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मंगलवार, 1 मार्च 2016
जीडीपी की वृद्धि दर बढ़कर 7.6 प्रतिशत हुई; 2016-17 का बजट 'ट्रांस्फॉर्म इंडिया' के एजेंडे पर टिका है : वित्त मंत्री
केंद्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने आज लोकसभा में वित्त वर्ष 2016-17 का आम बजट पेश करते हुए कहा कि चालू वित्त वर्ष के दौरान सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर बढ़कर 7.6 प्रतिशत तक हो गई है। ऐसा पिछली सरकार के अंतिम तीन वर्षों के दौरान विश्व निर्यातों में हुए 7.7 प्रतिशत की वृद्धि की तुलना में, वैश्विक निर्यातों में 4.4 प्रतिशत की कमी होने के बावजूद हुआ। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर विकास 2014 के 3.4 प्रतिशत से कम होता हुआ 2015 में 3.1 प्रतिशत के स्तर पर आ गया। वित्तीय बाजारों पर आघात हुए हैं और वैश्विक व्यापार कम हो गया है। विश्व स्तर पर इन प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद, अपनी अंदरूनी ताकतों एवं वर्तमान सरकार की नीतियों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपना आधार मजबूत बनाए रखा है।
वित्त मंत्री श्री जेटली ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने भारत को मंद पड़ती वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच एक 'दैदीप्यमान प्रकाश स्तंभ' का नाम दिया है। विश्व आर्थिक मंच ने कहा है कि भारत का विकास 'असाधारण रूप से उच्च' रहा है। हमने यह उपलब्धि प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद और इस तथ्य के बावजूद हासिल की है कि हमें विरासत में एक ऐसी अर्थव्यवस्था मिली थी जिसमें विकास कम, महंगाई अधिक और सरकार की शासन करने की सामर्थ्य में निवेशक का विश्वास शून्य था।
वित्त मंत्री श्री जेटली ने यह भी कहा कि पिछली सरकार के अंतिम तीन वर्षों के दौरान, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक संबंधी मुद्रास्फीति 9.4 प्रतिशत के स्तर पर थी। हमारी सरकार के कार्यकाल में यह कम होकर 5.4 प्रतिशत पर आ गई। यह उपलब्धि लगातार दो वर्षों में मानसून की वर्षा में 13 प्रतिशत की कमी के बावजूद हासिल की गई।
श्री जेटली ने कहा कि हमारी वैदेशिक स्थिति मजबूत है और चालू खाता घाटा पिछले वर्ष के पूर्वार्द्ध के 18.4 बिलियन डॉलर से घटकर इस वर्ष 14.4 बिलियन डॉलर रह गया। अनुमान है कि इस वर्ष के अंत तक यह सकल घरेलू उत्पाद का 1.4 प्रतिशत रह जाएगा। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 350 बिलियन डॉलर का है, जो अभी तक का अधिकतम स्तर है।
वित्त मंत्री ने इस सिद्धांत के प्रति संकल्प दोहराया कि सरकार के पास का धन लोगों का धन है, और सरकार पर इसे लोगों के, खासकर गरीब एवं वंचित वर्गों के कल्याण के लिए विवेकपूर्ण ढ़ंग से खर्च करने की पावन जिम्मेदारी है। वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने सातवें केंद्रीय वेतन आयोग की अनुशंसाओं एवं रक्षा ओआरओपी के क्रियान्वयन के कारण वित्त वर्ष 2016-17 के लिए अपने व्यय को भी प्राथमिकता देने का निर्णय किया है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार समाज के निर्बल वर्गों की सहायता के लिए तीन बड़ी योजनाएं शुरू करेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार की प्राथमिकता निर्बल वर्ग, ग्रामीण क्षेत्रों को अतिरिक्त संसाधन मुहैया कराने तथा भौतिक ढांचे का निर्माण करने की है।
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016
हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत का संगम सूरजकुंड मेला
सूरजकुंड शिल्प मेले का आयोजन पहली बार वर्ष 1987 में भारत के हस्तशिल्प, हथकरघा और सांस्कृतिक विरासत की समृद्धि एवं विविधता को प्रदर्शित करने के लिए किया गया था। केंद्रीय पर्यटन, कपड़ा, संस्कृति, विदेश मंत्रालयों और हरियाणा सरकार के सहयोग से सूरजकुंड मेला प्राधिकरण तथा हरियाणा पर्यटन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह उत्सव सौंदर्यबोध की दृष्टि से सृजित परिवेश में भारत के शिल्प, संस्कृति एवं व्यंजनों को प्रदर्शित करने के लिहाज से अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण स्थान एवं शोहरत रखता है। वर्ष 2013 में सूरजकुंड शिल्प मेले को अंतर्राष्ट्रीय मेले का दर्जा दिए जाने से इसके इतिहास में एक नया कीर्तिमान स्थापित हुआ। वर्ष 2015 में यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण एशिया के 20 देशों ने इस मेले में भागीदारी की। इस वर्ष मेले में 23 देशों ने भाग लिया है, जिनमे चीन, जापान, श्रीलंका, नेपाल, अफगानिस्तान, लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो, मिश्र, थाईलैंड, मालदीव, रूस, किर्गिस्तान, वियतनाम, लेबनान, ट्यूनिशिया, तुर्कमेनिस्तान, मलेशिया और बांगलादेश की जोरदार उपस्थिति है। इस वर्ष 30वें सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला 2016 का भव्य आयोजन किया गया है।
सूरजकुंड मेला प्राधिकरण और हरियाणा पर्यटन ने ग्रामीण भारत की स्पंदनशीलता और सौंदर्य को प्रदर्शित करने के लिए मेला मैदान को आकर्षक एवं जीवंत रूप देने के उद्देश्य से क्रिएटिव डायमेंशन कोलकाता के पेशेवर परामर्शदाताओं सुब्रत देबनाथ तथा डॉ. अनामिका बिश्वास ने सेवा दी हैं।
