधन ने, प्रमुख खनिज रियायतों को प्रदान करने में नीलामी को एकमात्र पद्दति बनाकर विवेकाधिकार को समाप्त किया और इसके द्वारा बेहतर पारदर्शिता की शुरूआत की । इसने खनन पट्टों के परिकल्पित विस्तार की व्यवस्था के द्वारा खनन सेक्टर के लिए आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान किया ।
· इस अधिनियम को 2016 में पट्टा क्षेत्र की सटीक परिभाषा तथा नीलामी के द्वारा अर्जित नहीं किए गए कैप्टिव पट्टों के अंतरण की अनुमति देने के लिए फिर से संशोधित किया गया है ।
खनिज ब्लाक नीलामी
· एम एम डी आर संशोधन अधिनियम 2015 के तहत खनिज ब्लाकों की नीलामी को सुगम बनाने हेतु आवश्यक नियमों अर्थात् खनिज (खनिज अंतर्वस्तु साक्ष्य) नियमावली तथा खनिज(नीलामी) नियमावली भी इसके तुरंत बाद अधिसूचित किए गए । मंत्रालय ने नीलामी प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए राज्य सरकारों को मदद प्रदान करने के लिए ‘मानक’ निविदा दस्तावेज भी तैयार किए । नीलामी के लिए उपलब्ध ब्लाकों को तैयार करने में सहायता के लिए खान मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को विभिन्न राज्यों में तैनात किया गया था ।
· खनन पट्टा, पूर्वेक्षण/खनन लाइसेंसों की नीलामी के कार्यान्वयन में और अधिक सहयोग प्रदान करने के लिए जीएसआई, आईबीएम, एमईसीएम, एमएमटीसी, एसबीआई कैप तथा मीथॉन की टीमों को कुल स्टेशन तथा डीजीपीएस के आधार पर क्षेत्र के सीमांकन, व्यवसाय परामर्श, जी आर के संकलन तथा कंप्यूटरीकरण, नीलामी प्लेटफार्म आदि जैसे नीलामी के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहायता के लिए तैनात किया गया है ।
· नौ राज्य सरकारों द्वारा नीलामी के लिए सैंतालीस खनिज ब्लाक रखे गए हैं । निम्न स्थानों पर छह ब्लाकों की नीलामी पूर्ण हो चुकी है :-
·झारखंड में 12.2.2016 को चूना पत्थर के दो ब्लाक
·छत्तीसगढ़ में 18 और 19 जनवरी, 2016 को चूना पत्थर के दो ब्लाकों तथा 26.2.2016 को एक स्वर्ण ब्लाक की नीलामी पूर्ण हो चुकी है ।
·ओडिशा में 2.3.2016 को लौह अयस्क के एक ब्लाक की नीलामी
·ई नीलामी की सफलता ने न केवल मंत्रालय द्वारा परिकल्पित नीलामी योजना पर वैधता की मुहर लगाई है वरन् इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे राज्यों के खजाने को काफी अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा जो कि रॉयल्टी से प्राप्त हो रही राशि से बहुत अधिक होगी ।
·इन नीलामियों के द्वारा राज्यों के खजाने को पट्टा अवधी के दौरान 13,000 करोड़ रूपए से अधिक की अतिरिक्त आय होगी । जबकि संचयी रॉयल्टी, जिला खनिज फंड तथा राष्ट्रीय खनिज गवेषण ट्रस्ट को होने वाला अंशदान क्रमश: 4,565 करोड़, 456 करोड, तथा 92 करोड़ रूपए होगा ।
·यह देखा जा सकता है कि राज्य सरकारों को नीलामी के द्वारा प्राप्त होने वाला अनुमानित राजस्व, रॉयल्टी, डीएमएफ तथा एनएमईटी से कुल मिलाकर प्राप्त राजस्व से 2.5 गुणा से ज्यादा होगा ।
