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गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन

पर्यावरण संरक्षण और देश के सभी हिस्सों में हरियाली को बढ़ावा देने की योजना को अमलीजामा पहनाते हुए यूपीए सरकार के मंत्रिमंडल की आर्थिक कार्य समिति ने केंद्र प्रायोजित स्कीम के रूप में राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इससे पर्यावरण के साथ साथ पेड़-पौधों और उससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जुड़े लोगों को कई तरह के फायदे होंगे। केंद्र की यूपीए सरकार ने आमलोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए 12वीं योजना में कुल 13,000 करोड़ रुपये में से इस योजना के लिए 2000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इससे बड़े पैमाने पर देश भर में हरियाली को बढ़ावा मिलेगा। स्कीम के लिए वित्तीय सहायता का स्रोत योजना व्यय तथा मनरेगा गतिविधियों, सीएएमपीए और एनएपी को मिलाने के जरिए से जुटाया जाएगा। पूर्वोत्तर राज्यों के लिए योजना व्यय में 90 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार और 10 प्रतिशत खर्च राज्य को करना होगा। शेष सभी राज्यों के लिए केंद्र सरकार 75 प्रतिशत और राज्य सरकार 25 प्रतिशत खर्च करेगी। 12वीं योजना अवधि के दौरान इस मिशन के उद्देश्यों में वन/वृ़क्ष क्षेत्र में वृद्धि करना और वन क्षेत्र की गुणवत्ता दो से बढ़ाकर 8 मिलियन हेक्टेयर करना, जैवविविधता, हाइड्रोलॉजिकल सेवाओं के साथ पारिस्थितिकीय सेवाओं में सुधार, वन में एवं आसपास रहने वाले परिवारों की वन आधारित आजीविका आय में वृद्धि तथा वार्षिक कार्बन डाइ आक्साइड पृथक्करण में वृद्धि करना शामिल है। इससे न सिर्फ जंगलों में रहने वाले या जंगल पर अपनी आजिविका के लिए पूरी तरह आश्रित आदिवासियों को फायदा होगा,बल्कि हरियाली के फैलने से लोगों को साफ एवं स्वच्छ हवा मिलेगी। इसका नतीजा यह होगा कि फेफड़े और सांस से संबधित बीमारियों में कमी आएगी। इस मिशन को लागू करने के दौरान इस बात का पूरा ध्यान रखा जाएगा कि इससे आम आदमी को ज्यादा से ज्यादा जोड़ा जाए साथ ही इसके बारे में जन सामान्य को के बीच अधिक से अधिक जागरुकता फैलाई जाए। यह मिशन योजना बनाने और निर्णय लेने, कार्यान्वयन और निगरानी में व्यावहारिक धरातल पर काम करने वाले संगठनों की विकेंद्रीकृत भागीदारी के आधार पर कार्यान्वित किया जाएगा। गांव स्तर पर ग्राम सभा तथा जेएफएमसी सहित ग्राम सभा के जनादेश से बनाई गई समितियां कार्यान्वयन की निगरानी करेंगी।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