मेला क्षेत्र को पांच क्षेत्रों में विभाजित किया गया है जिन्हें भारत के पांच मौसमों, बसंत, ग्रीष्म, मानसून, पतझड़ और शीत के अनुरूप बनाया गया है। यह पांच मौसम पांच खिड़कियों के माध्यम से प्रदर्शित किए गए हैं- फूल तथा तितलियां बसंत ऋतु का प्रतीक है, चमकता सूरज तथा सूरजमुखी के फूल ग्रीष्म का प्रतीक हैं, बादल युक्त आसमान तथा वर्षा मानूसन का प्रतिनिधित्व करते हैं और इसी प्रकार वृक्षों से झड़ते पत्ते पतझड़ ऋतु तथा बर्फ से लदे वृक्ष और रेंडियर शीत ऋतु का प्रतीक है।
नवगठित राज्य तेलंगाना इस वर्ष सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेले का थीम राज्य है जोकि बड़े ही आकर्षक ढंग से अपनी अनूठी संस्कृति एवं ऐतिहासिक विरासत को प्रदर्शित कर रहा है। पर्यटन सचिव, तेलंगाना सरकार श्री बी.वेंकटेशम ने तेलंगाना से लगभग 300 कलाकार ओग्गूडोलू, चिन्डू यक्ष गनम, गुसाड़ी, कोम्मू कोया मथुरी, चिरु, तला रामायणम, कोलातम, पैरिनी नाट्यम , बंजारा, लम्बाड़ी, बोनालू जैसी विभिन्न लोक कलाओं का प्रदर्शन कर रहे हैं। मेले के मुख्य प्रवेश द्वार पर एक स्थाई स्मरणीय अवसंरचना, ककातिया गेटा का निर्माण किया है। इसके अतिरिक्त तेलंगाना के राज्य प्रतीकों को प्रदर्शित करने वाले तीन द्वार भी हैं, जो दर्शकों के मूड को जीवंत बनाने के लिए जापान, कांगो, मिश्र, मालदीव, रूस, किर्गिस्तान, वियतनाम और तुर्कमेनिस्तान के अंतर्राष्ट्रीय लोक कलाकारों द्वारा शानदार कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
हरियाणा और तेलंगाना राज्यों से एक-एक परिवार अपने क्षेत्र की ठेठ जीवनशैली को प्रदर्शित करने के लिए मेला मैदान में विशेष रूप से बनाए गए 'अपना घर’ में निवास में कर रहे हैं। हरियाणा का 'अपना घर’ मुक्के बाजी और कुश्ती जैसे प्रदेश के अति लोकप्रिय खेलों को भी प्रदर्शित करता है। महिला सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 'अपना घर’ ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान भी प्रदर्शित किया जा रहा है, जिसमें महिलाएं बॉक्सर, दूध दुहने वाली और गृहणी जैसी विभिन्न भूमिकाओं में होंगी।
उत्तर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र तथा अन्य क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के लोक कलाकारों द्वारा मेला मैदान के ओपन एयर थियेटर 'चौपाल’ में दिन के समय प्रस्तुत किए जाने वाले कार्यक्रमों में विभिन्न नृत्य विधाएं प्रस्तुत की जा रही है। इनमें जम्मू एवं कश्मीर का जबरो एवं रोउफ, छत्तीसगढ़ का पंथी, कर्नाटक का ढोलू कुनीठा, उड़ीसा का गोटी पुआ, आसाम का बिहू, हिमाचल प्रदेश का सिरमौरी, राजस्थान का कालबेलिया एवं चकरी, उत्तराखंड का छपेली, उत्तरप्रदेश का छाऊ, पंजाब का गिद्दा एवं भांगड़ा आदि शामिल है। मेला पखवाड़े के दौरान शाम के समय प्रस्तुत किए जाने वाले रोमांचक सांस्कृतिक कार्यक्रम दर्शकों को पूरी तरह से मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
यह मेला 40 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और इसमें शिल्पकारों के लिए बनी लगभग 864 वर्क हट्स तथा एक बहु व्यंजन फूड कोर्ट है जो कि दर्शकों में बहुत लोकप्रिय है। इस वर्ष दर्शक मेले में बने फूड कोर्ट में भारतीय स्ट्रीट फूड एवं अन्य राज्यों के मुंह में पानी ला देने वाले व्यंजनों का आनंद ले रहे हैं।
सूरजकुंड का इतिहास
सूरजकुंड का नाम यहां 10वीं सदी में तोमर वंश के राजा सूरज पाल द्वारा बनवाए गए एक प्राचीन रंगभूमि सूर्यकुंड से पड़ा। यह एक अनूठा स्मारक है, क्योंकि इसका निर्माण सूर्य देवता की आराधना करने के लिए किया गया था और यह यूनानी रंगभूमि से मेल खाता है। यह मेला वास्तव में, इस शानदार स्मारक की पृष्ठभूमि में आयोजित भारत की सांस्कृतिक धरोहर की भव्यता और विविधता का जीता-जागता प्रमाण है।
सोमवार, 16 नवंबर 2015
तिल का उत्पादन यानि ‘खुल जा सिमसिम’
उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के जिक्र से ही अधिकांश लोगों के मन में गरीबी और पिछड़ेपन की तस्वीर उभर जाती है। यह क्षेत्र अपने विशिष्ट भौगोलिक इलाके और जलवायु की परिस्थितियों के कारण कृषि के उत्पादन के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी पिछड़ा हुआ है। बुन्देलखण्ड के उत्तर प्रदेश वाले हिस्से में झांसी और चित्रकूट डिवीजनों के 7 जिले आते हैं। इस क्षेत्र में रबी की अच्छी और अधिक कीमत वाली फसलें जैसे चना, मसूर और मटर आदि भारी मात्रा में उगाई जाती हैं, लेकिन इस क्षेत्र के किसान मुख्य रूप से केवल एक फसल पर ही निर्भर रहते हैं। खरीद के दौरान कम क्षेत्र में बुआई हो पाती है।
परंपरागत रूप से रबी के दौरान बुआई किए गए रकबे की तुलना में बुन्देलखण्ड के किसान खरीफ सीज़न के दौरान केवल लगभग 50 प्रतिशत रकबे में बुआई करते हैं। रबी के दौरान जहां फसल बुआई का कुल रकबा लगभग 18.50 लाख हेक्टेयर है। खरीफ के दौरान फसल बुआई का रकबा लगभदग 9 लाख हेक्टेयर ही रहता है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह क्षेत्र अन्न प्रथा के कारण प्रभावित रहता है। यह एक परंपरागत प्रणाली है जिसके तहत लोग अपने दुधारू पशुओं को भी खेतों में बिना रोक-टोक के चरने के लिए छोड़ देते हैं। यह पशु फसलों को खा जाते हैं इसलिए किसान खरीफ सीजन के दौरान अपने खेतों में बुआई के इच्छुक नहीं रहते हैं। लेकिन रबी के सीज़न में यह सब नहीं होता है क्योंकि किसान अपने पशुओं को घर पर ही रखते हैं। इस घटना को समझने के लिए किसी भी व्यक्ति को बुन्देलखण्ड में प्रचलित विशिष्ट परिस्थितियों की सराहना करनी पड़ेगी। सर्वप्रथम बात यह है कि पूरा क्षेत्र परंपरागत रूप से वर्षा पर आधारित है और पानी की कमी से ग्रस्त रहता है। मानसून की अनिश्चिताओं के कारण यहां किसान अपने खेतों में फसल की बुआई करने को वरीयता नहीं देते। दूसरी बात यह है कि इस