·अब तक, 9 राज्य सरकारों द्वारा 47 खनिज ब्लॉकों को नीलामी के लिए रखा गया है । 6 ब्लॉकों की ई-नीलामी सफलतापूर्वक की जा चुकी है, जबकि 17 ब्लॉकों हेतु शुरूआती बोली आवेदनों की संख्या पर्याप्त नहीं होने के कारण ई-नीलामी को रद्द किया गया था ।
·राजस्थान, गुजरात, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में नीलामी प्रक्रिया के दौरान, 17 ब्लॉकों की निविदा आमंत्रण संबंधी नोटिस को अंतत: रद्द किया गया, चूंकि अपेक्षित संख्या में बोलीदाताओं (न्यूनतम 3) ने अपनी बोली प्रस्तुत नहीं की थी ।
·नीलामी प्रक्रिया की सफलता, आस-पास के क्षेत्र में अयस्क की मांग और आपूर्ति विन्यास, अयस्क की मात्रा और ग्रेड, इसके उपभोग का पैटर्न, खनिज अध्ययन की गुणवत्ता, भूमि स्वामित्व का पैटर्न, समुद्र तटीय पर्यावरण प्रतिबंध जहां कहीं भी लागू हो, सामान्य सुस्त बाजार परिदृश्य और बोली दस्तावेजों में राज्यों द्वारा अधिरोपित कोई भी अंत्य उपयोग शर्तों जैसी देशी कारकों पर निर्भर है।
·ई-नीलामी के पहले चरण में सामने आई बाधाओं के समाधान के लिए, खान मंत्रालय द्वारा पहचान की गई खानों की पुन: निविदा करने से पहले मुद्दों का जल्दी समाधान करने के लिए, राज्य प्राधिकारियों के साथ नियमित बैठकें की जाती हैं ।
जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ): सामाजिक – आर्थिक लाभ में हिस्सेदारी
·आर्थिक विकास की उच्च दर हासिल करना और उसे बनाए रखने के साथ-साथ उसके लाभो को गरीबो तथा कमजोर वर्गो तक पहुचाना, खनिज क्षेत्र में सुधारो की प्राथमिकता है । डीएमएफ का उद्देश्य खनन क्षेत्रों में समग्र विकास की स्थानीय लोगों की लम्बे समय से चले आ रही मांग का समाधान करना है । मौजूदा खनिकों द्वारा 30 प्रतिशत की अतिरिक्त रॉयल्टी और एमएमडीआर संशोधन के पश्चात अर्थात् 12.1.2016 के बाद प्रदान की गई खानों के खनिकों द्वारा 10 प्रतिशत के अंशदान दिया जाना है । प्रमुख खनिज संपन्न राज्यों के लिए डीएमएफ का वार्षिक बजट 6000 करोड़ रूपये होगा ।
·सरकार ने “प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना”(पीएमकेकेकेवाई) तैयार की है जिसे संबंधित जिलों के जिला खनिज फाउंडेशन द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा । इस संबंध में सभी राज्यों को दिनांक 16.09.2015 को एमएमडीआर अधिनियम की धारा 20 (क) के तहत निर्देश जारी किए गए हैं ।
·पीएमकेकेकेवाई में यह अनिवार्य किया गया है कि इसके कम से कम 60 प्रतिशत फंड का उपयोग उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों - पेयजल आपूर्ति/ पर्यावरण संरक्षण तथा प्रदूषण नियंत्रण उपायों/ स्वास्थ्य देख-भाल/ शिक्षा/ महिला एवं बाल कल्याण/ वृद्ध, दिव्यांग एवं जन कल्याण/कौशल विकास/कौशल विकास तथा स्वच्छता के लिए किया जाएगा। फंड की शेष 40% राशि का उपयोग अवसंरचना - सड़क एवं भौतिक अवसंरचना/ सिचाई/ जलागम विकास; तथा अन्य उपायों के लिए किया जाएगा । पीएमकेकेकेवाई के अंतर्गत कार्यान्वित परियोजनाएं अनुकूल खनन वातावरण तैयार करने, प्रभावित लोगों की स्थिति को बेहतर बनाने और स्टेकहोल्डरों के लिए लाभकारी स्थ्िति बनाने में सहायक होंगी ।