युवाओं को रोजगार और शिक्षा के जरिए जोड़ने की अनूठी पहल

देश के बेरोजगार और शिक्षित युवाओं को रोजगार जल्द से जल्द कैसे रोजगार मिले और युवा शक्ति का बेहतर इस्तेमाल देश के विकास में कैसे हो। इस बात को लेकर केंद्र सरकार की ओर से बड़े पैमाने पर देश के अलग-अलग हिस्सों में कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसका मकसद युवाओं को आपस में जोड़ना और विकास में उनको भागीदार बनाना है। इसके तहत विशेष तौर से अशिक्षित मुस्लिम वयस्कों को साक्षर भारत अभियान के अंतर्गत कामकाजी साक्षरता प्रदान करने के लिए मौलाना आजाद तालीम-ए-बालिगान योजना -हुनर- चलाया जा रहा है। 'हुनर' के अंतर्गत युवाओं को प्राथमिक शिक्षा और व्यवसायिक कौशल प्रशिक्षण दोनों प्रदान किए जाएंगे। इसके अंतर्गत एक करोड़ अशिक्षित मुस्लिम युवाओं को जोड़ने और उन्हें इसका फायदा पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन ने मौलाना आजाद तालीम-ए-बालिगान योजना के अंतर्गत शुरू में 2.5 लाख अशिक्षित मुस्लिम युवाओं को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने और करीब तीन लाख मुस्लिम युवाओं को आजीविका के लिए कौशल प्रशिक्षण देने का निश्चय किया है। उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था को भी निरंतर जारी रखा जाएगा। इस कार्यक्रम के तहत वर्तमान पंच वर्षीय योजना के दौरान 600 करोड़ रुपये के आवंटन से 410 साक्षर जिले 'कवर' किए जाएंगे। यूपीए सरकार की यह योजना सरकार की दूरदर्शिता का नतीजा है और आने वाले समय में इससे लाखों की संख्या में युवाओं को रोजगार मिलेगा साथ ही देश में गरीबी की समस्या को जड़ से मिटाने में काफी मदद मिलेगी। शिक्षा न केवल पढ़ना और लिखना सिखाती है बल्कि यह बेहतर आजीविका, सशक्तिकरण और लैंगिक समानता भी प्रदान करती है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के ध्येय से देश भर में केरल के मॉडल से प्रेरणा लेकर अन्य राज्य सरकारों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए। साक्षरता की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक उत्थान की नीति के अंतर्गत एक मानव अधिकार, विकास का एक संकेतक और समानता के उत्प्रेरक के रूप में सरकार की ओर से स्वीकार किया जा चुका है। देश के अल्पसंख्यक बहुल जिलों में केंद्रीय विश्वविद्यालयों के ढांचे के अनुरूप अल्पसंख्यकों के लिए स्कूल खोले जाने पर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसके अलावा किसानों की समस्या और उनकी बेहतरी के लिए केंद्र सरकार ने वित्‍त वर्ष 2014-15 के लिए खाद्य सब्सिडी बढ़ाकर 1,15,000 करोड़ रुपए कर दी है। वित्‍त वर्ष 2013-14 के 92,000 करोड़ रुपए के संशोधित अनुमान से 23,000 करोड़ रुपए अधिक है। सब्सिडी में यह महत्‍वपूर्ण वृद्धि देश भर में राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का कार्यान्‍वयन करने की सरकार की प्रतिबद्धता के मद्देनजर उठाया गया है। खाद्य सब्सिडी खाद्यान की आर्थिक लागत और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और अन्‍य कल्‍याणकारी योजनाओं के तहत निर्धारित केन्‍द्रीय निर्गम मूल्‍य पर उनके वास्‍तविक बिक्री मूल्‍य के अंतर को पूरा करने के लिए है। सरकार के इस कदम से देश के करोड़ों किसानों को फायदा होगा। वर्तमान वर्ष 2013-14 के दौरान सरकार ने लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत 500 लाख टन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के अंतर्गत 50 लाख टन खाद्यान्न आवंटित किए। इसके अलावा राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की अतिरिक्त वितरण जरूरतों को पूरा करने, प्राकृतिक आपदा और त्यौहारों आदि के लिए 12.98 लाख टन खाद्यान्न आवंटित किए गए है। सरकार ने थोक उपभोक्ताओं और छोटे निजी व्यापारियों को बिक्री के लिए 95 लाख टन गेहूं और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों/सहकारी संस्थाओं को बिक्री के लिए पांच लाख टन गेहूं और पांच लाख टन चावल आवंटित किया है ताकि खुले बाजार में बिक्री योजना के अंतर्गत खुदरा उपभोक्ताओं को इनका वितरण किया जा सके। केंद्रीय पूल से होने वाले आवंटन से बाजार में कीमतों पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है। इस तरह से सरकार ने बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के लिए कारगर और ठोस कदम उठाए हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार राज्‍यों से लगातार आग्रह करती रही है कि वे ब्‍लॉक/तालुक स्‍तर पर उचित भंडारण क्षमता विकसित करे ताकि कम से कम तीन महीने की खाद्यान्‍न का भंडारण किया जा सके। केंद्र की यूपीए सरकार की ओर से यह भी सुझाव दिया गया है कि ग्रामीण भंडारण योजना के अंतर्गत राज्यों की वित्तीय संसाधनों तक पहुंच होनी चाहिए, जिसमें गांवों में गोदामों के निर्माण के लिए पूंजी निवेश सब्सिडी प्रदान की जाती है। सरकार पूर्वोत्तर क्षेत्र और जम्मू-कश्मीर की सरकारों को गोदामों के तत्काल निर्माण के लिए सहायता अनुदान के रूप में योजना राशि प्रदान करती है। अब तक 71.05 करोड़ रूपये की लागत वाली कुल 71 परियोजनाओं के लिए 44.13 करोड़ रूपये जारी किए जा चुके हैं। इसका उद्देश्य इन राज्यों में 78,055 मीट्रिक टन भंडारण क्षमता तत्काल विकसित करना है। केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत मध्यवर्ती गोदाम के निर्माण की अनुमति दे दी है। गरीब और आर्थिक रुप से कमजोर लोगों के लिए इंदि‍रा आवास योजना (आर्इएवाई) के संबंध में एक कार्यकारी समूह गठि‍त कि‍या गया। कार्यकारी समूह ने आईएवाई के प्रभावी कार्यान्‍वयन के लि‍ए महत्‍वपूर्ण सुझाव दि‍ए है। I.