क्षेत्र में भूमि जोत का औसतन आकार राज्य के भूमि जोत की तुलना में बहुत बड़ा है क्योंकि यहां जनसंख्या का घनत्व काफी कम है। इसलिए विगत में किसानों के लिए केवल एक अच्छी फसल ही बोना संभव रहता था। लेकिन ऐसा करना लंबे समय तक संभव नहीं रहा। अब स्थिति बदल रही है क्योंकि जनसंख्या बढ़ रही है और इस क्षेत्र में भी औसत भूमि जोत का आकार काफी कम हो गया है। तीसरी बात यह है कि यह क्षेत्र वर्षा आधारित है। इसलिए गर्मी के मौसम के दौरान इस क्षेत्र में चारे की सामान्य रूप से कमी हो जाती है। इस कारण किसानों को मजबूरन अपने पशुओं को खेतों में जो भी मिले वही चरने के लिए खुला छोड़ना पड़ता है। धीरे-धीरे यह स्वीकार्य प्रथा बन गयी और किसानों ने बुन्देलखण्ड में खरीफ सीज़न के दौरान अपने खेतों में फसलों की बुआई बंद कर दी। लेकिन इतने बड़े क्षेत्र में फसलों की बुआई न होना देश के लिए एक तरह से राष्ट्रीय अपव्यय भी है।
रबी के पिछले दो सीजनों के दौरान बुन्देलखण्ड में बैमौसमी बारिश और ओलावृष्टि के कारण किसानों को 2014-15 में भारी नुकसान उठाना पड़ा। बुन्देलखण्ड में फसल बीमा के तहत किसानों की कवरेज लगभग 15 प्रतिशत है जो राज्य की औसत 4 से 5 प्रतिशत कवरेज की तुलना में काफी अधिक है लेकिन अभी भी यह प्रतिशत बहुत कम है क्योंकि इस क्षेत्र के किसान मुख्य रूप से रबी से प्राप्त आय पर ही निर्भर करते हैं। इस कारण उनके लिए यह बहुत बड़ा झटका था। राज्य सरकार ने एक विशिष्ट नीति की घोषणा की तो किसान कुछ अतिरिक्त आय जुटाने के लिए बहुत उत्सुक नज़र आए। बुन्देलखण्ड में खरीफ के दौरान तिल की खेती की संभावनाओँ को महसूस करते हुए इस क्षेत्र के किसानों के लिए अनुदान पांच गुणा बढ़ाकर 20 रुपये प्रति किलो से 100 रूपय प्रति किलों कर दिया गया था। तिल उत्पादन को बढ़ावा देने का निर्णय इस तथ्य को ध्यान में रखकर लिया गया था कि पशु इस फसल को नहीं खाते हैं। इस क्षेत्र के किसानों में वितरित करने के लिए तिल के बीजों की भारी मात्रा में खरीदारी की गयी। खरीफ के दौरान तिल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक आक्रामक अभियान शुरू किया गया था। विभागीय अधिकारी, गैर-सरकारी संगठन, जिला और सम्भागीय अधिकारी और अन्य संबंधित लोगों ने तिल के अधीन रकबा बढ़ाने और पिछले वर्ष के आँकड़ों की तुलना में सामान्य रूप से अधिक रकबा लाने के लिए सक्रिय रूप से अभियान चलाया।
इसका परिणाम बहुत उत्साहजनक रहा। खरीफ 2014 की तुलना में बुन्देलखण्ड में इस वर्ष 2 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त रकबे में बुआई की गयी जिसमें से 1.25 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त रकबे में तिल की बुआई हुई। यह वादा किया गया था कि अगर किसान अन्न प्रथा के बावजूद इस फसल से अच्छा लाभ अर्जित करने में सफल हो जाएंगे तो वे आगे फसल की बुआई करेंगे। यह वादा अब सही सिद्ध हुआ है। स्थानीय प्रशासन के सक्रिय हस्तक्षेप के कारण ही यह संभव हो पाया है। जालौन जिले की अभी हाल में की गयी यात्रा के दौरान मैंने किसानों को प्रशासन का आभारी देखा जिसने किसानों को अपने पशुओं को दूसरों के खेतों में बे-रोकटोक चरने से रोकने के लिए रोका। जिसके परिणामस्वरूप बुआई के क्षेत्र में बढ़ोत्तरी हुई। ओरई-झांसी राजमार्ग के दोनों और कई-कई किलोमीटर तक तिल के खेतों को लहराते हुए देखना एक सुःखद अनुभव रहा। पशुओं के लिए चारे का प्रबंध करना एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसका निश्चित रूप से समाधान किए जाने की जरूरत है। जिस किसान की क्रय शक्ति है वह बाजार से निश्चित रूप आवश्यक मात्रा में चारा खरीद सकता है।
तिल उत्पादन की अर्थव्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण है। यह फसल वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए है। उत्पाद को बेचने के लिए बाजार की कोई कमी नहीं है। क्योंकि तिल की खेती बहुत कम देशों में की जाता है जबकि हर एक देश में इसकी किसी न किसी रूप में खपत रहती है। तिल का तेल खाना बनाने, मिठाई बनाने, मालिश करने, दवाई के रूप में और सौंदर्य प्रसाधन उद्देश्यों के साथ-साथ अन्य बहुत सी जगह प्रयोग किया जाता है। तिल के बीजों का भारत में गज़क, रेवड़ी, लड्डू और तिलकुट जैसी मिठाइयां बनाने में प्रयोग किया जाता है जबकि मध्य-पूर्व देशों में ताहिनी सॉस और पश्चिमी देशों में बन्स और बर्गरों के ऊपर लगाने में इसका प्रयोग किया जाता है। धार्मिक अवसरों पर विभिन्न अनुष्ठानों में भी इसका उपयोग किया जाता है। बाजार में किसानों को अन्य तिलहनों के मुकाबले में तिल के अधिक दाम मिलते हैं।
यह एपिसोड मुझे अलीबाबा और चालीस चोरों की कहानी की याद दिलाता है। जब अलीबाबा कहता है ‘खुल जा सिमसिम’ तो गुफा का मुंह खुल जाता है और गुफा में छिपा खज़ाना दिखाई देता है। यह बुन्देलखण्ड के लिए ‘खुल जा सिमसिम’ वाला ही क्षण हो जो बुन्देलखण्ड के लिए एक वास्तविक मोड़ है। बारिश की बहुत अधिक कमी के कारण इस वर्ष किसानों के लिए आय बहुत ज्यादा आकर्षक नहीं रही लेकिन इसने भविष्य में एक जबरदस्त आशा का संचार कर दिया है। खरीफ के दौरान कृषि की पद्धति ने इस क्षेत्र को हमेशा के लिए परिवर्तित कर दिया है।
(श्री अमित मोहन प्रसाद, उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग में प्रमुख सचिव है और इस लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं। )
शनिवार, 11 अप्रैल 2015
भारतीय रेल फिल्मों के लिए फायदे का सौदा
