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सोमवार, 3 मार्च 2014

आदर्श आचार संहिता और लोकतंत्र

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के आधार हैं। इसमें मतदाताओं के बीच अपनी नीतियों तथा कार्यक्रमों को रखने के लिए सभी उम्मीदवारों तथा सभी राजनीतिक दलों को समान अवसर और बराबरी का स्तर प्रदान किया जाता है। इस संदर्भ में आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) का उद्देश्य सभी राजनीतिक दलों के लिए बराबरी का समान स्तर उपलब्ध कराना प्रचार, अभियान को निष्पक्ष तथा स्वस्थ्य रखना, दलों के बीच झगड़ों तथा विवादों को टालना है। इसका उद्देश्य केन्द्र या राज्यों की सत्ताधारी पार्टी आम चुनाव में अनुचित लाभ लेने से सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग रोकना है। आदर्श आचार संहिता लोकतंत्र के लिए भारतीय निर्वाचन प्रणाली का प्रमुख योगदान है। एमसीसी राजनीतिक दलों तथा विशेषकर उम्मीदवारों के लिए आचरण और व्यवहार का मानक है। इसकी विचित्रता यह है कि यह दस्तावेज राजनीतिक दलों की सहमति से अस्तित्व में आया और विकसित हुआ। 1960 में केरल विधानसभा चुनाव के लिए आदर्श आचार संहिता में यह बताया गया। कि क्या करें और क्या न करें। इस संहिता के तहत चुनाव सभाओं के संचालन जुलूसों, भाषणों, नारों, पोस्टर तथा पट्टियां आती हैं। (सीईसी-श्री के.वी.के. सुन्दरम्) 1962 के लोकसभा आम चुनावों में आयोग ने इस संहिता को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में वितरित किया तथा राज्य सरकारों से अनुरोध किया गया कि वे राजनीतिक दलों द्वारा इस संहिता की स्वीकार्यता प्राप्त करें। (सीईसी-श्री के.वी.के. सुन्दरम्) 1962 के आम चुनाव के बाद प्राप्त रिपोर्ट यह दर्शाता है कि कमोबेश आचार संहिता का पालन किया गया। 1967 में लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों में आचार संहिता का पालन हुआ। (सीईसी-श्री के.वी.के. सुन्दरम्) आदर्श आचार संहिता का विकास तथा 1967 से इसका क्रियान्वयन ·1968 में निर्वाचन आयोग ने राज्य स्तर पर सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठकें की तथा स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए व्यवहार के न्यूनतम मानक के पालन संबंधी आचार संहिता का वितरण किया। (सीईसी- श्री एस.पी.सेन वर्मा) ·1971-72 में लोकसभा/विधानसभाओं के आम चुनावों में आयोग ने फिर आचार संहिता का वितरण किया। (सीईसी- श्री एस.पी.सेन वर्मा) ·1974 में कुछ राज्यों की विधानसभाओं के आम चुनावों के समय उन राज्यों में आयोग ने राजनीतिक दलों को आचार संहिता जारी किया। आयोग ने यह सुझाव भी दिया कि जिला स्तर पर जिला कलेक्टर के नेतृत्व में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में शामिल कर समितियां गठित की जाएं ताकि आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों पर विचार किया जा सके तथा सभी दलों तथा उम्मीदवारों द्वारा संहिता के परिपालन को सुनिश्चित किया जा सके। ·1977 में लोकसभा के आम चुनाव के लिए राजनीतिक दलों के बीच संहिता का वितरण किया गया। (सीईसी- श्री टी.स्वामीनाथन) ·1979 में निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श कर आचार संहिता का दायरा बढाते हुए एक नया भाग जोड़ा जिसमें "सत्तारूढ़ दल" पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान हुआ ताकि सत्ताधारी दल अन्य पार्टियों तथा उम्मीदवारों की अपेक्षा अधिक लाभ उठाने के लिए शक्ति का दुरूपयोग न करे। (सीईसी- श्री एस.एल.शकधर) ·1991 में आचार संहिता को मजबूती प्रदान की गई और वर्तमान स्वरूप में इसे फिर से जारी किया गया। (सीईसी- श्री टी.एन.शेषन) ·वर्तमान आचार संहिता में राजनीतिक दलों तथा उम्मीदवारों के सामान्य आचरण के लिए दिशानिर्देश (निजी जीवन पर कोई हमला नहीं, साम्प्रदायिक भावनाओं वाली कोई अपील नहीं, बैठकों में अनुशासन और शिष्टाचार, जुलूस, सत्तारूढ़ दल के लिए दिशानिर्देश- सरकारी मशीनरी तथा सुविधाओं का उपयोग चुनाव के लिए नहीं किया जाएगा, मंत्रियों तथा अन्य अधिकारियों द्वारा अनुदानों, नई योजनाओं आदि की घोषणा पर प्रतिबंध) है। ·मंत्रियों तथा सरकारी पद पर आसीन लोगों को सरकारी यात्रा के साथ चुनाव यात्रा को जोड़ने की अनुमति नहीं। ·सार्वजनिक कोष की कीमत पर विज्ञापनों के जारी करने पर पाबंदी। ·अनुदानों, नई योजनाओं/परियोजनाओं की घोषणा नहीं की जा सकती। आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले घोषित ऐसी योजनाएं जिनका क्रियान्वयन आरंभ नहीं हुआ है, उन्हें लम्बित स्थिति में रखने की आवश्यकता। ·ऐसे प्रतिबंधों के माध्यम से सत्ता में रहने के लाभ को रोका जाता है तथा बराबरी के आधार पर चुनाव लड़ने का अवसर उम्मीदवारों को प्रदान किया जाता है। ·आदर्श आचार संहिता को देश के शीर्ष न्यायालय से न्यायिक मान्यता मिली है। आदर्श आचार संहिता के प्रभाव में आने की तिथि को लेकर उत्पन्न विवाद पर भारत संघ बनाम हरबंस सिंह जलाल तथा अन्य [एसएलपी (सिविल) संख्या 22724-1997] में 26.04.2001 को उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि चुनाव तिथियों की घोषणा संबंधी निर्वाचन आयोग की प्रेस विज्ञप्ति या इस संबंध में वास्तविक अधिसूचना जारी होने की तिथि से आदर्श आचार संहिता लागू होगी। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि आयोग द्वारा प्रेस विज्ञप्ति जारी करने के समय से आदर्श आचार संहिता लागू होगी। प्रेस विज्ञप्ति जारी होने के दो सप्ताह बाद अधिसूचना जारी की जाती है। उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय से आदर्श आचार संहिता के लागू होने की तिथि से जुड़ा विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गया। इस तरह आदर्श आचार संहिता चुनाव घोषणा की तिथि से चुनाव पूरे होने तक प्रभावी रहती है। आचार संहिता को वैधानिक दर्जाः निर्वाचन आयोग की राय कुछ हिस्सों में आदर्श आचार संहिता को वैधानिक दर्जा देने की बात की जाती है। लेकिन निर्वाचन आयोग आदर्श आचार संहिता को ऐसा दर्जा देने के पक्ष में नहीं है। निर्वाचन आयोग के अनुसार कानून की पुस्तक में आदर्श आचार संहिता को लाना केवल अनुत्पादक (प्रतिकूल) होगा। हमारे देश में निश्चित कार्यक्रम के अनुसार सीमित अवधि में चुनाव कराये जाते हैं। सामान्यतः किसी राज्य में आम चुनाव निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम घोषित करने की तिथि से लगभग 45 दिनों में कराया जाता है। इस तरह आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन संबंधी मामलों को तेजी से निपटाने का महत्व है। यदि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन को रोकने तथा उल्लंघनकर्ता के विरुद्ध चुनाव प्रक्रिया के दौरान सही समय से कार्रवाई नहीं की जाती तो आदर्श आचार संहिता का पूरा महत्व समाप्त हो जाएगा तथा उल्लंघनकर्ता उल्लंघनों से लाभ उठा सकेगा। आदर्श आचार संहिता को कानून में बदलने का अर्थ यह होगा कि कोई भी शिकायत पुलिस/मजिस्ट्रेट के पास पड़ी रहेगी। न्यायिक प्रक्रिया संबंधी जटिलताओं के कारण ऐसी शिकायतों पर निर्णय संभवतः चुनाव पूरा होने के बाद ही हो सकेगा। आदर्श आचार संहिता विकास गतिविधियों में बाधक नहीं अकसर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि आदर्श आचार संहिता विकास गतिविधियों की राह में बाधा बनकर आ जाती है। लेकिन आदर्श आचार संहिता के सीमित अवधि में लागू किये जाने पर भी जारी विकास गतिविधियां रोकी नहीं जाती और उन्हें बिना किसी बाधा के आगे जारी रखने की अनुमति दी जाती है और ऐसी नई परियोजनाएं चुनाव पूरी होने तक टाल दी जाती हैं जो शुरू नहीं हुई हैं। ऐसे काम जिनके लिए अकारण प्रतीक्षा नहीं की जा सकती (आपदा की स्थिति में राहत कार्य आदि) उन्हें मंजूरी के लिए आयोग को भेजा जा सकता है। रिट याचिका संख्या 1361-2012 (डॉ. नूतन ठाकुर बनाम भारत निर्वाचन आयोग) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के 16.02.2012 के निर्णय को यहां उद्धृत करना उपयुक्त होगाः 'चुनाव के बाद जन प्रतिनिधि पाँच वर्ष की अवधि के लिए अपना दायित्व निभाते हैं। विधानसभा या संसद के स्थगन या सदन के पहले भंग हो जाने की स्थिति को छोड़कर चुनाव जन प्रतिनिधियों के कार्यकाल के अंत में होते हैं। पद पर रहते हुए जन प्रतिनिधि का दायित्व है कि वह देश सेवा के लिए अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी तथा निष्पक्षता से करे। यदि वह अपने कार्यकाल के दौरान दायित्व निर्वहन में सफल नहीं होता तो निर्वाचन अधिसूचना जारी होने के बाद लोगों को प्रलोभन देने या लोगों के तुष्टिकरण जैसे उसके कदम अनुचित व्यवहार के उदाहरण होंगे।'