इंदि‍रा आवास योजना के तहत इकाई सहायता को बढ़ाना। II.राज्‍य नि‍धि‍यों का सृजन। III.ब्‍याज की वि‍भेदक दर योजना (डीआरआई) के अंतर्गत ऋण को बढ़ाना। IV.आईएवाई के तहत आवास-स्‍थल प्‍लॉट की खरीददारी के लि‍ए इकाई सहायता को बढ़ाना। V.आईएवाई के तहत प्रशासनि‍क खर्चों का प्रावधान। इसके अलावा मंत्रालय ने 1 अप्रैल, 2013 से नि‍म्‍नलि‍खि‍त सुझावों को कार्यान्‍वि‍त कि‍या है :- I. इंदि‍रा आवास योजना के तहत इकाई सहायता को मैदानी क्षेत्रों में 45,000 रु. से बढ़ाकर 70,000 रु. करना और पहाड़ी/दुर्गम क्षेत्रों/आईएपी जि‍लों में इसे 48,500 रु. से बढ़ाकर 75,000 रु. करना। II.आईएवाई के तहत आवास स्‍थल प्‍लॉट खरीदने के लि‍ए इकाई सहायता को 10,000 रु. से बढ़ाकर 20,000 रु. करना। III.आईएवाई के तहत 4 प्रति‍शत प्रशासनि‍क खर्चों का प्रावधान। यहीं नहीं केंद्र सरकार ने देश के सभी हिस्सों को बेहतर तरीके से एक दूसरे से जोड़ने के साथ ही पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिए आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में हरित हवाई अड्डे के निमार्ण के लिए मैसर्स प्रकाशम एयरपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड को स्‍थल स्‍वीकृति दे दी है। इसके अलावा पिछले तीन वर्षों के दौरान सरकार पुद्दुचेरी के कराईकाल में, महाराष्‍ट्र के अहमदनगर जिले के शीर्डी में और केरल के एरनमुला में तीन हरित हवाई अड्डों को स्‍वीकृति दे चुकी है। हैदाराबाद में राजीव गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अड्डे के नाम से एक हरित क्षेत्र हवाई अड्डे को पहले से ही संचालित है। ग्रामीण इलाकों में स्‍वर्णजयंती ग्राम स्‍वरोजगार योजना (एसजीएसवाई) का कार्यान्‍वयन 1999 से किया जा रहा है। इसका उद्देश्‍य ग्रामीण बीपीएल परिवारों को आय का सृजन करने वाली परिसंपत्तियों/आर्थिक गतिविधियों के माध्‍यम से सतत आय उपलब्‍ध कराना है ताकि उन्‍हें गरीबी रेखा से बाहर लाया जा सके। एसजीएसवाई को राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (आजीविका) के रूप में बदला गया और इसे 3 जून, 2011 को शुरू किया गया। एसजीएसवाई के उत्‍तरवर्ती कार्यक्रम राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एलआरएलएम) में सभी ग्रामीण गरीब परिवारों को चरणबद्ध तरीके से शामिल करने का प्रस्‍ताव है। कार्यक्रम का उद्देश्‍य ग्रामीण गरीब महिलाओं के सशक्‍त एवं स्‍थाई जमीनी-स्‍तर के संस्थानों को बनाना तथा उन्‍हें लाभ्‍कारी स्‍व-रोजगार और कुशल मजदूरी रोजगार अवसरों के लिए उनके अपने सामाजिक नेटवर्कों, संसाधना और ज्ञान प्राप्‍त करने में मदद करना है जिससे कि वे सतत आधार पर अपनी आजीविका में उल्‍लेखनीय सुधार कर सकें। एनआरएलएम के तहत व्‍यापक सामाजिक एकजुटता के माध्‍यम से स्‍वंय सहायता समूह (एसएचजी) बनाने तथा ग्राम और उच्‍च स्‍तर पर इन समूहों के संघटन से यह सुनिश्चित होगा कि प्रत्‍येक ग्रामीण गरीब परिवार का कम से कम एक सदस्‍य, विशेष रूप से एक महिला सदस्‍य एसएचजी के तहत कवर की जाए जो एक बड़े सामाजिक नेटवर्क का हिस्‍सा हैा। एनआरएलएम का प्रस्‍ताव सभी एसएचजी का खाता खुलवाने में मदद करके उनके लिए व्‍यापक वित्‍तीय समावेशन को सुनिश्चित करना, साथ ही साथ उनकी थ्रिफ्ट तथा क्रेडिट कार्यकलापों को प्रोत्साहन देना और बैंकों से क्रेडिट तथा वित्‍तीय सहायता प्राप्‍त करने में उनकी मदद करना है। कार्यक्रम के अंतर्गत इच्‍छुक सदस्‍यों के लिए प्रशिक्षण तथा क्षमता-निर्माण का प्रावधान है ताकि वे लघु उद्यम शुरू करके अपनी आय में वृद्धि कर सके। स्‍व-रोजगार के अलावा, एनआरएलएम ग्रामीण गरीब युवकों को नियोजन से जुड़े कौशल विकास परियोजनाओं के माध्‍यम से कुशल मजदूरी रोजगार प्राप्‍त करने में भी मददगार है। लघु उद्योग को बढ़ावा देने की नीयत से यूपीए सरकार ने हथकरघा क्षेत्र के पुनरुद्धार, सुधार और पुनर्गठन के पैकेज के अंतर्गत अब तक 1019 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का अनुमोदन किया है। इसमें से यूपीए सरकार 741 करोड़ रुपये की धनराशि जारी भी कर चुकी है। अब तक लगभग 31 बड़ी सहकारी समितियों, 8,805 प्राथमिक सहकारी समितियों 50,500 बुनकरों और 5,462 स्वयं सहायता समूहों की मदद की जा चुकी है। इसके अलावा बैंक अब तक 1.13 लाख बुनकरों को 325 करोड़ रुपये का रियायती ऋण उपलब्ध करा चुके हैं। यह जानकारी पीआईबी की वेबसाइट पर मौजूद मंत्रालय की रिपोर्ट में दर्ज है। इसके तहत अब यूपीए सरकार ग्रामीण इलाकों की जनता के जीवन स्तर को सुधारने के साथ ही युवाओं की शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास के लिए अनेक लाभकारी योजनाएं चलाई जा रही है। इन योजनाओं का मकसद युवाओं के साथ साथ समाज के पिछले और अल्पसंख्यक लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना और उनकी जीवन में खुशहाली लाना है।