रेलवे स्टेशन, प्लेटफॉर्म या फिर पटरी पर दौड़ती झुक-झुक करती रेल। फिल्मों के साथ भारतीय रेल का रिश्ता काफी पुराना होने के साथ ही मुनाफे का सौदा भी है। रुपहले पर्दे पर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में शाहरुख-काजोल का प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हुए ट्रेन के साथ अपने प्रेमी से मिलने की बेताबी हो या फिर अपने जमाने की मशहूर फिल्म शोले में ट्रेन पर फिल्माया गया सीन। भारतीय रेलवे फिल्म के निर्माता से ट्रेन या प्लेफॉर्म पर फिल्माए जाने वाले हर सीन के लिए पैसा वसूल करती है। रेलवे ने बकायदा इसके लिए अलग-अलग किराया भी तय कर रखा है। भारतीय रेलवे देश भर के स्टेशनों को तीन श्रेणियों में बांटा है। स्टेशन के हिसाब से फिल्म निर्माताओँ से लाइसेंस फीस वसूल की जाती है। ए श्रेणी के स्टेशन के लिए फिल्म निर्माताओं को 1 लाख रुपया प्रतिदिन के अनुसार भुगतान करना होता है। बी श्रेणी के स्टेशन पर फिल्मों की शूटिंग के लिए फीस के रुप में प्रतिदिन 50 हज़ार रुपया चुकाना होता है। तीसरी कैटगरी यानि सी श्रेणी के स्टेशनों पर शूटिंग के लिए महज 25 हज़ार रुपया प्रतिदिन के हिसाब से पैसे का भुगतान करना होता है। इसके अलावा किसी भी तरह के जोखिम से निपटने के लिए 5-7 करोड़ का बीमा भी कराना होता है। भारतीय रेलवे फिल्म निर्माताओं से बैंक गारंटी के तौर पर 5 लाख रुपये का इंतजाम करने को कहती है। यह रकम बाद में कोई नुकसान नहीं होने पर लौटा दी जाती है। स्टेशन या प्लेटफॉर्म के मुकाबले ट्रेन के भीतर फिल्मों शूटिंग करना ज्यादा महंगा सौदा है। लेकिन ट्रेन में शूटिंग का अपना अलग ही रोमांच होता है।
ट्रेन में फिल्मों की शूटिंग के लिए प्रतिदिन ढ़ाई लाख रुपये खर्च करने होते हैं। आमंतौर पर फिल्मों की शूटिंग के लिए जो ट्रेन मिलती है उसमें 1 इंजन और चार डिब्बे होते हैं। अगर ज्यादा बड़ी ट्रेन की ज़रुरत है तो फिर उसके लिए फिल्म के निर्माता को अतिरिक्त पैसों का भुगतान करना होता है। ट्रेन में शूटिंग के लिए 1 लाख 80 हज़ार रुपये सिक्योरिटी के रुप में जमा कराने होते हैं। इन सबके अलावा यूनिट का खर्चा जो होता है वह अलग से होता है। ये तो बात हुई फिल्मों से रेलवे को होने वाली कमाई की। अब आइए आपको बताते हैं कि किस तरह से रेलवे का इस्तेमाल कर निर्माता देश के कोने-कोने में अपनी फिल्में पहुंचाया करते थे। शुरुआती दौर पर रेलवे ही दूरदराज के शहरों में जल्दी और सुरक्षित तरीके से पहुंचने का एक मात्र जरिया हुआ करती थी। एक लोकेशन से दूसरे लोकेशन जाने के लिए यूनिट के लोग रेलवे का ही इस्तेमाल किया करते थे। तकरीबन 95 वर्षों तक फिल्मों के पचास किलो वाले प्रिंट ट्रेनों से ही पूरे देश भर में भेजे जाते रहे हैं परंतु अब सैटेलाइट बीमिंग के कारण प्रिंट ही खारिज हो गए हैं।
फिल्मों में भारतीय रेल
आजादी के पहले 1941-42 में मेहबूब खान की ‘रोटी’ में रेलवे प्लेटफॉर्म पर एक जनजाति का आदमी चंद पैसों में ‘हिंदू चाय पीता’ है। फिर एक व्यक्ति उसे ‘मुस्लिम चाय’ बेचता है तो वह दोनों चाय बेचने वालों को मारता है कि एक ही चाय दो नाम से बेच रहे हो। यह अनपढ़ मेहबूब खान का जीनियस है कि धर्मनिरपेक्षता का सबक जनजाति वाला दे रहा है। जनजातियों और आदिवासियों में कोई जाति या धर्म भेद नहीं होता, प्रकृति को पूजते हैं। शादियों का आधार प्रेम है और सबसे गरीब जोड़ा भी मात्र चार कुल्हड़ शराब एक-दूसरे के ऊपर डालकर विवाह सूत्र में बंध जाते हैं।
आजादी के पांच वर्ष बाद ‘रेलवे प्लेटफॉर्म’ आई, जिसमें 24 घंटे एक जगह रुकना पड़ा और वहां व्यापार प्रारंभ हो गया। कम्पार्टमेंट का भाईचारा काफूर हो गया। विमल राय का देवदास कम्पार्टमेंट में पहला घूंट शराब का लेता है और इंजन की धधकती आग में कोयला डालने का शाॅट है। इंजन के धुंए का भी कई फिल्मों में प्रतीकात्मक इस्तेमाल हुआ है। विजय आनंद की ‘कालाबाजार’ में ऊपर की बर्थ पर वहीदा रहमान हैं, नीचे देवआनंद गाना गाते हैं, ‘अपनी तोे हर तूफान है, ऊपर वाला जानकर अंजान है।’ मां की मुद्रा उसकी नाराजगी जाहिर करती है तो पति इशारे से कहता है कि ‘ऊपर वाले’ से उसका तात्पर्य ‘ईश्वर’ है, हमारी बेटी नहीं। विजय आनंद तो खूब खेलता था परंतु उम्रदराज सचिन देव बर्मन रेल का गाना बनाना है, सुनते ही प्रसन्न हो जाते थे। रेल की सिटी में माधुर्य खोजना उनके बस की ही बात थी। याद कीजिए आराधना का गीत ‘मेरे सपनों की रानी।’
रेल की छत पर नासिर हुसैन का नायक नाचता था तो मनमोहन देसाई का नायक गुंडों को पीटता था। मेरे लड़कपन की प्रिय नाडिया ट्रेन की छत पर घोड़ा दौड़ाती थी। ट्रेन डकैती का सर्वश्रेष्ठ दृश्य दिलीप की ‘गंगा जमना’ में है, फिर शोले है और बोनी की ‘रूप की रानी’ में भी उत्तेजक दृश्य था। रेल दृश्य कविता की तरह ‘जोकर’ में आया था। एक फिल्म में तलाकशुदा पति-प|ी को जोड़ा समझकर एक कूपा दिया गया और यात्रा में उनके मन में मौजूद प्रेम की चिंगारी ने फिर रिश्ता बना दिया। शाहरुख खान मणिर|म की फिल्म में ट्रेन में ‘छैयां छैयां’ गाते है। ‘दुल्हनिया’ में ट्रेन का इस्तेमाल हुआ है परंतु इम्तियाज अली की ‘जब वी मैट’ के अत्यंत महत्वपूर्ण दृश्य रेल में हैं। चेन्नई एक्सप्रेस’ में भी अनेक हास्य दृश्य ट्रेन में फिल्माए गए हैं। बहरहाल, जावेद अख्तर की एक नज्म में इस आशय की बात है कि चलती ट्रेन से स्थिर दरख्त भागते हुए से लगते हैं। शायद समय भी दरख्त की तरह खड़ा है और हम ही भाग रहे हैं।
भारतीय रेल में रोजाना ऑस्ट्रेलिया की पूरी आबादी के बराबर यानी लगभग 2 करोड़ 30 लाख से ज्यादा यात्री सफर करते हैं लेकिन इस पर भी देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है जिसने अभी तक ट्रेन में पैर तक नहीं रखा.