·आठ राज्यों ने (आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, ओडिशा एवं तेलांगना) पीएमकेकेकेवाई के प्रावधानों को सम्मिलित करते हुए डीएमएफ के लिए नियमों के बनाए जाने की पुष्टि की है तथा सात राज्यों (आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश एवं ओडिशा) ने जिला स्तर पर डीएमएफ के गठन की पुष्टि कर दी है । पांच राज्यों (छत्तीसगढ़, गोवा, कर्नाटक,मध्य प्रदेश एवं ओडिशा) ने डीएमएफ के तहत फंड संग्रह की पुष्टि की है तथा डीएमएफ के लिए अंशदान के रूप में 632.44 करोड़ रूपए की राशि संग्रहित हुई है ।
·डीएमएफ की शीघ्र स्थापना करना राज्य सरकार के हित में है जिससे कि इन अर्जित निधियों का पीएमकेकेकेवाई स्कीम द्वारा यथा निर्धारित क्षेत्रों के कल्याण और विकास के लिए इसका उपयोग शुरू किया जा सके । ऐसी कल्याण गतिविधियां स्थानीय लोगों के बीच खनन उद्योग के प्रति सदभावना बनाने के लिए उपयोगी होंगी ।
·राज्य सरकारों को एमएमडीआर अधिनियम में शामिल की गई नई धारा 15क के तहत गोंण खनिजों के लिए डीएमएफ गठित करने का भी अधिकार दिया गया है ।
गवेषण पर जोर
·गवेषण को प्रोत्साहित करने के लिए खनन पट्टाधारकों से प्राप्त अंशदान से राष्ट्रीय खनिज गवेषण न्यास (एनएमईटी) बनाया गया है ।
·खनिज रियायतें प्रदान करने के लिए नीलामी को अपनाने से गवेषण की जिम्मेदारी काफी हद तक सरकार पर आ गई है । एमएमडीआर संशोधन अधिनियम, 2015 के ज़रिए राष्ट्रीय खनिज गवेषण न्यास बनाया गया है जिसे खनन पट्टाधारकों द्वारा रॉयल्टी के 2 प्रतिशत के समतुल्य अतिरिक्त राशि से वित्तपोषित किया जाएगा ताकि देश में गवेषण कार्यकलाप किए जा सकें । लगभग 28.21 करोड़ रू. लागत की 13 गवेषण परियोजनाओं की पहचान की गई है जिन पर एनएमईटी की कार्यकारी समिति विचार करेगी । राष्ट्रीय खनिज गवेषण नीति (एनएमईपी) भी तैयार की जा रही है ताकि निजी क्षेत्र कंपनियों, मुख्यत: जूनियर्स (अंतरराष्ट्रीय गवेषण कंपनियों) को गवेषण कार्यकलापों के लिए आकर्षित किया जा सके ।
· सभी ज्ञांत भंडारों जिन्हें सहस्त्राष्दियों तक मानव सभ्यता द्वारा उपयोग में लाया गया, के दोहन के कारण सतह पर मिलने वाले नॉन-बल्क भंडारों की उपलब्धता लगातार कम हो रही है, इसलिए दुनिया भर में अब यह आवश्यक हो गया है कि गहरे दबे खनिज संसाधनों की तलाश की जाए और उद्योग की लगातार बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए गवेषण कार्यकलापों में तेज़ी लाई जाए ।
·अन्य देशों के अनुभव यह बताते हैं कि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के द्वारा अतिरिक्त गवेषण और सज्जीकरण अभियान द्वारा खनिज भंडारों में काफी वृद्धि की जा सकती है जैसे कि आस्ट्रेलिया के ज्ञांत लौह अयस्क भंडार जो 1966 में 400 मिलियन टन था वह 40 वर्षों अर्थात 2005 में 100 गुना बढ़कर 40 बिलियन टन हो गया, जबकि भारत का लौह अयस्क संसाधन आधार 1955 में 5000 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2005 में 25,249 मिलियन टन हुआ ।