रविवार, 2 मार्च 2014

लोकतंत्र में मतदाता जागरुकता अभियान का महत्व

“हम, भारत के नागरिक, लोकतंत्र में अक्षुष्ण आस्था रखते हुए शपथ लेते हैं कि हम अपने देश की लोकतांत्रिक परम्पराओं तथा स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा शान्तिपूर्ण चुनाव की गरिमा बनाये रखेंगे तथा प्रत्येक चुनाव में निर्भयता तथा धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय, भाषा या किसी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना मतदान करेंगे।” यह शपथ है, जिसे पिछले तीन वर्षों के दौरान नये योग्य मतदाताओं में लोकप्रियता मिली है। इस शपथ ने चुनावों के प्रति युवा भारत की सोच बदल दी है। इसके लिए भारत निर्वाचन आयोग की चरणबद्ध मतदाता शिक्षा तथा निर्वाचक भागीदारी (एसवीईईपी) की पहल धन्यवाद की पात्र है। निर्वाचन आयोग की महत्वपूर्ण पहल के रूप में एसवीईईपी ने मतदान में मतदाताओं की भागीदारी में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए चुनाव प्रक्रिया के प्रत्येक पक्ष को जीवंत किया है। पिछले तीन वर्षों के दौरान मतदाता पंजीकरण, विशेषकर युवाओं में, 10-15 प्रतिशत से बढ़कर 30-35 प्रतिशत हो गया है और 2010 के बाद हुए लगभग सभी राज्य विधानसभा चुनावों में बड़ी संख्या में मतदाता वोट डालने आये। इनमें युवाओं और महिलाओं की भागीदारी अधिक रही। निर्वाचन प्रबंध प्रक्रिया के केन्द्र में मतदाता पंजीकरण तथा निर्वाचक शिक्षा हैं, लेकिन गुणवत्ता तथा मात्रा की दृष्टि से भारत में मतदाता भागीदारी आदर्श भागीदारी वाले लोकतंत्र से अभी भी दूर है। पंजीकरण, मतदाता फोटो पहचान पत्र (ईपीआईसी)/पहचान प्रमाण, मतदान केन्द्र स्थान, ईवीएम उपयोग, चुनाव समय, आदर्श आचार संहिता में क्या करें/क्या न करें, उम्मीदवारों या उनके सहयोगियों द्वारा मतदाताओं के कमजोर वर्ग को प्रभावित करने के लिए धन/बाहुबल तथा शराब का उपयोग जैसे विषयों में मतदाता को क्या जानना चाहिए और वह वास्तविक रूप से क्या जानता है इसमें फर्क है। यह देखा गया है कि मतदाता जागरूकता अभियान हमेशा मतदाताओं को वास्तविक मत देने वाले के रूप में नहीं बदलता। मतदाता जागरूकता में वृद्धि के उद्देश्य को प्राप्त करने, वोट डालने वाले मतदाताओं की संख्य़ा बढाने के लिए निर्वाचन आयोग ने प्रणालीबद्ध मतदाता शिक्षा तथा निर्वाचक भागीदारी (एसवीईईपी) कार्यक्रम शुरू किया है ताकि मतदाता को सूचित, शिक्षित, प्रेरित कि‍या जाए और उनकी मदद की जा सके और भारतीय लोकतंत्र को अधिक भागीदारी वाला तथा सार्थक बनाया जा सके। प्रारंभ भारत निर्वाचन आयोग ने 2010 में अपने हीरक जयंती समारोह में कम निर्वाचक जागृति तथा मतदाताओं के कम बाहर निकलने के विषय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए “मजबूत लोकतंत्र के लिए विशाल भागीदारी” को अपना थीम बनाया था। इसी वर्ष देश का मतदाता भागीदारी संबंधी सबसे बड़ा कार्यक्रम-एसवीईईपी, बिहार विधानसभा चुनावों में प्रारंभ हुआ। सरल शब्दों में एसवीईईपी नीति संबंधी पहल तथा गति‍वि‍धि‍यों की श्रृंखला है, जिनका उद्देश्य निर्वाचन प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी बढ़ाना है। यह तब से सूचना में अंतर, प्रेरणा तथा मदद की कमि‍यों को दूर करने तथा कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या बढ़ाने से जुटा है। 2009 के अंत में झारखंड के चुनावों में आईईसी (सूचना, शिक्षा तथा संचार) का उपयोग हुआ था और इसके बाद 2010 में बिहार विधानसभा चुनावों में चरणबद्ध मतदाता, शिक्षा तथा निर्वाचक भागीदारी (एसवीईईपी) कार्यक्रम आगे बढ़ाया गया और 2011 में तमिलनाडु, केरल, असम, पश्चिम बंगाल, संघ शासित प्रदेश पुड्डुचेरी के विधानसभा चुनाव में भी यह कार्यक्रम जारी रहा। यह पांच राज्यों-उत्तर प्रदेश, गोवा, पंजाब, उत्तराखण्ड तथा मणिपुर में जारी रहा तथा फिर हिमाचल प्रदेश के दो आम चुनाव में तथा 2012 में गुजरात में और 2013 में पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा, मेघालय तथा नगालैण्ड में जारी रहा। अड़चनों का प्रकटीकरण एसवीईईपी के हिस्से के रूप में मतदाता व्यवहार सर्वेक्षण कराये गये। इन सर्वेक्षणों में पंजीकरण में कमी, ईपीआईसी की दूसरी प्रति प्राप्त करने में समस्याएं, मतदाता सूची में नाम सुधारने तथा सूचना संबंधी विभिन्न कमि‍यों तथा वोट देने के लिए कम संख्या में मतदाताओं के निकलने संबंधी निहित कारण सामने आये। सर्वेक्षणों ने कम निर्वाचक भागीदारी वाले निर्वाचक वर्गों का जन सांख्यिकी नक्शा तैयार करने की कोशिश की। लक्षित प्रयास मतदाता को निम्न बातों के बारे में जानना चाहिएः · मतदाता पंजीकरण · ईपीआईसी/पहचान प्रमाण · मतदान केन्द्र स्थल · ईवीएम उपयोग · मतदान का समय · आदर्श आचार संहिता के संबंध में क्या करें तथा क्या न करें · उम्मीदवार या उनके सहयोगियों द्वारा