लोकतंत्र के महापर्व का इतिहास

अगस्त 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्वतंत्र भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर सही मायनों में प्रतिनिधि सरकार चुनने के लिए आम चुनाव कराने की आवश्यकता पड़ी। इसलिए स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकार के रूप में निर्वाचन आयोग की स्थापना का प्रावधान करने वाले संविधान के अनुच्छेद-324 को 26 नवम्बर, 1949 को लागू किया गया, जबकि अधिकतर अन्य प्रावधानों को 26 जनवरी, 1950 (जब भारत का संविधान लागू हुआ) से प्रभावी बनाया गया। निर्वाचन आयोग का औपचारिक गठन 25 जनवरी, 1950 को हुआ यानी भारत के संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के ठीक एक दिन पहले। 21 मार्च, 1950 को श्री सुकुमार सेन भारत के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किये गए। वर्ष 1950 से 16 अक्तूबर, 1989 तक आयोग ने एक सदस्य निकाय के रूप में काम किया। 16 अक्तूबर, 1989 से एक जनवरी, 1990 तक निर्वाचन आयोग को तीन सदस्यीय निकाय के रूप में परिवर्तित किया गया। लेकिन 01 जनवरी, 1990 को इसे फिर एक सदस्य निकाय का रूप दिया गया। निर्वाचन आयोग 01 अक्तूबर, 1993 से नियमित रूप से तीन सदस्यीय निकाय के रूप में काम कर रहा है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा दो निर्वाचन आयुक्तों को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान वेतन और भत्ते दिये जाते हैं। निर्णय लेने में सभी तीन आयुक्तों की शक्तियां बराबर हैं। किसी विषय पर मतभिन्नता की स्थिति में निर्णय बहुमत से लिया जाता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य दो निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है। लोकसभा तथा विधानसभाओं के प्रथम आम चुनाव कराने के उद्देश्य से निर्वाचन आयोग के परामर्श तथा संसद की सहमति से राष्ट्रपति द्वारा परिसीमन का पहला आदेश 13 अगस्त, 1951 को जारी किया गया। चुनाव कराने के उद्देश्य से वैधानिक ढांचा उपलब्ध कराने के लिए संसद ने 12 मई, 1950 को पहला अधिनियम (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950) पारित किया। इसमें मुख्यतः मतदाता सूचियां तैयार करने का प्रावधान किया गया। दूसरा अधिनियम 17 जुलाई, 1951 (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951) पारित किया गया और इसमें संसद के दोनों सदनों तथा प्रत्येक राज्य के लिए विधानसभाओं के निर्वाचन की प्रक्रिया तय करने का प्रावधान हुआ। इन निर्वाचन क्षेत्रों के लिए मतदाता सूचियां सभी राज्यों में 15 नवम्बर, 1951 तक प्रकाशित की गईं। मतदाताओं की कुल संख्या (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर) 17,32,13,635 थी जबकि 1951 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर) 35,66,91,760 थी। लोकसभा तथा विधानसभाओं के पहले आम चुनाव अक्तूबर, 1951 तथा मार्च, 1952 के बीच हुए। 497 सदस्यों वाली पहली लोकसभा 02 अप्रैल, 1952 को गठित की गई। 216 सदस्यों वाली पहली राज्यसभा 03 अप्रैल, 1952 को गठित हुई। संसद के दोनों सदनों तथा राज्य विधानसभाओं के गठन के बाद मई, 1952 में प्रथम राष्ट्रपति चुनाव हुआ तथा विधि रूप से निर्वाचित पहले राष्ट्रपति ने 13 मई, 1952 को पदभार ग्रहण किया। 1951-52 में पहले आम चुनाव के समय आयोग ने 14 राजनीतिक दलों को बहु-राज्यीय दलों तथा 39 दलों को क्षेत्रीय दलों के रूप में मान्यता दी थी। अभी मान्यता प्राप्त सात राष्ट्रीय दल तथा 40 क्षेत्रीय दल हैं। 1951-52 तथा 1957 में पहले तथा दूसरे आम चुनावों के लिए निर्वाचन आयोग ने मतदान की मतपेटी प्रणाली अपनाई। इस प्रणाली के अंतर्गत प्रत्येक मतदान केन्द्र पर एक कमरे में प्रत्येक उम्मीदवार को एक अलग मतपेटी आवंटित की गई तथा मतदाता से केन्द्रीयकृत पूर्व मुद्रित मतपत्रों को उनकी पसंद के अनुसार उम्मीदवार की मतपेटी में डालने को कहा गया। 1962 मे हुए तीसरे आम चुनाव तथा उससे आगे आयोग ने मतदान की “मुहर प्रणाली” लागू की। इसके अंतर्गत एक पृष्ठ पर चुनाव लड़ रहे सभी उम्मीदवारों के नाम तथा निर्वाचन चिन्ह छपे होते थे जिस पर मतदाता को रबर स्टैंप से अपनी पसंद के उम्मीदवार के निर्वाचन चिन्ह के निकट तीरनुमा मुहर लगानी होती थी। मुहर लगे सभी मतपत्रों को एक समान मतपेटी में डाल दिया जाता था। इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) का उपयोग प्रायोगिक आधार पर आंशिक रुप से 1982 में केरल के परूर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में किया गया। बाद में 1998 में ईवीएम का व्यापक उपयोग शुरू हुआ। पहली बार 2004 में 14वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में देश के सभी मतदान केन्द्रों पर ईवीएम का इस्तेमाल किया गया। तब से लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के चुनाव ईवीएम के इस्तेमाल से हुए हैं। 1951-52 से लोकसभा के 15 आम चुनाव तथा विधानसभाओं के 348 आम चुनाव हुए है। देश अब 16वें लोकसभा चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

दोहन की संभावना से ऋण की संभावना तक : राष्‍ट्रीय कृषि और ग्रामीण बैंक रास्‍ता दिखाती है