·जीएसआई ने 5.71 लाख वर्ग कि.मी. का स्पष्ट भूवैज्ञानिक संभावना (ओजीपी) क्षेत्र का पता लगाया है और अब जीएसआई गहरे दबे खनिजों पर ज्यादा ध्यान देगा तथा ओजीपी के विसंगत क्षेत्र का पता लगाएगा ।
·पारंपरिक रूप से भारत का गवेषण पर खर्च अन्य देशों की तुलना में कम रहा है । विश्व के कुल गवेषण बजट में भारत की हिस्सेदारी केवल 0.4 प्रतिशत है । इसके अतिरिक्त, भारत में केवल 0.4 प्रतिशत कंपनियां नियोजित गवेषण कार्यकलाप करती है । भारत को अपने गवेषण खर्च को बढ़ाने की ज़रूरत है ताकि यह उत्पादन के अनुरूप अपने भंडारों का भी विकास कर सके । सरकार भी खनिज गवेषण से संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए राष्ट्रीय खनिज गवेषण नीति तैयार करने की दिशा में कार्य कर रही है ।
·जीएसआई की अनकवर परियोजना: जीएसआई की ‘अनकवर’ परियोजना, माननीय खान मंत्री द्वारा 17 फरवरी, 2016 को केंद्रीय भूवैज्ञानिक कार्यक्रम बोर्ड की 55वीं बैठक के दौरान शुरू की गई । इस अत्याधुनिक परियोजना को देश के दो चुने गए क्षेत्रों में कार्यान्वित किया जाना है तथा यह गभीरस्थ/प्रछन्न खनिज निक्षेपों की खोज पर केंद्रित है । यह कार्यक्रम एनएमईपी मसौदा के महत्वपूर्ण कार्य बिंदु में से भी एक है । इस पहल के प्रमुख घटकों में, भारत की भूवैज्ञानिक कवर का चित्रण करना, लिथोस्पेरिक आर्कीटेक्चर की जांच करना, 4डी जियोडायनामिक और मेटालोजेनिक उद् विकास को विश्लेषित करना और अयस्क निक्षेपों के दूरस्थ चिह्रों का विश्लेषण करना शामिल होगे ।
अवैध खनन की रोकथाम
·अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए दांडिक प्रावधानों को और कठोर बनाया गया है । संशोधन अधिनियम में ज्यादा जुर्माना और कारावास की अवधि का प्रावधान किया गया है । इसके अतिरिक्त अवैध खनन संबंधी मामलों की तीव्र सुनवाई के लिए राज्यों द्वारा विशेष अदालतों के गठन का प्रावधान है ।
अवैध खनन संबंधी मामलों की रोकथाम के लिए स्पेस प्रौद्योगिकी का प्रयोग
·आईबीएम ने आईबीएम में सुदूर संवेदन प्रयोगशाला की स्थापना करने के लिए तकनीकी सहायता सहित तीन वर्षों के लिए सैटेलाइट इमेजरी का प्रयोग करते हुए खनन गतिविधियों की मॉनीटरिंग और आईबीएम के अधिकारियों की क्षमता निर्माण संबंधी प्रायोगिक परियोजना शुरू करने के संबंध में दिनांक 21.01.2016 को राष्ट्रीय सुदूर संवदेन केंद्र (एनआरएससी), इसरो के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं ।
·खान मंत्रालय ने खनन क्षेत्र में स्पेस प्रौद्योगिकी के प्रयोग का लाभ उठाने के लिए अलग से भास्कराचार्य इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस एप्लीकेशन एंड जियो-इनफोरमेटिकस (बीआईएसएजी), गुजरात और राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) को नियोजित किया है । स्पेस प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके अवैध खनन की घटनाओं को रोकने के लिए डीईआईडीटी के तहत भास्कराचार्य इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस एप्लीकेशन