मतदाता को प्रभावित करने के लिए धन, बाहुबल तथा शराब का इस्‍तेमाल शिकायत कैसे दर्ज करें यह देखा गया की मतदान न करने वालों में एक बड़ा हिस्सा युवाओं और महिलाओं का है। मतदाताओं के सभी वर्गों की भागीदारी बढ़ाने के लिए भारत निर्वाचन आयोग ने सूचना तथा प्रेरणा में अंतर को पाटने का निर्णय लिया तथा साथ-साथ मतदाता सूची में नाम दर्ज करने की प्रक्रिया आसान और सहज बनाने तथा मतदान के अनुभव को मतदाताओं के अनुरूप बनाने का काम किया। भारत निर्वाचन आयोग सृजनात्मक रूप से लोगों को निर्वाचन प्रक्रिया में शामिल होने के लिए उत्साहित करने में जुटा है। क्रियान्वयन चरणबद्ध मतदाता शिक्षा तथा निर्वाचक भागीदारी इकाई वोट देने वाली जनता, सिविल सोसाइटी समूहों तथा मीडिया से निरंतर संवाद करने के अतिरिक्त नीति और ढ़ांचा तय करती है, नीतिगत प्रयास करती है और क्रियान्वयन पर निगरानी रखती है। निर्वाचन प्रक्रिया में लोगों को शामिल करने के लिए एसवीईईपी में सूचना, प्रेरणा तथा सहायता (आईएमएफ) जैसे अनेक कदम होते हैं, जिनसे प्रयास किया जाता है। इन कदमों में स्थिति विश्लेषण, व्‍यवस्‍थि‍त नियोजन तथा लक्षित प्रयास को लागू करना है। ये स्थिति विश्लेषण, कार्यक्रम की मध्यावधि समीक्षा तथा निगरानी और अंतिम समीक्षा पर आधारित होते हैं। संचार संबंधी पहलों में मल्टी मीडिया तथा अंतर व्यक्तिक संचार, वास्‍तवि‍क कार्यक्रम तथा लोगों/समुदाय को एकत्रित करने के लिए नई-नई गतिविधियों तथा मतदाता सहायता जैसे कदम शामिल हैं। लोगों में व्यावहारिक परिवर्तन लाने की जटिलताओं को महसूस करते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने पूरी एसवीईईपी प्रक्रिया में सामाजिक सोच तथा सहयोगपूर्ण दृष्टिकोण पर जोर दिया। राज्य तथा जिला स्तर पर एसवीईईपी योजनाओं का नि‍रूपण भारत निर्वाचन आयोग ने राज्यस्तर पर कुछ आंतरिक संगठनात्मक परिवर्तनों की शुरूआत की तथा एसवीईईपी की सभी गतिविधियों को लागू करने में समन्वय के लिए राज्य तथा जिलास्तर पर कोर समूहों का गठन किया। पूरे वर्ष के लिए राज्यस्तर की योजनाएं तथा जिलास्तर की योजनाएं बनानी होती हैं और चुनाव अवधि के लिए गंभीर उप-योजनाएं बनती हैं। योजनाएं आयोग द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय ढांचे के अनुरूप होती हैं लेकिन प्रत्येक स्तर पर उचित लचीलेपन की अनुमति दी जाती है। सहयोग निर्वाचन आयोग ने 18-19 वर्ष के आयु वर्ग में नये मतदाताओं को जोड़ने के लिए शैक्षिक संस्थानों यथा एनवाईकेएस, एनएसएस, एनसीसी जैसे युवा संगठनों के साथ सहयोग किया। आयोग ने निर्वाचन प्रक्रिया के बारे में युवाओं तथा विद्यार्थियों के बीच और अधिक जागरूकता बढ़ाने तथा मतदाता पंजीकरण में उनसे सहायता मांगी। आयोग ने स्वास्थ्य, शिक्षा, डब्ल्यूसीडी, सहकारिता, कल्याण आदि जैसे केन्द्र तथा राज्य सरकारों के विभागों के साथ सहयोग किया, ताकि यह विभाग निर्वाचक शिक्षा तथा निर्वाचक तक पहुंच के लिए अपनी अवसंरचना तथा मानव शक्ति (फील्ड कर्मी) दे सकें। निर्वाचक भागीदारी के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ाने में सरकार तथा निजी मीडिया के साथ-साथ सिविल सोसाइटी तथा मान्य गैर-सरकारी संगठनों के साथ सहयोग करने से मतदाता जागरूकता में मदद मिली। 2013 में भारत निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण (एनएलएमए) के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षऱ किए। इसके बाद से निर्वाचक साक्षरता भारत सरकार के साक्षऱ भारत कार्यक्रम का प्रमुख अंग बन गयी। भारत निर्वाचन आयोग तथा यूएनडीपी के बीच मतदाता शिक्षा के क्षेत्र में करार हुआ। 2013 दिसम्बर से कैंपस एमबस्डर बनाये गये जो कैंपस में विद्यार्थी होता है और आयोग के दूत के रूप में काम करता है तथा शैक्षिक परिसरों में एसवीईईपी कार्यक्रमों में सहायता देता है। आज भारत निर्वाचन आयोग के एसवीईईपी कार्यक्रम को समर्थन देने के लिए निजी मीडिया घराने तथा कॉरपोरेट आगे आ रहे हैं। एसवीईईपी रणनीति के हिस्से के रूप में सहायता एसवीईईपी के तहत पंजीकरण, मतदाता पहचान-पत्र जारी करने तथा चुनाव प्रक्रिया को मतदाता के लिए सुविधाजनक बनाने के तौर-तरीके सुझाने जैसे क्षेत्रों में मतदाताओं को सहायता देने के नये कदम उठाये गए हैं। इन प्रयासों में सभी जिलों में मतदाता हेल्पलाइन, मतदाता सूची में इंटरनेट तथा एसएमएस के जरिये नाम खोजने, मतदाता सहायता बूथ, आदर्श चुनाव केन्द्र ईवीएम से परिचित कराने संबंधी शिविरों, मतदाता पर्ची तथा पहचान-पत्र का दायरा बढ़ाने यानी ईपीआईसी के अलावा अन्य प्रमाणों को मतदान के लिए वैध बनाने जैसे कदम शामिल हैं। राष्ट्रीय मतदाता दिवस भारत निर्वाचन आयोग ने लोगों तक पहुंचने के उद्देश्य से 2011 में अपना स्थापना दिवस 25 जनवरी, को राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाने की प्रथा