करोड़ों-अरबों में कारोबार करने वाले फिल्म उद्योग के लिए भी रेल मोटी कमाई का जरिया रही है. कई फिल्म निर्माताओं ने रेल को अपनी फिल्म का अनिवार्य हिस्सा बना कर बॉक्स ऑफिस पर खूब नोट बटोरे हैं. शोले, गदर, चेन्नई एक्सप्रेस रेल को ही पृष्ठभूमि में रख कर बनायी गयी फिल्में हैं, जो अपने-अपने समय की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म है.
फिल्मों में ट्रेन पर फिल्माया क्लाइमेक्स दृश्य
फिल्में समाज का आईना होती हैं. हमारे फिल्म निर्माताओं ने रेल को बड़ी खूबसूरती से अपनी कहानी में पेश किया है. कई अहम फिल्में जिनकी कहानी रेल पर शुरू हुई या रेल के दृश्य ने फिल्म को एक अलग दिशा में मोड़ दिया. हो सकता है कि फिल्मों की शूटिंग रेल पर करने में ज्यादा पैसे खर्च होते हो लेकिन इन दृश्यों के दम पर ही कई फिल्मों ने तगड़ी कमाई की है.
चेन्नई एक्सप्रेस- फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस का नाम ही बड़े रोचकता के साथ लिया जाता है फिल्म के कई महत्वपूर्ण दृश्य और कहानी की शुरुआत ही ट्रेन से होती है. इस फिल्म को लोगों ने खुब पसंद किया और कमाई के मामले में भी फिल्म ने कई रिकोर्ड तोड़ दिये.
राजधानी एक्सप्रेस- टेनिस लिएंडर पेस ने राजधानी एक्सप्रेस नाम की फिल्म से बॉलीवुड में कदम रखा लेकिन राजधानी एक्सप्रेस की रफ्तार से फिल्म पटरी से उतर गयी. फिल्म में पेस ने दमदार भूमिका निभायी लेकिन उनका यह अंदाज लोगों को पसंद नहीं आया. साल 2013 में फिल्म कब रिलीज हुई और कब फ्लॉप हो गयी किसी को पता नहीं चला.
द बर्निग ट्रेन- इस फिल्म का स्टारकॉस्ट बहुत बड़ा था धमेन्द्र, जितेन्द्र, विनोद खन्ना, डैनी के अलावा हिरोईनों की भी एक लंबी फेहरिस्त थी. यह फिल्म 1980 में रिलीज हुई थी. पहली बार ट्रेन के कई शानदार दृश्यों को इस फिल्म के जरिये दिखाया गया. इस फिल्म में स्टारकॉस्ट और कहानी इतनी दमदार थी कि फिल्म आज भी अपना अलग मुकाम बनाने में सफल है.
एक चालीस की लास्ट लोकल - मुंबई की लोकल ट्रेन को आधार बनाकर बनायी गयी इस फिल्म को भी लोगों ने कम पसंद किया. अभय देओल और नेहा धूपिया ने इस फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी.
ऐसी फिल्मों की एक लंबी फेहरिस्त है. इसके अलावा ट्रेन पर कई ऐसे सीन शूट किये गये हैं जिसे लोग काफी पंसद करते हैं. फिल्म गदर का वो दृश्य जिसमें हीरो अपनी प्रेमिको को पाकिस्तान से हिंदुस्तान ला रहा है ट्रेन पर पाक फौजी उसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं. फिल्म शोले को वो दृश्य जिसमें जय और बीरू को थानेदार गिरफ्तार करके जेल ले जा रहा है और ठीक उसी वक्त ट्रेन लूटने के लिए डाकू ट्रेन पर हमला कर देते हैं. जय और बीरू इस लूट को रोकने की कोशिश करते हैं. शाहरुख खान की फिल्म दिल से का गाना छैया , छैया. आमिर की फिल्म गुलाम को वो दृश्य जिसमें आमिर ट्रेन से रेस लगाते हैं.
इन सभी दृश्यों को बाद महानायक राजेश खन्ना की फिल्म अराधना का वो गाना जिसमें शर्मिला टैगोर ट्रेन से जा रही हैं और राजेश मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू गाना गा रहे हैं. हमारे पास ऐसे कई उदाहण है जो दर्शाते हैं कि कहानी को सरल और साधारण ढंग से बयां करने के लिए ट्रेन कितनाा महत्वपूर्ण है. एक्शन, रोमांस, इमोशन सभी तरह के दृश्य बड़े सहज ढंग से ट्रेनों पर फिल्माये गये हैं.
सुनने में तो यह भी आया है कि जितना प्रॉफिट इंडियन रेलवे को बॉलीवुड से होता है उतना तो यात्रियों से भी नहीं होता, और मजे की बात तो यह है कि हर साल बॉलीवुड में किसी न किसी डायरेक्टंर को छुक-छुक गाड़ी की जरूरत पड़ ही जाती है फिर चाहे हिरोइन को ट्रेन की छत पर नचाना हो या फिर हीरो को ट्रेन के आगे दौड़ाना हो. छुक-छुक गाड़ी के इस फंडे पर बॉलीवुड की कई फिल्मों के सीन शूट किए जा चुके हैं, हम आज आपको कुछ ऐसे ही सीन्स के बारे में बताएंगे जिन्हें शूट करना न तो डायरेक्ट के लिए इजी था और न हीरो के लिए. लेकिन आज बॉलीवुड के लिए यह यादगार सीन बन चुके हैं,
गुलाम
इस फिल्म में आमिर खान को ट्रेन के ऑपोजिट डिरेक्शन में दौड़ लगानी थी. यह स्टंट आमिर से जब कहा गया की इस स्टंट के लिए किसी स्टंटमैन को ले लिया जाए तो उन्हों ने ने साफ इंकार करते हुए कहा कि नहीं वह खुद इसे करेंगे और बेहतरीन तरीके से उन्हों ने यह सीन शूट किया। लेकिन हां, शूट के बाद आमिर इतना नर्वस हो गए थे कि कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे.