एंड जियो-इनफोरमेटिकस (बीआईएसएजी), गुजरात की सहायता से प्रमुख खनिजों के लिए ‘खनन निगरानी प्रणाली’ (एमएसएस) विकसित की जा रही है । इस प्रौ़द्योगिकी में न्यूनतम मानव हस्तक्षेप, सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक आसानी से पहुंच एवं स्वचालित खोज करने की सुविधा है । राज्य सरकारों से, उनके राज्यों में एमएसएस के त्वरित विकास के लिए सभी प्रमुख खनिज पट्टों के संबंध में डिजीटाइज्ड पट्टा-वार सूचना उपलबध कराने का अनुरोध किया गया है । राज्य सरकारें, उन क्षेत्रों में, जहां अधिक पैमाने पर अवैध खनन संबंधी मामले व्यप्त हैं, गौण खनिजों के लिए एमएसएस अपना सकती है ।
·अपतटीय खनन, शुरू करने के संबंध में मंत्रालय ने, अपतटीय ब्लॉकों के आवंटन के लिए विधायी ढांचा में संशोधन करने हेतु समिति गठित की है ।
सतत खनन पहलें
·वर्ष 2015-16 के दौरान टाटा स्टील के सुखविंदा क्रोमाइट खान और नोवामुंडी लौह अयस्क खान और एनएमडीसी के डोनीमलाई खानों में एसडीएफ पहले ही शुरू कर दिया गया है ।
खानों की स्टार रेटिंग
·सतत विकास अवसंरचना (एसडीएफ) के कार्यान्वयन के लिए शुरू किए गए प्रयासों और पहलों के लिए खनन पट्टेदारों को ‘स्टार रेटिंग’ देने का प्रस्ताव है । यह आशा की जाती है कि खानों की स्टार रेटिंग, सभी कानूनी प्रावधानों के अनुपालन तथा खनन द्वारा बेस्ट प्रैक्टिस को शामिल करने के स्वयं संचालित तंत्र को प्रोत्साहित करेगी । मंत्रालय वित्त वर्ष 2015-16 में खानों के निष्पादन के आधार पर 1 से 5 की स्टार रेटिंग की तुलना में खानों का मूल्यांकन शुरू करना चाहता है । मई के अंत तक स्टार रेटिंग टेम्पलेट को ऑनलाइन करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी तथा खनन पट्टाधारकों को जून, 2016 तक स्व-प्रमाणन के आधार पर स्टार रेटिंग के लिए मूल्यांकन टेम्पलेट को भरना अपेक्षित होगा ।
सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग
·खनिज प्रशासन की सरकारी क्षमता में सुधार करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी को शुरू किया गया । कुछ राज्य अर्थात ओडिसा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आदि ने इस ओर कदम बढ़ाया है और पहले ही अपने खनिज प्रशासन क्षेत्रों में आईटी की शुरूआत कर ली है ।
·केंद्रीय मंत्रालय, खनन टेनमेंट प्रणाली (एमटीएस) की स्थापना करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो मुख्यत: संपूर्ण खनिज रियायत जीवन चक्र, जो क्षेत्रों की पहचान से शुरू होकर खानों के बंद होने पर समाप्त होती है, को स्वचालित करेगा; तथा इलेक्ट्रोनिक फाइलों को सही समय पर हस्तांतरित और डाटा के आदान-प्रदान के लिए विभिन्न स्टेकहोल्डरों को एक दूसरे से जोड़ेगा । यह ऑनलाइन इलेक्ट्रोनिक वेब्रिज और चेक पोस्टों की सहायता से खनिज रियायत व्यवस्था के प्रभावकारी प्रबंधन, अयस्क के परिवहन को सक्षम करेगा । कार्यान्वयन एजेंसी के चयन के लिए खनन टेनेमेंट सिस्टम निविदा को अंतिम रूप दिया जा रहा है ।
·रॉयल्टी दरों में संशोधन