शुरू की। इसे एसवीईईपी के विभिन्न प्रयासों में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को पूर्ण वास्तविक रूप देने के लिए मतदाताओं की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। युवा पीढ़ी को जिम्मेदार नागरिक का भाव देने तथा उन्हें मताधिकार के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भारत निर्वाचन आयोग राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाने के रूप में आठ लाख से अधिक मतदान केन्द्रों में नये योग्य पंजीकृत मतदाताओं की सहायता करता है। उन्हें फोटो युक्त पहचान-पत्र तथा “गौरवान्‍वि‍त मतदाता-मतदान को तैयार” नारा लिखा बैच दिया जाता है। नये पंजीकृत मतदाता चुनाव में भाग लेकर लोकतंत्र को मजबूत बनाने की शपथ भी लेते हैं। 2011 से पूरे देश में उत्साह के साथ राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है और लोगों तक पहुंचने के लिए गोष्ठियां, साइकिल रैली, मानव श्रृंखला, लोककला कार्यक्रम, मिनी मैराथन, स्पर्धा तथा जागरूकता संबंधी गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। अन्य कदम भारत निर्वाचन आयोग ने जनता के साथ वि‍श्‍वसनीय सम्पर्क स्थापित करने के लिए लोकप्रिय छवि के लोगों की क्षमता की पहचान की और जागरूकता कार्यक्रमों को तेजी देने, तथा मतदाताओं को प्रेरित करने के लिए राष्ट्रीय तथा राज्यस्तर पर लोकप्रिय छवि वाले प्रतिष्ठित व्यक्तियों की नियुक्ति की। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम, एमएस धोनी, साइना नेहवाल तथा एमसी मेरीकॉम राष्ट्रीय प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं। इनके अतिरिक्त राज्यों में ऐसे व्यक्तित्व हैं जो एसवीईईपी के प्रयासों में शामिल हैं। मीडिया तथा गैर मीडिया इकाइयां, लोक सांस्‍कृतिक समूहों, केबल नेटवर्क, मैराथन, रैलियां, मानव श्रृंखलाएं, प्रदर्शनी, होर्डिंग्‍स, पोस्‍टर, पर्चे, सिनेमा स्‍लाइड, नुक्‍कड़ नाटक तथा मै‍जिक शो का उपयोग किया जाता है। भारत निर्वाचन आयोग को अनेक सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठन, सिविल सोसायटी तथा मीडिया निर्वाचक प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए समर्थन दे रहे हैं। कुछ राज्‍यों में आयोग ने लोगों तक संदेश ले जाने के लिए स्‍वयं सेवियों के दस्‍ते को प्रशिक्षत किया है। सूचना आपकी उंगलियों पर आधुनिक टेक्‍नोलॉजी का सबसे बड़ा योगदान लोगों की जिंदगी तक इंटरनेट की पहुंच है। भारत निर्वाचन आयोग ने बदलते समय के साथ रहने के लिए अपनी वेबसाइट को नया रूप दि‍या, ताकि बिना किसी बाधा के नागरिकों को सभी तरह की सूचना और सेवाएं दी जा सकें। जिला तथा राज्‍य स्‍तर पर मतदाताओं की जागरूकता बढ़ाने तथा मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग किया जा रहा है। अधिकतर राज्‍यों के मुख्‍य निर्वाचन कार्यालयों के अपने फेस बुक पेज हैं, ताकि टेक्‍नोलॉजी प्रेमी युवा मतदाताओं तक पहुंचा जा सके। मतदाता का ऑन लाइन पंजीकरण भारत में एकमात्र प्रणाली है, जहां कोई व्‍यक्ति फोटो युक्‍त मतदाता पहचान-पत्र सरकारी कार्यालय गए बिना पा सकता है। वेबसाइट पर ऑन लाइन जनसांख्यिक ब्‍यौरा बदलने तथा आवेदन की नि‍गरानी जैसी सुविधाएं भी प्राप्‍त हैं। ऑन लाइन प्रणाली की सफलता विभिन्‍न राज्‍यों से मिले आंकड़े दिखा रहे हैं। केरल में लगभग 40 प्रतिशत नये मतदाता तथा दिल्‍ली, आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक में 30 प्रतिशत मतदाताओं ने इस प्रणाली के जरिए फोटो युक्‍त मतदाता पहचान-पत्र प्राप्‍त किये। एसवीईईपी- एक नजर में · मतदाता व्‍यवहार सर्वेक्षण · राज्‍य तथा जिला स्‍तर पर एसबीईईपी योजनाओं का नि‍रूपण · राज्‍य स्‍तर के लिए कर्मी · राज्‍य तथा जिला स्‍तर पर कोर समूह · सरकारी विभागों के साथ सहयोग · सीएसओ, मीडिया तथा संगठनों से सहयोग · राष्‍ट्रीय मतदाता दिवस राष्‍ट्रीय तथा राज्‍य स्‍तर पर प्रतिष्ठित लोगों की पहचान भविष्‍य का मार्ग किसी भी मतदाता शिक्षा कार्यक्रम का उद्देश्‍य लोगों को उपयुक्‍त सूचना उपलब्‍ध कराना है। यदि अभियान में सार्वभौमिक रूप से मतदाताओं को कवर किया जाता है, तो यह लोकतंत्र के लिए बड़ी सफलता होगी। एसवीईईपी के बैनर तले मैराथन, रैलियां, जुलूसों, क्‍वि‍ज प्रतियोगिताएं, फिल्‍म प्रदर्शन, नुक्‍कड़ नाटक, एसएमएस तथा हेल्‍प लाइनों के माध्‍यम से पहुंच के प्रयास किये जाते हैं, ताकि मतदान को प्रोत्‍साहित किया जाए। युवाओं के अलगाव, शहरी उदासीनता तथा मतदान के बारे में धीमी गति से नैतिक प्रचार जैसी खाइयों को एनआरआई पंजीकरण, मतदाताओं की कम भागीदारी के लिए सेवा जैसी एसवीईईपी की गतिविधियों से पाटा जा रहा है। भारत निर्वाचन आयोग व्‍यक्ति की मत की शक्ति तथा उसकी अधिकारिता के बीच गहरे आपसी संबंध को जानने के लिए लगातार कार्यक्रम बना रहा है।