प्रतिवर्ष राष्‍ट्रीय कृषि और ग्रामीण बैंक (एनएबीएआरडी) सभी जिलों की ऋण संबंधी पात्रता का आंकलन करती है। इस कार्रवाई से संतुलित विकास के प्रयासों को बढ़ावा मिलता है। विकास की इस प्रक्रिया में मुख्‍य हितधारक हैं- जिला प्रशासन, कार्यान्‍वयन करने वाले विभाग, बैंक, किसान इत्‍यादि। एनएबीएआरडी ने इस कार्रवाई के लिए एक मानचित्रण प्रक्रिया विकसित की है। इसके तहत जिले में उपलब्‍ध संस्‍थागत ढांचों को अद्यतन करने की प्र‍क्रिया चलती रहती है। इसी के आधार पर संभावित जमीनी स्‍तर क्रेडिट (ग्राउन्‍ड लेवल के्डिट) का आकलन किया जाता है। राष्‍ट्रीय कृषि और ग्रामीण बैंक के विभिन्‍न क्षेत्रीय शाखाओं के विशेषज्ञों द्वारा इसका पुन: निरीक्षण किया जाता है। अंतत: जो वार्षिक क्षमता-संबद्ध ऋण योजना (एनुअल पोटेन्शियल लिंक्‍ड क्रेडिट प्‍लैन) नामक दस्‍तावेज तैयार होता है उसे विकास योजनाओं के लिए उपलब्‍ध कराया जाता है। एनएबीएआरडी की क्षमता-संबद्ध ऋण योजना (पीएलपी) की बहुत मांग है। बैंक तथा विकास-संबंधी विभाग या फिर विकास सम्‍बन्‍धी शैक्षणिक एवम् शो‍ध विभागों के लिए यह दस्‍तावेज महत्‍वपूर्ण साबित होते हैं क्‍योंकि उन्‍हें बदलती परिस्थितियों के बारे में जानकारी मिलती है। अधिकतर ऐसा होता है कि एनएबीएआरडी के मुख्‍य हितधारकों को पीएलपी की सहायता से अर्थव्‍यवस्‍था के प्रमुख विकास क्षेत्रों को अंजाम देने की योजनाओं की समीक्षा करके उन्‍हें नई दिशा देने का मौका मिलता है। उल्‍टी विनियोग विधि : एनएबीएआरडी प्रत्‍येक जिले को एक इकाई मानते हुए विकास योजनाओं की रूपरेखा तैयार करती है। एनएबीएआरडी के अधिकारी प्रत्‍येक जिले में मौजूद होने के कारण यह आसान हो जाता है। जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) के नाम से जाने जाने वाले यह अधिकारी जिला प्रशासन एवम् बैंकों के साथ निरन्‍तर विचारों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। इस तरह वे विकास को गति देने के उद्देश्य से प्राथमिकताएं तय करते हैं। ध्‍यान देने वाली यह बात है कि राष्‍ट्रीय कृषि और ग्रामीण बैंक समय से पहले क्षमता-संबद्ध ऋण योजना (पीएलपी) तैयार कर लेती है। इसके फलस्‍वरूप बैंक अपनी वार्षिक योजनाएं पीएलपी को ध्‍यान में रखते हुए बना सकते हैं। उदाहरण के लिए, एनएबीएआरडी ने अगले वित्‍त वर्ष, यानि 2014-15 पहले ही, दिसम्‍बर 2013 की तिमाही में तैयार कर लिया था। एनएबीएआरडी द्वारा प्रस्‍तुत वर्ष 2014-15 की पीएलपी में विभिन्‍न क्षेत्रों में मौजूद संभावनाओं तथा उन्‍हें अंजाम देने के लिए उपलब्‍ध संस्‍थागत ढांचों को ध्‍यान में रखा गया है। पीएलपी दस्‍तावेज को तैयार करने से पहले कार्यान्‍वन करने वाले विभागों के साथ परामर्श किया गया ता‍कि गंभीर बुनियादी आवश्‍यकताओं का ध्‍यान रखा जा सके। इस पूरी कार्रवाई का उद्देश्‍य है कि ऋण नियोजन प्रक्रिया और विकास योजनाओं में समन्‍वय रखा जाए। इस संदर्भ में यह बात ध्‍यान में रखनी होगी कि एनएबीएआरडी ने एक बेस-पीएलपी दस्‍तावेज तैयार किया है कि जो कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के कार्यकाल के साथ ही समाप्‍त होगा। मौजूदा आकलन वर्ष 2014-15 की वार्षिक योजना को भारत सरकार की प्राथमिकताओं के आधार पर संशोधित करने में मददगार है। इससे उम्‍मीद है कि ऊर्जा की स्थिति, मुद्रास्फीति, अनाजों के लिए दिए गए अनुदान पर ब्याज, खेती में यांत्रिकीकरण को महत्‍व देने में लाभ होगा। यह भी कोशिश की गई है कि दोहन क्षमता का एक विस्‍तृत विवरण तैयार किया जाए जिसके अनुसार विभिन्‍न बैंकों के संभावित ऋण का हिसाब लगाया जा सके। राज्‍य स्‍तरों पर एक‍त्रीकरण – उदाहरण के लिए जब तमिलनाडु का पीएलपी तैयार किया जाता है तो उसके बाद एक राज्‍य फोकस पेपर (एसएफपी) तैयार किया जाता है, जिसमें राज्‍यभर के ऋण को एक जगह ए‍कत्रित किया जाता है। उसके बाद एनएबीएआरडी द्वारा आयोजित एक राज्‍य-स्‍तरीय ऋण सेमिनार में सारी जानकारी प्रस्‍तुत की जाएगी। इस सेमिनार में राज्‍य सरकार, आरबीआई, एनएबीएआरडी तथा राज्‍य स्‍तरीय बैंकर्स कमेटी के वरिष्‍ठ अधिकारी भी भाग लेते हैं। इस संगोष्‍ठी में सामने आए सुझावों से राज्‍य की विकास प्रक्रिया को बेहतरीन बनाया जाता है। गंभीर आधारभूत हस्‍तक्षेप : क्षमता-संबंद्ध ऋण योजना ( पीएलपी) के प्रस्‍तुतिकरण के समय एनएबीएआरडी इस बात का भी पता लगाती है कि विभिन्‍न क्षेत्रों में जमीनी स्‍तर क्रेडिट (जीएलसी) को बढाना हो तो किन ढांचागत आवश्‍यकताओं को विकसित करना होगा। इस जानकारी को राज्‍य सरकारों को उपलब्‍ध कराया जाता है ताकि उचित कदम उठा सकें। एनएबीएआरडी राज्‍य सरकारों को ग्रामीण मूलभूत सुविधा विकास निधि (आरआईडीएफ) भी देती है ताकि वे अपनी अधूरी योजनाओं को पूरी कर सकें। मामले का अध्‍ययन : मदुरई : मदुरई के लिए वर्ष 2014-15 का क्षमता- संबंद्ध ऋण योजना 6293 करोड़ रूपये के कुल सम्‍भावित खर्चे से सम्‍पन्‍न होगा और जिले के विभिन्‍न क्षेत्रों को प्राथमिकता क्षेत्र श्रेणी के अन्‍तर्गत विकसित करेगा। यह वर्ष 2013-2014 के वार्षिक ऋण योजना (एसीपी) के 5520 करोड़ रूपये से कहीं अधिक है। पीएलपी के अंतर्गत कृषि और सम्‍बद्ध क्षेत्रों के लिए अधिक धनराशि तय की जाएगी जो कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना के उद्देश्‍यों के अनुरूप है। ऋण योजना में अनाजों के‍ लिए 1939 करोड़ रूपये की धनराशि का प्रावधान है। यह भारत सरकार द्वारा दिए गए दिशा-निर्देश के अनुरूप है- यानि, कृषि को किसान ऋण कार्ड (केसीसी) के माध्‍यम से बढ़ावा देना। पूंजी निर्माण के‍ लिए आवश्‍यक सावधि ऋण कृषि विकास को बढ़ावा देता है। योजना दस्‍तावेज में लघु सिंचाई, भूमि विकास, डेरी, कृषि यांत्रिकीकरण, बागवानी तथा भंडारण की सुविधाओं के लिए 1570 करोड़ रूपये निर्धारित किए गए हैं। एमएसएमई क्षेत्र का महत्‍व आय सृजन में महतवपूर्ण माना जाता है। इस क्षेत्र के‍ लिए 1244 करोड़ रूपये निर्धारित किए गए हैं। मदुरई एक शहरी पर्यटन स्‍थल के रूप में विकसित हो रहा है और ‘अन्‍य प्राथमिकता क्षेत्र’ के अंतर्गत बैंक 1540 करोड़ रूपये तक की धनराशि ऋण के रूप में भवन निर्माण, शिक्षा, उपभोक्‍ता वस्‍तुओं, व्‍यापारियों को तथा सड़क परिवहन ऑपरेटरों को दे सकती है। मदुरई के राष्‍ट्रीय कृषि और ग्रामीण बैंकों में एजीएम, श्री आर. शंकर नारायण ने मदुरई की ऋण योजना की रूपरेखा तैयार की है। उनके अनुसार क्षमता-संबद्ध ऋण योजना 2014-15 में सभी क्षेत्रों में विकास के लिए संभावनाओं को अंजाम देने के लिए ढांचागत सुविधाओं का ध्‍यान रखा है। उनका कहना था कि इस योजना का उद्देश्‍य यह है कि 2014-15 में संभावित दोहन के लिए ऋण का आकलन करना है।