रोबोट
फिल्म के एक सीन में रजनीकांत को ऐश्वर्या राय को गुंडों से बचाना था. सीन ट्रेन के एक कोच मे शूट किया गया था. बदमाशों से बचाने में रजनीकांत को जो स्टंट देने पड़े उनमें कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी का भी इस्तेनमाल किया गया है. लेकिन सीन इतना रियलिस्टिक है की इसे देख कर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं.
लक
इमरान खान ने अपनी तीसरी ही फिल्म में यह साबित कर दिया था की वो बॉलीवुड में सिर्फ चॉकलेटी बॉय के रोल करने ही नहीं आए बल्कि वो स्टंट सीन में भी खुद को काफी कम्फर्टेबल महसूस करते हैं. इस बात को उन्हों ने लक फिल्म में चलती हुई माल गाड़ी पर दौड़ने वाले सीन को कर के साबित भी कर दिया.
दिल से
इस फिल्म का एक गाना ट्रेन पर ही शूट किया गया है. गाने में किंग खान मलाइका अरोड़ा के साथ ठुमके लगा रहे हैं. आलोचकों की माने तो फिल्म का यह एक ऐसा गाना था जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ थिएटर में इक्टठा हुई थी. बाकी यह फिल्म तो बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं दिखा पाई.
द बर्निंग ट्रेन
यह पूरी फिल्म में ही ट्रेन के पर बनी है. इस फिल्म में एक नहीं बल्कि इतने स्टंट है जिन्होंने गिना नहीं जा सकता. फिल्म में पूरी ट्रेन में आग लग जाती और फिर कैसे तीन मेचोमैन सारे यात्रियों को बचाते हैं यही इस फिल्म का क्लाइमेक्स है।
भारतीय रेल और हिंदी फिल्मों के कनेक्शन की बात की जाए तो दोनों के बीच दशकों पुराना संबध हैं। आजादी से पहले भी ट्रेनों को लेकर फिल्में बनी और आज भी यह सिलसिला जारी है।
सिनेमा के हर दौर में ट्रेन उसका हिस्सा रही है। ट्रेनों को लेकर फिल्मों में सीन फिल्माए गए। रोमेंटिक गाने पेश किए गए। ट्रेन की सीटी की आवाज ने कई फिल्म निर्माताओं को लुभाया। ऎसे सीन की हम कल्पना कर सकते है जब शर्मिला टैगोर टॉय ट्रेन की खिड़की की ओर देखती है और सुपर स्टार राजेश खन्ना गाना गाते है 'मेरे सपनों की रानी कब आएगी तु'।
रोमेंटिक फिल्मों के बादशाह निर्देशक यश चोपड़ा की रोमेंटिक फिल्म 'दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में काजोल व शाहरूख के बीच ऎसे सीन फिल्माए गए। जहां हीरो से मिलने के लिए हीरोइन चलती ट्रेन के पीछे-पीछे काफी देर तक दौड़ती है। इसके अलावा फिल्म 'दिल से' में शाहरूख और मलाइका अरोड़ा खान के बीच 'छैयां-छैयां' गाना शूट किया गया। ट्रेन की छत पर शूट हुआ यह गाना काफी पॉपुलर हुआ।
नए की तलाश में फिल्मनिर्माता
फिल्म 'रूप की रानी चोरो का राजा,शोले,दबंग,अजनबी,आपकी कसम और चेन्नई एक्सप्रेस आदि इस बात का गवाह है कि फिल्मों का ट्रेन से खासा कनेक्शन रहा है।
शनिवार, 28 मार्च 2015
बच्चों की शिक्षा से खिलवाड़ कब तक?
देश के बेहतर कल के लिए स्कूलों में शिक्षा नीति कैसी होनी चाहिए। इस बात को लेकर आज़ादी से लेकर आज तक मंथन का दौर जारी है। लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर बेहद खराब है। इस बात का खुलासा खुद दिल्ली के उप मुख्यमंत्री ने किया। लेकिन शिक्षा नीति को लेकर मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। यहां तक कि मनीष सिसोदिया समेत कई दूसरे नेताओं की ओर से पत्र भेजकर सभी बच्चों को पास करने की नो डिटेंशन नीति को लेकर सवाल उठाए जाने के बाद भी अभी तक स्मृति ईरानी ने किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह जानते हुए भी कि सवाल देश के करोड़ों स्कूली बच्चों के भविष्य से जुड़ा है। ऐसे में अगर दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं है तो देश के दूर-दराज के स्कूलों की हालत क्या होगी। इस बात का बेहतर अंदाजा लगाया जा सकता है। देश में बुनियादी शिक्षा और खासकर गांव में शिक्षा के प्रचार प्रसार को लेकर अनगिनत योजनाएं बनाई गई। इन्हीं में से एक नाम है सर्व शिक्षा अभियान। इस पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन कोई ठोस परिणाम निकल कर सामने नहीं आया। गांवों में स्कूली शिक्षा को लेकर राज्यों के शिक्षा विभाग की अपनी अलग-अलग राय है। दिल्ली सरकार के मुताबिक स्कूली शिक्षा के गिरते स्तर के लिए टीचर और स्कूल प्रबंधन से ज्यादा देश की शिक्षा नीति जिम्मेदार है। वर्तमान में देश में लागू नो डिटेंशन पॉलिसी यानि सभी बच्चों को पास करने की नीति के कारण कक्षा आठ तक बच्चों की पढ़ाई को लेकर कोई चेक बैलेंस नहीं है। दिल्ली में स्कूली शिक्षा से संबंधित एक आंकड़े के मुताबिक पिछले 3 साल का रिकॉर्ड यह बताता है कि करीब 25 फीसदी अपने उस क्लास की परीक्षा में फेल हो जाते हैं लेकिन