शनिवार, 1 मार्च 2014

अंगुली पर पक्की रोशनाई और गौरव का अहसास

पक्की रोशनाई मतदाता की स्‍याही के रूप में जानी जाती है। चुनाव के दौरान इसे मतदाता की अंगुली पर लगाया जाता है, ताकि धोखाधड़ी, अनेक बार मतदान करने तथा गलत व्‍यवहारों को रोका जा सके। यह कोई सामान्‍य स्‍याही नहीं है। एक बार अंगुली पर लगाने के बाद कुछ महीनों तक यह बनी रहती है। इस विशेष पक्की रोशनाई को बनाने का श्रेय कर्नाटक सरकार के प्रतिष्‍ठान मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (एमपीवीएल) को जाता है। यह कंपनी भारत तथा अनेक विदेशी देशों को रोशनाई की सप्‍लाई करती है। भारत में आम चुनाव कराना तथा चुनाव की प्रक्रिया पूरी करना सरकार तथा निर्वाचन आयोग के लिए बड़ी चुनौती रही है। चुनाव संपन्‍न कराने तथा जाली मतदान को समाप्‍त करने के लिए निर्वाचन आयोग ने अंगुली पर पक्की रोशनाई लगाने का उपाय किया। यह रोशनाई मतदाता के बायं हाथ की अंगुली के नाखून पर लगाई जाती है। यह रोशनाई रसायन, डिटर्जेन्ट या तेल से मिटाई नहीं जा सकती और कुछ महीनों तक बनी रहती है। मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (एमपीवीएल) ने भारत निर्वाचन आयोग, राष्‍ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला तथा राष्‍ट्रीय अनुसंधान विकास निगम के सहयोग से इस पक्की रोशनाई के उत्‍पादन तथा गुणवत्‍ता संपन्‍न सप्‍लाई में विशेषज्ञता प्राप्‍त की। भारत में इस तरह की रोशनाई की सप्‍लाई करने वाली यह एकमात्र अधिकृत आपूर्तिकर्ता है। कंपनी को 1962 से एनआरडीसी, नई दिल्‍ली द्वारा विशेष लाइसेंस दिया गया है। मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (एमपीवीएल) की स्‍थापना 1937 में मैसूर के तत्‍कालीन महाराजा स्‍वर्गीय नलवाड़ी कृष्‍णराज ओडियार द्वारा की गई। तब इसका नाम मैसूर लैक एंड पेंट वर्कस लिमिटेड था। 1989 में इसका फिर से नामकरण मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (एमपीवीएल) किया गया। 1962 में निर्वाचन आयोग ने केन्‍द्रीय विधि मंत्रालय, राष्‍ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला तथा राष्‍ट्रीय अनुसंधान विकास निगम के सहयोग से मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड के साथ भारत के सभी राज्‍यों में संसद, विधानसभा तथा अन्‍य आम चुनावों के लिए पक्की रोशनाई की सप्‍लाई करने का करार किया। यह कंपनी 1962 के आम चुनाव के बाद से भारत में चुनाव के लिए पक्की रोशनाई की सप्‍लाई कर रही है। भारतीय चुनाव के लिए अमिट पक्की रोशनाई सप्‍लाई करने के अतिरिक्‍त मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड 1976 से विश्‍व के 28 देशों को रोशनाई निर्यात कर रही है। इन देशों में तुर्की, दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, नेपाल, घाना, पापूआ न्‍यू गिनी, बुरकीना फासो, कनाडा, टोबो, सियेरा लियोन, मलेशिया तथा कंबोडिया आदि शामिल हैं। पक्की रोशनाई के बारे में दिलचस्‍प तथ्‍य 2009 के आम चुनाव में एमपीवीएल ने 10 एमएल आकार की लगभग 20 लाख शीशियों की आपूर्ति की। केवल उत्‍तर प्रदेश में 2.88 लाख शीशियों का उपयोग हुआ। 1.02.2006 से यह रोशनाई मतदाता के बायं हाथ की तर्जनी पर ऊपर से नीचे एक रेखा के रूप में लगाई जाती है। पहले यह रोशनाई नाखून और त्‍वचा के मिलने वाले स्‍थान पर लगाई जाती थी। निर्वाचन निशान में सिल्‍वर नाइट्रेड होता है जो अल्‍ट्रा वायलट प्रकाश पड़ने पर त्‍वचा पर दाग छोड़ता है। इस दाग को धोना असंभव है और यह बाहरी त्‍वचा के उभरने पर ही खत्‍म होता है। इसमें सिल्‍वर नाइट्रेड की मात्रा 7 से 25 प्रतिशत होती है। सामन्‍यत: पक्की रोशनाई बैंगनी होती है। 2005 में सूरीनाम ने विधायी चुनाव में नारंगी रंग का इस्‍तेमाल किया था। छद्म मतदान की स्थिति में छद्म मतदाता के बायें हाथ की मध्‍यमा पर रोशनाई लगाई जाती है।