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

गोआ अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव में कश्मीरी प्रतिभा का जलवा

भारत के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह (इफ्फि) का 44वां संस्करण कश्मीरी फिल्म निर्माताओं के लिए आश्चर्यजनक मंच सिद्ध हुआ है। समारोह ने उन्हें न केवल घरेलू बल्कि अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों के समक्ष अपनी रचनाशीलता प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान किया। 20 नवंबर को प्रारंभ हुए 11 दिन के फिल्मोत्सव के दौरान कश्मीरी फिल्म निर्माताओं द्वारा बनाई गई तीन गैर फीचर फिल्में प्रदर्शित की गईं। एक अन्य कश्मीरी फिल्म निर्माता द्वारा असोसिएट डायरेक्टर के रूप में काम करते हुए बनाई गई 90 मिनट अवधि की अफगान-भारत फिल्म ‘‘ए मैन्स डिज़ायर फार ए फिफ्थ वाइफ’’, समारोह में ‘‘विश्व सिनेमा वर्ग’’ के अंतर्गत शामिल की गई। यह फिल्म दरी भाषा में बनाई गई है। इफ्फि - 2013 में प्रतिष्ठित भारतीय पैनोरमा-गैर फीचर फिल्म वर्ग के अंतर्गत स्थान पाने वाली 3 कश्मीरी फिल्मों में राजा शबीर खान की ‘‘शेफड्र्स आफ पैराडाइज़’’, राजेश एस जाला द्वारा निर्मित ‘‘23 विंटर्स’’ और शाजिया खान की ‘‘समां: मुस्लिम मिस्टीक म्युजिक आफ इंडिया’’ शामिल है। शेफड्र्स आफ पैराडाइज़ शेफड्र्स आफ पैराडाइज़, गोजरी और उर्दू में बनाई गई 50 मिनट की फिल्म है जिसमें 75 वर्षीय गफूर की कहानी है। वह एक ग्वाला (गुज्जर-बकरवाल समुदाय) है, जो अपने परिवार और भेड़ों के समूह के साथ गर्मी के मौसम में जम्मू कश्मीर के मैदानी भागों से लेकर कश्मीर के पर्वतीय क्षेत्रों की पैदल यात्राएं करता है और सर्दी के मौसम में वापस लौटता है। कठिन भू-भाग, अपूर्वानुमेय मौसम और कश्मीर में गड़बड़ी की स्थितियां उसकी यात्रा को जोखिमपूर्ण बना देती हैं। यह फिल्म समारोह में दो बार दिखाई गई। इस फिल्म को 3 मई, 2013 को आयोजित 60वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह के दौरान ‘‘स्वर्ण कमल’’ (गोल्डन लोटस) पुरस्कार, एक प्रमाणपत्र और 1.50 लाख रुपये नकद पुरस्कार के रूप में दिए गए थे। इसे मराठी फिल्म ‘‘काताल’’ के साथ संयुक्त रूप से सर्वोत्कृष्ट सिनेमेटोग्राफी पुरस्कार से भी नवाजा गया था। फिल्म के निर्देशक राजा शबीर का कहना है कि कठिन प्रदेश, खराब मौसम, लंबी यात्रा और सीमित संसाधनों को देखते हुए फिल्म का निर्माण करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य था। फिल्म की शूटिंग बिना कार्मिकों के की गई और मुझे स्वयं ग्वाले के साथ करीब 300 किलोमीटर लंबे परंपरागत पर्वतीय रास्तों पर पैदल चलना पड़ा। कश्मीर विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान और इतिहास में पढ़ाई पूरी करने के बाद राजा शबीर खान ने 2003 में कोलकाता में सत्यजित रे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एसआरएफटीआईआई) में दाखिला लिया और बाद में वे एक वर्ष के लिए मुम्बई चले गए। उनकी पहली डाक्यूमेंटरी फिल्म, ‘ऐंजल्स आॅफ ट्रबल्ड पैराडाइज़’ को सिलिगुड़ी में लघु और डाक्यूमेंटरी फिल्मों के तीसरे अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव के दौरान जूरी के विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ‘23 विंटर्स’ ‘23 विंटर्स’ कश्मीरी और हिंदी में बनी 25 मिनट की फिल्म है जिसे इफ्फि में दो बार दर्शाया गया। इसमें एक ऐसे मनोरोगी कश्मीरी पंडित की काल्पनिक कहानी है जो कई वर्षों तक दिल्ली में रहने के बाद घाटी की यात्रा करता है। वास्तविक रूप में सेट की गई यह फिल्म एक वास्तविक नायक, बोटा द्वारा अभिनीत है जो एक अति यथार्थवादी जीवन जी रहा है। फिल्म में उसके त्रासदीपूर्ण अतीत को दर्शाया गया है जो उसके वर्तमान निर्वासित जीवन को परेशान करता है। फिर भी फिल्म में यह दर्शाया गया है कि इस सब के बावजूद उसकी उम्मीदें बरकरार रहती हैं। राजेश एस जाला के अनुसार वे 11 वर्ष से फिल्में बना रहे हैं जिनमें मुख्य रूप से डाक्यूमेंटरी शामिल हैं। वे अपनी फिल्मों में मानवीय भावनाओं, सामाजिक सरोकारों और अंतर-निहित संघर्षों को उजागर करते हैं। उन्होंने प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय टीवी चैनलों के लिए अनेक डाक्यूमेंटरी फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों का निर्देशन और निर्माण किया है। ‘समां: मुस्लिम मिस्टीक म्यूजिक आफ इंडिया’ इफ्फि में एक बार प्रदर्शित की गई यह 52 मिनट की हिंदी और अंग्रेजी फिल्म है। इसमें भारत में मुस्लिम संगीत परंपरा को तलाशने और यह उजागर करने का प्रयास किया गया है कि दोनों ने एक दूसरे को कैसे प्रेरित और प्रोत्साहित किया है। फिल्म में उस संबंध की खोज की गई है जो साधक को रचनाकर्ता के साथ तादात्मय स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है। साधक कलाकार द्वारा समां बांधने के कारण शांति, धीरता और आनंद की अनुभूति करता है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी सलीम खान, शाजिया खान और मोहम्मद यूनस ज़रगार ने की है। निलोफर शमा उत्तर कश्मीर में बारामूला से सम्बद्ध हैं जिन्होंने ‘‘ए मैन्स डिज़ायर फार ए फिफ्थ वाइफ’’ के लिए असोसिएट डायरेक्टर के रूप में काम किया है। इस फिल्म का निर्देशन और पटकथा लेखक इसके प्रमुख अभिनेता मोहम्मद सेदिक आबेदी ने किया है जिनके पास अफगानिस्तान स्थित जिहूम फिल्म एंड आल्तिन फिल्म कंपनीज़ में काम करने का 19 वर्ष का व्यावसायिक अनुभव है। फिल्म की कहानी में हजार वर्ष पुरानी एक रस्म को दर्शाया गया है जो उत्तरी अफगानिस्तान के एक गांव में अदा की जाती है। इसमें महिलाओं के खिलाफ हिंसा की कहानी उजागर की गई है। पहले से चार पत्नियां रखने के बावजूद एक पुरुष प्राचीन परंपराओं के साथ पांचवीं बार उससे शादी करना चाहता है। कहानी में यह दर्शाया गया है कि समाज में महिलाएं कितनी कमजोर और शोषित हैं। इसमें सदियों पुरानी संस्कृति के सभी घटक दर्शाए गए हैं। मीडिया से बातचीत के दौरान फिल्म में तीसरी पत्नी की भूमिका अदा करने वाली ताजीकिस्तान की अभिनेत्री निलोफर शमा ने तहमिना राजा बोआ के साथ बातचीत में कहा कि उन्होंने अपना करियर दूरदर्शन के साथ एक स्वतंत्र निर्माता-निर्देशक के रूप में किया था। वे 70 से अधिक वृत्तचित्रों, 85 टीवी धारावाहिकों, 5 विज्ञापन फिल्मों, 5 टेलीफिल्मों और 5 लघु फिल्मों एवं अनेक टाॅक शो का निर्देशन कर चुकी हैं। उन्होंने कहा कि अफगान फिल्म के लिए काम करना उनके लिए भय, उत्साह और साहस की मिलाजुली अनुभूति रही है।