नो डिटेंशन पॉलिसी यानि सभी बच्चों को पास करने की नीति के तहत सभी बच्चों को पास करना पड़ता है। इस आंकड़े के मुताबिक 2012 में अपने क्लास में फेल होने का आंकड़ा 14 प्रतिशत, जबकि 2013 में यह आंकड़ा 20 प्रतिशत और 2014 में यह आंकड़ा तकरीबन 24 फीसदी तक पहुंच चुका है, यानि करीब 25 फीसदी बच्चे हर साल फेल होते हुए भी पास होते हैं। यह चौकाने वाला आंकड़ा दिल्ली के स्कूलों का है तो देश के दूसरे पिछड़े राज्यों के स्कूली बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। आज भी ग्रामीण इलाको में कई ऐसे स्कूल है जहां शिक्षक नहीं है। अगर शिक्षक है तो स्कूल में बच्चों को बैठने के लिए क्लास रुम नहीं है। बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करते हैं। ऐसे में सभी बच्चों को बिना उचित शिक्षा और बगैर किसी मापदंड के सीधे-सीधे पास करना किस हद तक उचित है। इससे बच्चों में पढ़ने की जिज्ञासा कम होती जा रही है। शिक्षकों में जिम्मेदारी की भावना में कमी आ रही है, क्योंकि सभी बच्चों को पास करना है, लिहाजा शिक्षक भी गंभीरता से बच्चों को नहीं पढ़ाते हैं। पूरे पाठ्यक्रम को लेकर बच्चों में पढाई के प्रति उदासीनता का भाव देखने को मिलता है। इसकी वजह यह है कि उन्हें पता है कि पास तो होना ही है। हमारे यहां पूरी शिक्षा व्यवस्था परीक्षा पद्धति पर आधारित है। लेकिन सबको पास करने की नीति की वजह से अब बच्चों में पढ़ाई के साथ ही परीक्षा को लेकर भी उदासीनता बढ़ती जा रही है। बावजूद इसके बच्चे आसानी से आठवीं क्लास तक तो पास कर जाते हैं। लेकिन 9वीं क्लास में आते ही उनके सामने मुसीबत खड़ी हो जाती है। यही कारण है कि 9वीं क्लास में सबसे ज्यादा बच्चे फेल हो रहे हैं। इससे नई पीढ़ी को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। साथ ही देश और समाज में भी ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है जो पढ़ लिखे तो है लेकिन समझदार नहीं है। लिहाजा शिक्षा के अधिकार कानून में बदलाव लाने की ज़रुरत है, जिसके तहत सभी बच्चों को पास करने की नीति तीसरी क्लास तक ही लागू रहनी चाहिए। इसके बाद चौथी क्लास से शिक्षा के गुणवत्ता के स्तर पर विशेष ध्यान देने की ज़रुरत है। इस बात को ध्यान में रखकर यूपीए सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून में बदलाव करने की तैयारी की थी। लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ भी नहीं किया गया है। केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की एक सब-कमेटी ने इस मामलों में कुछ सिफारिशें की थी। इस सब कमेटी की अध्यक्ष हरियाणा की पूर्व शिक्षा मंत्री गीता भुक्कल थी। लेकिन इस सब-समिति की सिफारिशों पर मोदी सरकार का मंथन जारी है। यूपीए सरकार ने मार्च 2010 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया था। इस कानून में पहली से लेकर आठवीं तक के छात्रों के लिए फेल नहीं करने की नीति लागू की गई थी। इसके बाद छात्रों में पढ़ाई के प्रति बढ़ती लापरवाही को कम करने के लिए पंजाब जैसे राज्यों में दो बार बच्चों को मूल्यांकन परीक्षा से गुजरना होगा। हलांकि ऐसे मूल्यांकन के जरिए भी छात्रों को फेल नहीं किया जाएगा। लेकिन इसके जरिए यह जानने की कोशिश की जाएगी कि बच्चों में पढ़ाई का स्तर क्या है। हाल के सालों में देखने में आया है कि पहली से आठवीं कक्षा तक सभी बच्चों को पास करने की नीति अपनाने के बाद शिक्षक और छात्र पढ़ाई के प्रति गंभीर नहीं हो रहे हैं। इसका असर दसवीं और बारहवीं कक्षा के परिणाम पर भी पड़ा है। पहले जहां दोनों कक्षाओं का वार्षिक रिजल्ट 70 से 75 प्रतिशत तक रहता था, वह अब 50 से 60 फीसदी के बीच पहुंच गया है। देश में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी अच्छी तरह से वाकिफ है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता को बेहतर करने की कोशिशें केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से हाल के दिनों में की गई है। लेकिन उससे भी कही ज्यादा ज़रुरी प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के गिरते स्तर को सुधारने की है। हलांकि सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड तो नो-डिटेंशन पॉलिसी की विफलता को देखते हुए दोबारा से पांचवीं और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा शुरू करने की सिफारिश तक कर चुका है। लेकिन देखना है कि सरकार बच्चों की शिक्षा से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर कब कारगर कदम उठाती है।
गुरुवार, 26 मार्च 2015
मेगा फूड पार्क से कितना फायदा होगा?