अतिशा दीपांकर ज्ञानश्री का जीवन आदर्श का प्रतीक

महामहिम दलाई लामा के आध्यात्मिक पिता श्री अतिशा दीपांकर ज्ञानश्री का जन्‍म बंगाल के बिक्रमपुर क्षेत्र के वज्रयोगिनी गांव में, जो अब बांग्लादेश में स्थि‍त है, वर्ष 982 में हुआ था। वे 10वीं- 11वीं सदी के एक महान संत और दार्शनिक थे, जो ज्ञान प्रणालियों के प्रचार - प्रसार के लिए विदेश जाने वाले महान भारतीय शिक्षक भी थे। पिछले सदियों में उन्‍हें भारत में लगभग भुला दिया गया है, लेकिन जिन देशों में बौद्ध धर्म मौजूद है उनमें उन्‍हें लगभग 1000 वर्षों से एक महान व्यक्ति के रूप में पूजनीय माना जाता है। वे शांति, दया, मानवता, सद्भाव, आत्म-बलिदान और मैत्री के प्रतीक माने जाते हैं, जिन्‍होंने ओदनरापुरी, विक्रमशिला, सोमापुरी, नालंदा और अधिकांश विश्वविद्यालयों और मठ परिसरों में धर्म के प्रचार के लिए अपना समस्‍त जीवन समर्पित किया। उन्‍होंने बौद्ध धर्म की नींव डालकर बौद्ध धर्म के ज्ञान और बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान के समावेश में अपनी साधुता से महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है। उनके उपदेशों ने भिक्षुओं के साथ-साथ तिब्‍बत के सामान्‍य जनों के जीवन में नैतिक शुद्धता, आत्म-बलिदान, चरित्र श्रेष्‍ठता और आदर्शवाद, सामाजिक, आर्थिक और सांस्‍कृतिक क्षेत्रों में क्रांति लाने में उत्‍प्रेरक का काम किया। तिब्बत की जनता और राजाओं ने भ्रष्टाचार और पतन की स्थितियों को दूर करने और सुधार लाने के लिए उन्‍हें आमं‍त्रित करने हेतु बलिदान दिये। उन्‍होंने बौद्ध धर्म के थेरावड़ा महायान, और वज्रयान मतों पर अनुदेशों को अपनाया, उसका प्रचार किया और उनमें प्रवीणता प्राप्‍त करने के साथ-साथ वैष्‍णववाद, शैववाद और तांत्रिकवाद और गैर- बौद्धिक मतों सहित संगीत और तर्क शास्‍त्र सहित 64 प्रकार की कलाओं का भी अध्ययन किया और केवल 22 वर्ष की उम्र में इनमें विद्वता प्राप्‍त की। उस समय उन्‍हें भारत में बौद्ध धर्म की सभी परंपराओं में बहुत विद्वान माना जाता था। 31 वर्ष की उम्र में उन्‍होंने प्रसिद्ध सुवर्णद्विपी धर्मकीर्ति के सानिध्‍य में अध्‍ययन के लिए सुमात्रा की खतरनाक यात्रा की थी। देवी तारा उनकी मार्गदर्शक करने वाली आत्‍मा थी, जो उनके जीवन के अंत तक उनके साथ बनी रही। अतिशा सुमात्रा में 12 वर्ष तक रहे और 10 वर्ष से अधिक के गहन प्रशिक्षण के बाद वे मगध वापस आए। उन्‍हें बौद्ध विश्वविद्यालय, विक्रमसिला में कोषाध्यक्ष, या मठाधीश नियुक्त किया गया था। इस विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना बंगाल के राजा धर्मपाल ने की थी, जो प्रसिद्ध के शिखर तक पहुंच गया। 11 सदी में तिब्‍बत के राजा ब्‍यांग चुग ओड ने उन्‍हें आमंत्रित किया, क्‍योंकि तिब्‍बत में बौद्ध धर्म की परंपरा राजा लांग-दास- मा-के क्रूर शासन के कारण लगभग समाप्‍त हो गई थी। तिब्‍बत बौद्धिक परंपराओं में पिछले 10 सदियों से वह महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तित्‍व रहे हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने तिब्‍बत में महायान परंपरा को इसकी श्रेष्‍ठता के साथ ज्ञान के पथ को आलोकित करने के लिए एक दीपक की तरह स्‍थापित किया है। उन्‍होंने बौद्धिचित के माध्‍यम से मन के प्रशिक्षण के रूप में बौद्धिक परंपराओं को पुनर्जीवित, परिष्‍कृत, क्रमबद्ध और संकलित किया है। अतिशा ने 200 से अधिक संस्‍कृत पुस्‍तकों को तिब्‍बती भाषा में लिखा, अनुवाद किया और संपादन किया। उन्‍होंने बौद्धिक धर्मग्रंथों, चिकित्‍सा विज्ञान और तकनीकी विज्ञान पर तिब्‍बती भाषा में अनेक पुस्‍तकें भी लिखीं। अतिशा ने लहासा के निकट नेतांग शहर में अपने जीवन के 9 वर्ष व्‍यतीत किेये, जहां उन्‍होंने संस्‍कृत और तिब्‍बती भाषाओं में लिखे महत्‍वपूर्ण संग्रहों वाली तिब्‍बती पुस्‍तकालय की खोज की। लहासा के निकट एक गांव में 72 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया। नेतांग शहर में उनके स्‍थाई घर के पास उनकी समाधि बनाई गई। उनके परम शिष्‍य द्रोमटोम्‍पा जो उनके प्रमुख शिष्‍य भी थे, उनकी विरासत को संभाला जो बाद में बौद्ध धर्म की कदाम्‍पा परम्‍परा के रूप में विख्‍यात हुए। इस परम्‍परा को बाद में गेलुग परम्‍परा के संस्‍थापक तिब्‍बती शिक्षक सोम-खा-पा ने पुनर्जीवित किया। अतिशा की शिक्षाओं ने मठ परम्‍परा के लिए बहुमूल्‍य योगदान किया और एक सहस्त्र वर्ष पूर्व समुदायों की नींव रखी। अतिशा के जीवन और पवित्रता के अज्ञात पहलुओं के बारे में अनुसंधान, ध्‍यान और उन्‍हें पुनर्जीवित करने के लिए वर्तमान काल की प्रणालियों में वृद्धि करना तथा भारतीय इतिहास के विस्‍मृत पृष्‍ठ को लिखना आवश्‍यक है। आज विश्‍व प्रौद्योगिकी के विकास, लोभ, भूख और हिंसा में बढ़ोतरी से ग्रस्‍त है। मानवीय मूल्‍य और सामाजिक दायित्‍व अपना स्‍थान खो रहे हैं। सदियों की खामोशी के बाद भारत एक अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन और प्रदर्शनी के द्वारा उन क्षणों के निमित्त यह आयो‍जन कर रहा है, जब वे अतिशा, दीपेन्‍द्र, ज्ञानश्री अपने जीवन का बलिदान देते हुए बर्फीले देश में गये थे। अतिशा के प्रमुख शिष्‍य ने कदाम्‍पा संप्रदाय की स्‍थापना की थी, जो बाद में दलाई लामाओं का इतिहास गेलुक्‍पा बन गया। सोंगकप्‍पा के परम विशिष्‍ट शिष्‍य पहले दलाई लामा 'जेन्‍डुनड्रुप' अतिशा के अनुयायी थे। उन्‍होंने अनेक भारतीय मठों में अध्‍ययन किया और वह इं‍डोनेशिया गये, जहां अध्‍ययन के लिए उन्‍होंने खतरनाक यात्रा की तथा विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय में विश्‍व के प्रख्‍यात अध्‍यापक धर्मकीर्ति के नेतृत्‍व अध्‍ययन किया तथा वे इसी विश्‍वविद्यालय में कोषाध्यक्ष/मठाधीश के रूप में लंबे समय तक कार्यरत रहे। वे नेपाल के रास्‍ते तिब्‍बत गए तथा पश्चिमी और केन्‍द्रीय तिब्‍बत (चीन) के कई मठों और मंदिरों में भी उन्‍होंने निवास किया। इन सभी स्‍थानों से प्राप्‍त फोटो प्रलेखनों को भी प्रदर्शित किया गया है। जिन मठों और मंदिरों का उन्‍होंने भ्रमण किया, जहां वे रहे, जहां उन्‍होंने उपदेश दिये और संस्‍कृत के सूत्रों का जनता की भाषा में पाठ किया। वहां उनकी स्‍मृति और स्‍मृति चिन्‍ह संरक्षित हैं। मन रूपी बंजर भूमि में उनकी दैविक दृष्टि आज भी पल्‍लवित हो रही है। आज मनोहर मठों में मन की मरू भूमि से गुजरती हुई ज्ञान रूपी पवित्र धारा बह रही है। दूरदराज के विभिन्‍न विद्वानों, पुरातत्‍वविदों, खोजकर्ताओं और आध्‍यात्मिक नेताओं से प्राप्‍त प्रलेखन योगदान ने अतिशा की घर वापसी की है। अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन और प्रदर्शनी में शांति, कल्‍याण, प्‍यार और बलिदान के प्रतीक अतिशा के बारे में प्रदर्शन किया गया है। उन्‍होंने उपाय की एकता परिज्ञान तथा नागार्जुन, चन्‍द्रकीर्ति से जुड़े सार्वभौमिक मुक्ति की 6 परमिताओं-दान पुण्‍य, ज्ञान, प्रयास, शांति और योग के बारे में उपदेश दिये हैं। इसमें से पांच अतिशा के अनुसार ही हैं, जिनका उपयोग करके मनुष्‍य अपना बौद्धिक विकास कर सकता है। एक सच्‍चे बौद्ध के लिए चरित्र विकास सबसे महत्‍वपूर्ण है। उन्‍होंने लोगों को ज्ञान की स्‍पष्‍ट और प्रगतिशील राह दिखाई है।