· प्रमुख खनिजों (कोयला, लिग्नाइट और भूगर्त भरण रेत को छोड़कर) की रॉयल्टी और अनिवार्य किराए की दरों को 01 सितंबर, 2014 से संशोधित किया गया जिसे अधिसूचना सं.630(अ) और 631(अ), दिनांक 01 सितंबर, 2014 के तहत राजपत्र में अधिसूचित किया गया ।
· परिणामस्वरूप राज्य सरकारों को गैर-कोयला खनिजों से प्राप्त होने वाले राजस्व में लगभग 40 प्रतिशत तक वृद्धि होने का अनुमान था ।
·31 खनिजों के ‘गौण खनिजों’ के रूप में अधिसूचना
· दिनांक 10.02.2015 की अधिसूचना के तहत 31 खनिजों को ‘गौण खनिजों’ के रूप में अधिसूचित किया गया। इस समावेशन के साथ, वर्तमान में 55 खनिजों को संबंधित राज्य सरकारों के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन गौण खनिजों के रूप में वर्गीकृत किया गया है ।
गौण खनिज नियम
·दीपक कुमार के मामले (2009 के विशेष अनुमति याचिका (ग) सं. 19628-19629 में ओए सं. 12-13, 2011) में उच्चतम न्यायालय के दिनांक 27.02.2012 के निर्णय के अनुसरण में, खनन पट्टा के क्षेत्र की परवाह किए बिना सभी गौण खनिजों के संबंध में, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत मंजूरी लेना अनिवार्य किया गया । खान मंत्रालय ने गौण खनिजों के खनन के लिए प्रारूप दिशानिर्देश तैयार किए है जिसे राज्य सरकारों को परिचालित किया गया । गौण खनिज रियायत प्रदान करने संबंधी पारदर्शी प्रणाली को कार्यान्वित करने के लिए 20क तहत विशेषकर राज्यों के मुख्यमंत्री को जारी, खान मंत्रालय के अर्द्धशासकीय पत्र सं. 16/119/2015-खान-VI/220, दिनांक 24.11.2015 के परिप्रेक्ष्य में मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों के प्रतियुत्तर में कार्यवाही की गई ।
·खान पट्टों का विस्तार
·एमएमडीआर संशोधन अधिनियम, 2015 की अधिनियम की धारा 8(क) की उप-धारा 5 और 6 कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकार द्वारा मौजूदा पट्टों के विस्तार को राज्य सरकारों द्वारा तेज़ी से किए जाने की आवश्यकता है ।
·धारा 10क(2)(ग) के तहत रक्षित लंबित खनन पट्टा मामलों, जो 11.01.2017 को समाप्त हो जाएंगे,
·धारा 10क(2)(ग) के तहत रक्षित खनन पट्टा आवेदन (अधिनियम की पहली अनुसूची में सूचीबद्ध खनिज अथवा को अन्य प्रमुख खनिजों के लिए जारी एलओआई में संबंधी मामलों में प्रदत्त पूर्व अनुमोदन) प्रदान करने की आवश्यकता है जो उक्त अधिनियम के शुरू होने की तारीख से दो वर्ष की अवधि के भीतर, पूर्व अनुमोदन अथवा आशय पत्र की शर्तों को पूरा करने के अध्यधीन होगा, जो 11.01.2017 तक है । मंत्रालय की जानकारी में आया है कि ऐसे कुछ आवेदन, खनन पट्टा के निष्पादन के लिए अभी तक लंबित है ।
·इन लंबित मामलों की समीक्षा और त्वरित निपटान करने के लिए 10 मई, 2016 को 12 प्रमुख खनिज प्रचूर राज्यों की बैठक आयोजित की गई जिसमें राज्य सरकारों और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से, ऐसे मामलों के व्यपगत होने की तारीख से पहले इन्हें निपटाने को कहा गया ।
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