भारतीय फिल्‍म उद्योग के इतिहास पुरूष अक्‍किनेनी नागेश्‍वर राव

तेलुगु फिल्‍म उद्योग के दिग्‍गज डॉ. अक्‍किनेनी नागेश्‍वर राव ने अभिनेता के रूप में अपने 75 वर्ष के करियर में सामाजिक, रूमानी और धार्मिक श्रेणी की 256 फिल्‍मों में काम करके इतिहास रचा। प्रसिद्ध फिल्‍म अभिनेता डॉ. अक्‍किनेनी नागेश्‍वर राव ने दुनियाभर में अपने चाहने वाले करोड़ों लोगों का दिल जीता। भारतीय युवाओं तथा भारत और विदेशों के नए उभरते कलाकारों के लिए वह एक आदर्श हैं। साफ-सुथरे चरित्र, अनुशासन, कठिन परिश्रम तथा मानवीय और नैतिक मूल्‍यों के प्रति कटिबद्धता के कारण वह भारतीय समाज में प्रतिष्ठित व्‍यक्ति बने। बातासारी, देवदास और तेनाली रामकृष्‍ण जैसी सफल फिल्‍मों में अपनी यादगार भूमिकाओं से उन्‍होंने दर्शकों को मंत्रमुग्‍ध किया। डॉ. अक्‍किनेनी नागेश्‍वर राव श्‍वेत-श्‍याम फिल्‍मों के युग के थे। वे अपनी दृढ़ इच्‍छा शक्ति और सकारात्‍मक सोच के लिए जाने जाते थे। 91 वर्षीय डॉ. राव का कैंसर के कारण 22 जनवरी, 2014 को हैदराबाद में निधन हो गया। वह सदाबहार हीरो एएनआर के नाम से प्रसिद्ध थे। उनकी तीन पुत्रियों और दो पुत्रों में से एक फिल्‍म अभिनेता नागार्जुन हैं और कई नाती हैं। उनके पौत्र नाग चैतन्‍य भी सिनेमा कलाकार हैं। आंध्र प्रदेश में कृष्‍णा जिले के राघवपुरम में 20 सितम्‍बर, 1923 को एक गरीब परिवार में जन्‍मे डॉ. अक्‍किनेनी नागेश्‍वर राव पांच भाईयों में सबसे छोटे थे। उनके माता-पिता अक्किनेनी पुन्‍नम्‍मा और अक्किनेनी वेंकटरत्‍नम किसान समुदाय से थे। घर की कमजोर आर्थिक हालत के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा केवल प्राइमरी तक हुई। फिल्‍म जगत में प्रवेश 1941 में 17 वर्ष की आयु में उन्‍होंने तेलूगू फिल्‍म धर्मपत्‍नी में काम किया, जिसमें उन्‍होंने नायक के मित्र की भूमिका निभाई। उन्‍हें प्‍यार से एएनआर बुलाया जाता था। उस समय के प्रसिद्ध फिल्‍म निर्माता घंटाशाला बालारमैया से विजयवाड़ा रेलवे स्‍टेशन पर उनकी अचानक मुलाकात हुई और उन्‍होंने उन्‍हें तुरंत अपनी आने वाली फिल्‍म सीता राम जनानाम में भगवान राम के मुख्‍य किरदार की भूमिका की पेशकश की। मुख्‍यरूप से उन्‍होंने थियेटर में काम किया और कई बार महिलाओं की भी भूमिका की, क्‍योंकि उन दिनों महिलाओं को थियेटर जाने की अनुमति नहीं थी। तब से लेकर उन्‍होंने 256 से भी अधिक तेलुगु, तमिल और हिन्‍दी की फिल्‍मों में काम किया और तेलुगु सिनेमा की जानी-मानी हस्‍ती बन गये। उनकी ज्‍यादातर फि‍ल्‍में व्‍यावसायि‍क और आलोचकों के पैमाने पर खरी उतरी है। प्रमुख फि‍ल्‍मों में अद्भुत प्रदर्शन एएनआर ने मोहक राजकुमार से लेकर हताश शराबी प्रेमी, वीर सैनि‍क, पवि‍त्र संत कॉलेज के छात्र एवं शांत सरकारी अधि‍कारी की भूमि‍का नि‍भाई। उन्‍होंने धार्मि‍क भूमि‍काएं भी बेहतर ढंग से नि‍भाई। उन्‍होंने ‘माया बाजार’ फि‍ल्‍म में अभि‍मन्‍यु, ‘चेंचु लक्ष्‍मी’ में भगवान वि‍ष्‍णु, ‘भू कैलाश’ में नारद तथा ‘श्री कृष्‍णार्जुन युद्धम’ में अर्जुन की भूमि‍का नि‍भाई। ‘बालाराजू’, ‘रोजूलू मराई’ और ‘नम्‍मि‍नाबन्‍तु’ जैसी ग्रामीण परि‍प्रेक्ष्‍य की फि‍ल्‍मों से उन्‍हें तेलुगु सि‍नेमा के पहले सुपरस्‍टार का ओहदा प्राप्‍त हुआ। ‘मि‍साम्‍मा’, ‘चक्रपाणि‍’ और ‘प्रेमिंची चुडु’ जैसी हास्‍यप्रद फि‍ल्‍मों में भी आकर्षक भूमि‍का अदा की। ‘लैला मजनूँ’, ‘अनारकली’, ‘बतसरी’, ‘प्रेमनगर’, ‘प्रेमाभि‍षेकम’, और ‘मेघासंदेशम’ जैसी रूमानी फि‍ल्‍मों में उनके यादगार अभि‍नय के कारण एएनआर को प्‍यार से तेलुगु सि‍नेमा का ‘ट्रेजेडी किंग’ कहा जाता था। दासारी नारायण राव द्वारा नि‍र्देशि‍त फि‍ल्‍म ‘प्रेमाभि‍षेकम’ टॉलीवुड की सबसे बड़ी हि‍ट फि‍ल्‍मों में से एक है। हैदराबाद शहर में यह फि‍ल्‍म 533 दि‍नों तक दि‍खाई गई जो अब तक की शहर में सबसे लंबे समय तक प्रदर्शि‍त तेलुगु फि‍ल्‍म है। ‘प्रेमाभि‍षेकम’ ही केवल ऐसी तेलुगु फि‍ल्‍म है जि‍सका प्रदर्शन लगातार एक वर्ष से अधि‍क समय तक कि‍या गया। तेलुगु फि‍ल्‍म में उन्‍होंने पहली बार दोहरी भूमि‍का नि‍भाई तथा ‘नवरात्रि‍’ फि‍ल्‍म में नौ भूमि‍काएं अदा की। एएनआर ने वि‍ख्‍यात लेखक ‘शरतचंद्र’ की कहानी पर आधारि‍त ‘देवदासू’ में शराबी प्रेमी का अभि‍नय कि‍या जि‍स पर बाद में कई भाषाओं में फि‍ल्‍में बनी। हि‍न्‍दी फि‍ल्‍म के प्रसि‍द्ध नायक दि‍लीप कुमार ने कहा कि‍ ‘‘केवल एक ही देवदास है और वह है नागेश्‍वरा रॉव’’। एएनआर की ‘समसरम’, ‘ब्रतुकू तेरूवु’, ‘अराधना’, ‘डोंगा रामूदू’, ‘डॉ. चक्रवर्ती’, ‘अर्द्धांगी’, ‘मंगलया बालम’, ‘इल्‍लारीकम’, ‘शांति‍नवासम’, ‘वेलुगु नि‍दालु’, ‘दसारा बुलोदु’, ‘भार्या भरतलू’, ‘धर्मादता’, ‘बतसरी’ और ‘कॉलेज बुल्‍लोदु’ जैसी अधि‍कतर सामाजि‍क फि‍ल्‍में व्‍यावसायि‍क तौर पर सफल रही है। एएनआर की पहली फि‍ल्‍म के 50 वर्ष के बाद 1991 में ‘सि‍तारामय्यागारी मनावरालु’ प्रदर्शित की गई और फि‍ल्‍म उद्योग में नए एवं युवा कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद यह फि‍ल्‍म बॉक्‍स ऑफि‍स पर बड़ी सफल रही। भारत के वि‍भि‍न्‍न क्षेत्रों के साहि‍त्‍यि‍क और सांस्‍कृति‍क भूमि‍काओं के कारण आलोचकों और कला प्रेमि‍यों द्वारा एएनआर की सराहना की गई। महान संस्‍कृत कवि‍ उज्‍जैन के महाकवि‍ ‘कालि‍दास’, ओडि‍शा के महान संगीतकार संत ‘भक्‍त जयदेव’ कर्नाटक के शि‍ल्‍पकार ‘अमराशि‍ल्‍पी जक्‍कन्‍ना’, तमि‍लनाडु के भक्‍त संत ‘वि‍परनारायण’ और महाराष्‍ट्र के गायक भक्‍त ‘तुकाराम’ जैसी उनकी फि‍ल्‍में देश की अखंडता बनाए रखने का जरि‍या बनी। समाज में बेहतर योगदान ‍तेलुगु फि‍ल्‍म अभि‍नेता एवं नि‍र्माता के अलावा अक्‍कि‍नेनी नागेश्‍वर राव की हैदराबाद में तेलुगु फि‍ल्‍म नि‍र्माताओं को प्रभावि‍त कर तेलुगु फि‍ल्‍मों का आधार बनाने में अहम भूमि‍का है। शुरूआती दि‍नों में तेलुगु फि‍ल्‍में तमि‍लनाडु के मद्रास(अब चेन्‍नई) बनाई जाती थी। 1 नवम्‍बर, 1956 में आंध्र प्रदेश के रूप में नए राज्‍य के गठन के बाद से कई नेताओं का मानना था कि‍ तेलुगु फि‍ल्‍म उद्योग को एक अलग पहचान दी जानी चाहि‍ए और इसका मुख्‍यालय आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद होना चाहि‍ए। एएनआर उस समय के पहले अभि‍नेता थे जि‍न्‍होंने तेलुगु फि‍ल्‍म केन्‍द्र को चेन्‍नई से हैदराबाद ले जाने पर जोर दि‍या। एएनआर ने हैदराबाद में 22 एकड़ जमीन पर अपना एक प्रोडक्‍शन स्‍टूडि‍यो/हाऊस अपनी पत्‍नी के नाम पर ‘अन्‍नापूर्णा स्‍टूडि‍यो’ का नि‍र्माण कि‍या। 1957 में उन्‍होंने आंध्र वि‍श्‍ववि‍द्यालय के लि‍ए बड़ी राशि‍ दान में दी। आंध्र प्रदेश में गुदि‍वाड़ा के एक महावि‍द्यालय के वे प्रमुख दानदाता एवं अध्‍यक्ष थे। फि‍ल्‍म अभि‍नेता के अलावा एएनआर एक सफल लेखक भी थे। भारत के सांस्‍कृति‍क राजदूत भारत के सांस्‍कृति‍क राजदूत के रूप में अमरीका, रूस, ब्रि‍टेन, फ्रांस, जर्मनी, डेनमार्क, मलेशि‍या और जापान का दौरा कि‍या था। वे भारतीय राष्‍ट्रीय फि‍ल्‍म वि‍कास नि‍गम के नि‍देशकों के बोर्ड में भी शामि‍ल थे। राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मान भारतीय फि‍ल्‍म उद्योग में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने पीएनआर को पदम श्री, पदम भूषण, पदम वि‍भूषण और दादा साहब फाल्‍के पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त कि‍या। डॉ. नागेश्‍वर राव को ‘मेघसंदेशम’ और ‘बंगारू कुटुंबम’ में भूमि‍का के लि‍ए सर्वश्रेष्‍ठ अभि‍नेता का नंदी पुरस्‍कार से भी सम्‍मानि‍त कि‍या गया। मध्‍य प्रदेश सरकार ने भी नागेश्‍वरा राव को प्रति‍ष्‍ठि‍त कालि‍दास पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त कि‍या। अमरीका की तेलुगु एसोसि‍एशन ऑफ नार्थ अमेरि‍का(ताना) ने 1912 में उन्‍हें लाइफटाइम अचीवमेंट से सम्‍मानि‍त कि‍या। 22 जनवरी, 2014 को इस महान अभि‍नेता की मृत्‍यु हो गई। वह 91 वर्ष के थे तथा वे आंतों के कैंसर से पीड़ि‍त थे।