इंदिरा गांधी और जनजातीय उत्थान

भारत में अनेक संस्कृतियों और जातियों के बावजूद विविधता में एकता बनी रहने के परिणामस्वरूप राष्ट्र के रूप में इसका सदैव सम्मान बना रहा है । जनजातियां हमारे देश की आवश्यक अंग हैं । हमारे कुछ राष्ट्रीय नेताओं ने जनजातियों के उत्थान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है । पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इनमें से एक है, जो देश के क्षितिज पर एक महान व्यक्ति के रूप में उभरीं । उन्हें जनजातियों से विशेष प्यार था क्योंकि वे लोग उन्हें बहुत सीधे, खुले मन वाले और सच्चे लगते थे । इसीलिए वे हमेशा जनजातियों का विकास चाहती थीं । विश्वास से भरे व्यक्तित्व, सपनों भरी आंखें और प्रशासनिक तथा विकासात्मक कार्यों में उनके प्रमुख चिंतन में जनजातियां शामिल थीं और सरकारी नीतियों तथा कार्यक्रमों पर विचार करते समय वे जनजातियों को सदैव सम्मिलित करती थीं । इंदिरा गांधी के प्रसिध्द 20 सूत्री कार्यक्रम पर अमल करते समय 1974-75 में इन विभिन्न पहलों को शामिल किया गया । जनजातियों को सहायता देने की उनकी इच्छा देश के प्रथम प्रधानमंत्री और उनके पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू से विरासत में मिली थी । उन्हीं की तरह वह भी उदार, खुले विचारों वाली तथा समस्याओं को हल करते समय दूरदर्शितापूर्ण रहती थीं । पं0 नेहरू ने नगालैंड को राज्य का दर्जा दिया था तो इंदिरा ने मणिपुर और मेघालय को राज्य का दर्जा दिया और तत्कालीन केन्द्रशासित प्रदेशों मिजोरम और अरूणाचल प्रदेश को उदारतापूर्वक विकास-धन प्रदान किया । जनजातियों के साथ उनका भावनात्मक संबंध था और जनजातीय जीवन का जो अनुभव उन्होंने हासिल किया, वह मात्र राष्ट्रीय पूंजी की सुविधाओं के लिए नहीं था । बल्कि उन्होंने उन इलाकों का व्यापक रूप से दौरा किया और उनकी झोपड़ियों में जा-जाकर उनके साथ बातचीत की और यहां तक कि अपने मान-सम्मान की परवाह किए बिना जनजातिय लड़कियों के साथ मिलजुलकर नृत्य किया । जनजातीय लोगों ने भी उनमें अपने मित्र और मार्गदर्शक की छवि पाई । इंदिरा गांधी के प्रति उन्होंने भी सम्मान व्यक्त करते हुए अपने नेता के प्रति विश्वास और प्यार प्रदर्शित किया, जो प्राय: चुनावों के दौरान उनकी पार्टी उम्मीदवारों के लिए बड़े-बड़े जनादेशों में बदल जाता था। इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि उनकी जयंती के अवसर पर उत्तर-पूर्व समेत अन्य जनजातीय क्षेत्रों के लोगों ने आत्म-विश्वास निर्माण करने के कार्य में इंदिरा गांधी की गहन निष्ठा को याद किया । उसके तात्कालिक लाभ भी हुआ । मणिपुर और मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला । 1970 के प्रारंभिक वर्षों के दौरान उनके क्षेत्र में यह काल अनेक नवीनताओं को लेकर आया । जो क्षेत्र, इससे पहले हिंसा और जनजातीय संघर्षों से जूझ रहा था, उसे लोग प्यार से सात बहनों (सेवन सिस्टर्स) के नाम से जानने-पुकारने लगे । जनजातियों की समस्याओं को समाप्त करने के लिए इंदिरा गांधी की मार्ग-निर्देशक नीति ने सामयिक व्यवस्था को ऐसे समय अनेक प्रमुख बिंदु प्रदान किए जबकि देश के विभिन्न भागों में नक्सलवादियों की हिंसक कार्रवाइयां गंभीर चुनौतियां पैदा कर रही थीं । इसी तरह उनका मुख्य ध्यान देश के अन्य भागों में जनजातीय समाजों के संपन्न लोगों की ओर भी गया । नवें दशक के अंतिम वर्षों के दौरान जनजातीय मामलों के मंत्रालय का सृजन उनकी दूरदर्शिता का एक निश्चित संकेत है । यह मंत्रालय भारतीय समाज के सबसे कम सुविधा प्राप्त वर्ग अनुसूचित जनजाति के समेकित सामाजिक-आर्थिक विकास की ओर और अधिक ध्यान केन्द्रित करने के उद्देश्य से समन्वित और योजनाबध्द तरीके से कायम किया गया था इंदिरा गांधी ने जनजातियों के शिक्षा को उचित रूप से प्राथमिकता दी थी । इस तथ्य के मद्देनजर तो यह और भी अधिक सराहनीय था कि उन्होंने पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय (एनईएचयू)की स्थापना में व्यक्तिगत पहल की । इस विश्वविद्यालय का मुख्यालय मेघालय की राजधानी शिलांग में है । दशकों से यह विश्वविद्यालय मिजोरम, मेघालय और नगालैंड तीनों राज्यों में शिक्षा का प्रसार कर रहा है । श्रीमती गांधी की राय थी कि सोद्देश्य शिक्षा से आदिवासियों को यह समझने में मदद मिलेगी कि व्यक्तिगत लाभ के लिए क्या चीज़ आवश्यक है । इदिंरा जी परंपरा और संस्कृति के महत्त्व को भी जानती थी तथा उनका मानना था कि अपनी समृध्द सांस्कृतिक परम्परा से लोग बहुत सी बातें सीखेंगे । उन्होंने हमेशा ऐसे आधुनिक भारत का सपना देखा जहां विकास की समग्र परिदृश्य में जनजातियों की पर्याप्त भूमिका सुनिश्चित की जा सके । वे कभी नहीं चाहती थीं कि जनजातियां अपनी सरलता और सांस्कृतिक विरासत का परित्याग कर दें । नगालैंड के पूर्व मुख्यमंत्री और हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल होकिशे सेमा जैसे उनके दौर के अनेक जनजातीय नेताओं के अनुसार इंदिराजी ने न सिर्फ जनजातीय संस्कृति और उनके जीने के ढंग में विशेष दिलचस्पी ली बल्कि उनसे प्रेरणा भी ली । इंदिरा गांधी ने जनजातियों के सपने साकार करने के लिए उन्हें बेहतर जगत की दृष्टि और दिशा प्रदान की ।