देश में विदेशों की तरह मेगा फूड पार्क बनाने के काम को जल्दी ही अमलीजामा पहना दिया जाएगा। सरकार ने भारत के दूर-दराज के इलाकों में जल्द खराब होने वाले खाद्य पदार्थों की बर्बादी को रोकने के लिए सभी राज्यों में मेगा फूड पार्क बनाने का फैसला किया है। लेकिन अहम सवाल यह है कि इससे आम भारतीय को कितना फायदा पहुंचेगा। क्या छोटे व्यापारियों और किसानों को इससे वाकई फायदा है। जानकारों का कहना है कि इससे जल्द खराब हो जाने वाले खाद्य पदार्थों की बर्बादी में कमी आएगी। इस पर गौर फरमाते हुए इस दिशा में और मूल्यवर्द्धन किया गया है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय वर्ष 2008 से ही देश भर में मेगा फूड पार्क योजना क्रियान्वित कर रहा है। सरकार की ओर से मेगा फूड पार्क की स्थापना के लिए 50 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। इसके तहत खेत से लेकर बाजार तक की मूल्य श्रृंखला में खाद्य प्रसंस्करण हेतु आधुनिक बुनियादी ढांचागत सुविधाओं की स्थापना के लिये वित्तीय सहायता दी जाती है। न्यूनतम 50 एकड़ क्षेत्र में स्थापित किये जाने वाला मेगा फूड पार्क क्लस्टर आधारित अवधारणा के तहत काम करता है। यह 'हब एंड स्पोक' मॉडल पर आधारित होता है, जिसके तहत केन्द्रीकृत एवं एकीकृत लॉजिस्टिक प्रणाली का नेटवर्क स्थापित किया जाता है। प्राथमिक प्रसंस्करण केन्द्रों (पीपीसी) के रूप में खेतों के निकट प्राथमिक प्रसंस्करण एवं भंडारण कार्यों के लिए बुनियादी ढांचागत सुविधाएं स्थापित की जाती हैं। केन्द्रीय प्रसंस्करण केन्द्र में अनेक साझा सुविधाओं के साथ-साथ उपयुक्त बुनियादी ढांचागत सुविधाएं भी होती हैं, जिनमें आधुनिक भंडारण, शीत भंडारण, आईक्यूएफ, पैकेजिंग, बिजली, सड़क, जल इत्यादि शामिल हैं। इससे सम्बंधित इकाइयों की लागत काफी हद तक घटाने में मदद मिलती है जिससे वे और ज्यादा लाभप्रद हो जाती हैं। अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करना, बेहतर प्रसंस्करण नियंत्रण के जरिये प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित होना और पर्यावरण एवं सुरक्षा मानकों का पालन किया जाना मेगा फूड पार्कों के अन्य अहम फायदे हैं।
देश भर में स्थापित करने के लिए सरकार द्वारा अब तक 42 मेगा फूड पार्कों को मंजूरी दी गई है। मौजूदा समय में 25 परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। मंत्रालय को 72 प्रस्ताव मिले हैं और इन पर पारदर्शी ढंग से गौर करने के बाद देश के 11 राज्यों के 17 समुचित प्रस्तावों का चयन किया गया है तथा उन पर अमल के लिए मंजूरी भी दे दी गई है।
सरकार के इस कदम से खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए विशाल अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण होगा और इस क्षेत्र के विकास को नई गति मिलेगी। इन 17 नव चयनित मेगा फूड पार्कों से अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे में तकरीबन 2000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित होने का अनुमान है। इसी तरह पार्कों में स्थित 500 खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों में तकरीबन 4000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त सामूहिक निवेश आकर्षित होने का अनुमान है। इनका सालाना कारोबार 8000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है। इन पार्कों के पूरी तरह से कार्यरत हो जाने पर तकरीबन 80000 लोगों के लिए रोजगार सृजित होंगे और इनसे लगभग 5 लाख किसान प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से लाभान्वित होंगे।
इन मेगा फूड पार्कों के समय पर पूरा हो जाने से संबंधित राज्यों में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के विकास को काफी बढ़ावा मिलेगा, किसानों को बेहतर मूल्य मिलने में मदद मिलेगी, जल्द खराब होने वाले खाद्य पदार्थों की बर्बादी घटेगी, कृषि उपज का मूल्यवर्द्धन होगा और खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रोजगार अवसर सृजित होंगे। इतना ही नहीं, ये मेगा फूड पार्क खाद्य उत्पादों की कीमतों को स्थिर रखने के साथ-साथ देश में महंगाई को नियंत्रण में रखने में भी मददगार साबित होंगे।
264 नए शहरों में 831 एफएम चैनलों का बिछेगा जाल
देश के सभी छोटे बड़े शहरों में एफएम रेडियो का जाल बिछाने की तैयारी का काम जोरों पर है। सरकार ने इसके लिए सभी ज़रुरी तैयारियां लगभग कर ली है। इसके तहत 264 नए शहरों में
एफएम रेडियो चैनल खोलने का प्रस्ताव है। जल्द ही ई नीलामी के जरिए इन शहरों में 831 एफएम रेडियो स्टेशन के लिए नीलामी की प्रक्रिया भी पूरी कर ली जाएगी। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (टीआरएआई) ने नए शहरों में एफएम रेडियो चैनलों की नीलामी के लिए आरक्षित मूल्यों की सिफारिश कर दी है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 16 दिसंबर, 2014 को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण को पत्र लिखकर 264 नए शहरों में एफएम रेडियो चैनलों की नीलामी के लिए आरक्षित मूल्यों पर सिफारिश मांगी थी। इन नए शहरों में तीसरे चरण के नीतिगत निर्देशों के तहत एफएम रेडियो चैनलों की नीलामी की जाएगी। तीसरे चरण की नीति के मुताबिक इन शहरों में सभी 831 एफएम चैनलों की नीलामी बढ़ते हुए क्रम में ई-नीलामी प्रक्रिया के तहत होनी है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नीलामी के लिए संबंधित श्रेणी में शहरों की सूची और चैनलों की संख्या मुहैया कराई है।
2011 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक 264 नए शहरों में से 253 शहरों की जनसंख्या एक लाख से ज्यादा है। इन सभी शहरों को बी, सी, और डी श्रेणी में बांटा गया है। इन 253 शहरों में 798 एफएम रेडियो चैनलों की नीलामी होनी है। बाकी 11 शहरों की आबादी एक लाख से कम है और वे जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर क्षेत्र के सीमाई इलाकों में स्थित हैं। इन 11 शहरों में भी 33 एफएम रेडियो चैनलों की नीलामी प्रस्तावित है। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने 6 फरवरी, 2015 को नए शहरों में एफएम रेडियो चैनलों की नीलामी के लिए आरक्षित मूल्यों पर एक परामर्शपत्र जारी किया था। इसके लिए सभी हिस्सेदारों (पक्षों) से 25 फरवरी, 2015 तक लिखित टिप्पणियां मंगाई गई थीं। सभी टिप्पणियों को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण की वेबसाइट पर डाल दिया गया था। इसके बाद भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने नई दिल्ली में 9 मार्च, 2015 सभी हिस्सेदारों की ओपनहाउस बैठक बुलाई थी।
i) परामर्श प्रक्रिया में सभी हिस्सेदारों की टिप्पणियों और इन जुड़े मुद्दों के विश्लेषण के बाद भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण चैनलों के मूल्य तय करने के लिए तीन सरल रूख तय किए। ये निम्नलिखित आधारों पर तय किए गए।
• शहरों की आबादी
• प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी)
• एफएम रेडियो के श्रोताओँ की संख्या
• मौजूदा एफएम रेडियो संचालकों की ओर से कमाया गया प्रति व्यक्ति सकल राजस्व
(ii) हरेक शहर में नीलाम होने वाले रेडियो चैनलों का आरक्षित मूल्य कुल मूल्य का 80 प्रतिशत निर्धारित किया गया है।
(iii) 253 नए एफएम रेडियो चैनलों की नीलामी के लिए जो आरक्षित मूल्य तय किए गए हैं वे अनुलग्नक-1 में दिए गए हैं।
(iv) जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के सीमाई क्षेत्र में एक लाख से कम की आबादी वाले जिन अन्य श्रेणी के ग्यारह शहरों में एफएम चैनलों की नीलामी होनी है वहां तीसरे चरण नीति के तहत प्रति शहर प्रति चैनल के लिए आरक्षित मूल्य 5 लाख रुपये रखा गया है।
इन सिफारिशों को विस्तृत तौर भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण की वेबसाइट www.trai.gov.in. पर देख सकते हैं।
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