महात्‍मा गांधी के जीवन पर फिल्‍म प्रदर्शनी का मुंबई में उद्घाटन

महात्‍मा गांधी की 66वीं पुण्य तिथि पर, 30 जनवरी को जब पूरा देश उन्‍हें श्रद्धांजलि दे रहा था, मुंबई के प्रसिद्ध मणिभवन में लोगों को राष्‍ट्रपिता के जीवन के बारे में कुछ दुर्लभ फिल्‍मों को देखने का अवसर मिला। इस अवसर पर महात्‍मा गांधी प्रदर्शनी के नवस्‍थापित केंद्र का उद्घाटन करते हुए महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल श्री के. शंकरनारायणन ने कहा कि लोगों में महात्‍मा गांधी के विचारों का महत्‍व और उनके सत्‍य, अहिंसा और सत्‍याग्रह के सिद्धांतों के बारे में लगातार उत्‍कंठा बढ़ रही है। इस केंद्र का इस्‍तेमाल महात्‍मा गांधी के जीवन पर बनी छोटी फिल्‍मों और वृतचित्रों के दिखाने को लिए किया जाएगा। जब महात्‍मा गांधी की 66 वर्ष पहले हत्‍या कर दी गई थी, दुनिया भर के नेता और पूरा विश्‍व राष्‍ट्र संयुक्‍त राष्‍ट्र में एक सभा करके उन्‍हें श्रद्धांजलि दे रहा था और उनके बारे में शोक प्रकट कर रहा था। इन घटनाओं के बारे में श्‍वेत-श्‍याम वीडियो तथा महात्‍मा गांधी के जीवन के बारे में कई अन्‍य फिल्‍में अब वे लोग देख सकेंगे जो सवेरे दस से शाम पांच बजे के बीच इस केंद्र के 25 व्‍यक्तियों के बैठने लायक ऑडियो विजुअल रूम में आ सकेंगे। गांधी फिल्‍म प्रतिष्‍ठान के अध्‍यक्ष श्री नितिन पोतदार जिन्‍होंने इस केंद्र की शुरूआत की थी, का कहना है कि यह फिल्‍म प्रदर्शन केंद्र, अपने ढंग अनूठा और पहला केंद्र है। यह महात्‍मा गांधी के बारे में खुद ही वीडियो-ग्राफिक फिल्‍में प्रदर्शित करेगा जिससे लोग भारत की स्‍वतंत्रता, गांधी जी के जीवन के बारे में, नमक सत्‍याग्रह और गांधी जी श्री मोहम्‍मद अली जिन्‍ना के साथ मुलाकात के बारे में महत्‍वपूर्ण सूचनाएं पा सकेंगे। इस प्रतिष्‍ठान ने दुनिया भर से महात्‍मा गांधी के बारे में सैकड़ों लघु वृतचित्र और वीडियो इकट्ठा किये हैं। इनको छह फिल्‍मों के रूप में संकलित कर दिया गया है जिन्‍हें इस केंद्र पर देखा जा सकेगा। इस प्रतिष्‍ठान को विभिन्‍न स्रोतों से वीडियो क्लिीपिंग्‍स मिली हैं। इनमें से कुछ स्रोत हैं न्‍यूज एजेंसियां, सरकारी संस्‍थायें और स्‍वतंत्र संगठन जिन्‍होंने इन्‍हें डिजिटल फॉर्मेट में बदल दिया है। बिडला ग्रुप ने महात्‍मा गांधी की दूसरे गोल मेज सम्‍मेलन में शामिल होने के लिए लंदन यात्रा की फुटेज उपलब्‍ध कराई है। गांधी जी के जीवन के इन वर्षों से संबंधित फुटेज छात्रों, अनुसंधानकर्ताओं और दूरदर्शन बीबीसी आदि जैसे न्‍यूज चैनलों को उपलब्‍ध हैं। ये लोग चाहते थे कि इन फुटेज का इस्‍तेमाल उनके समाचार को सचित्र बनाने में किया जाए। श्री पोतदार का ख्‍याल था कि इन अनुसंधानकर्ताओं को जो भी सामग्री उपलब्‍ध कराई जाए वह आम जनता को भी उपलब्‍ध हो। उन्‍होंने कहा कि ''इसीलिए हमने इस प्रदर्शनी केंद्र को 30 जनवरी को आम जनता के लिए खोल दिया।'' गांधी जी के बारे में जारी फिल्‍मों के अलावा गांधी फिल्‍म प्रतिष्‍ठान द्वारा तैयार की गई फिल्‍में-अभिशाप (ये छुआछूत की बुराई पर आधारित है।), 'बादशाह खानद' इसमें सरहदी गांधी खान अब्दुल गफार खान के जीवन का चित्रण किया गया है, 'अहिंसा का चमत्‍कार' इसमें चम्‍बल घाटी के डाकुओं का आत्‍मसमर्पण दिखाया गया है और 'करेंगे या मरेंगेद' यह फिल्‍म भारत छोड़ो आंदोलन पर आधारित है, भी दर्शकों को उपलब्‍ध कराई गईं हैं। इस प्रदर्शनी केंद्र का आकार भले ही छोटा हो, लेकिन यहां पर जो सुविधाएं जुटाई गईं हैं वह मणिभवन आने वालों के लिए वरदान साबित होंगी। यह केंद्र दक्षिण मुंबई के गामदेवी इलाके में स्थित है। ये वही जगह है जहां महात्‍मा गांधी जब भी मुंबई आते, ठहरते थे। मणिभवन से ही गांधी जी ने असहयोग आंदोलन की शुरूआत की। स्‍वदेशी आंदोलन भी यहीं से शुरू हुआ। 1917 से उन्‍होंने चरखा कातना शुरू किया। तब से लेकर चरखे के संग जब भी वे यहां आये, उनका साथ बना रहा। ग्‍वालिया टैंक (अब इसे अगस्‍त क्रांति मैदान कहा जाता है), यहां से मात्र 100 मीटर दूर है। गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत यहीं से की थी। मणिभवन मुंबई का प्रमुख पर्यटन स्‍थल बन गया है। विदेशी पर्यटक यहां ज्‍यादा आते और घरेलू पर्यटकों के मुकाबले गांधी स्‍मारक भवन अधिक जाते हैं। मणिभवन की यात्रा अमेरिका के राष्‍ट्रपति बराक ओबामा के एजेंडे में 2010 में भारत यात्रा के समय काफी ऊपर थी। उन्‍होंने इसे अवसर पर गांधी जी के बारे में स्‍वागत पुस्तिका में जो कुछ दर्ज किया था उससे दुनिया में गांधी जी की सार्थकता जाहिर हो जाती है। ओबामा ने लिखा था ''यहां आकर मैं उम्‍मीद और प्रेरणा से भर गया हूं। यह मेरा सौभाग्‍य है कि मैं गांधी जी के इन स्‍मारकों को देख रहा हूं। वह सिर्फ भारत के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के नायक थे।

ODC of my Ph.D Scholar

 Seeing our scholar defending his PhD thesis during ODC was a great moment. This was the result of his hard work. Dr. Sanjay Singh, a senior...