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

नदियों में प्रदूषण का बढ़ता दायरा

केन्‍द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) विलीन आक्‍सीजन ओडी, जैव-रासायनिक आक्‍सीजन बीडीओ एवं फिकल कालिफोर्म्‍स आदि के लिए 383 नदियों की 1085 स्‍थानों पर जल गुणवत्‍ता की निगरानी कर रहा है। बीओडी स्‍तर के आधार पर केन्‍द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 150 प्रदूषित फैलाव की पहचान की है। केन्‍द्र सरकार ने गौमुख से उत्‍तरकाशी तक भागीरथी नदी के फैलाव को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र के रूप में घोषित करने के लिए पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत दिनांक 01.07.2011 को प्रारूप अधिसूचना जारी की है। यह प्रारूप मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल दिया गया है, जिस पर प्रकाशन की तिथि से 60 दिनों के अंदर टिप्‍पणियों एवं सुझावों को आमंत्रित किया गया । नदियों का संरक्षण सामूहिक प्रयास है। यह मंत्रालय राष्‍ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के अंतर्गत नदियों के प्रदूषण का उपशमन करने के लिए राज्‍य सरकारों के प्रयासों को आगे बढ़ा रहा है। राष्‍ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत वर्तमान में 20 राज्‍यों के 185 शहरों में 39 नदियों के प्रदूषित फैलाव शामिल हैं। गंगा कार्य योजना (जीएपी) 1985 में शुरू की गयी थी बाद में एनआरसीपी के अंतर्गत अन्‍य मुख्‍य नदियों को शामिल करके इसका विस्‍तार किया गया। शुरू की गयी प्रदूषण उपशमन योजनाओं में अवरोधन, विचलन एवं दूषित पानी का शोधन एवं कम लागत के सफाई कार्य आदि शामिल हैं। इन योजनाओं के अंतर्गत 4729 करोड़ रूपये व्‍यय करके अभी तक 4417 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) की दूषित जल शोधन क्षमता का निर्माण किया गया है। केन्‍द्र सरकार ने समग्र पहुंच को अपना कर गंगा नदी के संरक्षण के लिए एक सशक्‍त प्राधिकरण के रूप में फरवरी 2009 में राष्‍ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनवीबीआरए) का गठन किया था। प्राधिकरण ने यह निर्णय लिया है कि गंगा सफाई मिशन के अंतर्गत 2020 तक यह सुनिश्‍चित किया जाएगा कि गंगा में बिना शोधन किए गए नगर पालिका क्षेत्र के एवं औद्योगिक निस्‍सारणों को गंगा में न बहने दिया जाए। जल-मल प्रबंधन एवं निस्‍तारण हेतु अवसंरचना सृजन भी अन्‍य केन्‍द्रीय योजनाओं जैसे जवाहर लाल नेहरू राष्‍ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन और छोटे एवं मध्‍यम शहरों के लिए शहरी अवसंरचना विकास योजना के साथ-साथ राज्‍य योजनाओं के अंतर्गत योजनाओं के माध्‍यम से किया जा रहा है। सीपीसीबी ने यह पहचान की है कि वीडीओ मानदंड 30 मि.ग्रा./लीटर से अधिक हो रहा है। अट्टावा चोय अडयार, अम्‍लाबाड़ी, भीमा, भ्‍रालु, भोगावो, कुबम, कावेरी, चन्‍द्रभागा, चम्‍बल, दमन गंगा, गोमती, गंगा, गोदावरी, घग्‍गर, डिंडन, इन्‍द्रायणी, कालोग, कुण्‍डालिका, खान कोयना, काली नदी पूर्वी, मूसी, पुला एवं मूथा, मीठी, मारकण्‍डा, नक्‍कावागु, नीरा, पटियाला की राव, पवाना, रामगंगा, सुखना चोय, सतलुज, साबरमती, वेन्‍ना नदी, पश्‍चिमी यमुना नहर, पश्‍चिमी काली, (आंशिक रूप से शामिल) एवं यमुना नदियों के 35 फैलावों में सभी अवसरों पर बीडीओ 6 मि.ली./लीटर से अधिक रहता है। 15 फैलावों में सभी अवसरों पर मानदंड 6 मि.ग्रा./लीटर से अधिक होकर 20-30 मि.ग्रा./लीटर है। ये नदियां हैं – वागड, भादरा, बहाला बान्‍दी, बरेच, घेला एवं किच्‍छा, गिरना, जोजारी, खेतड़ी, कोसी, खारी, कोलक, मिन्‍ढोला, नीरा, नोय्यल, नाम्‍बुल एवं तापी। अगरतला नहर, भीका, डियर बिल, गंगा, गुडगावां नहर, क्षिप्रा, कृष्‍णा, करमाना, लक्ष्मण तीर्थ, मंजिरा, नर्मदा, पूरणा, शेदी, सुबर्णरेखा, टुन्‍गा, तुंगभद्रा, विएन गंगा एवं वर्धा में सभी अवसरों पर 26 फैलावों में मानदंड 6मि.ग्रा./लीटर से अधिक 10-20 मि.ग्रा.-लीटर हो रहा है। 38 स्‍थानों पर बीडीओ मानदंड 6-10 मि.ग्रा./लीटर रहता है। ऐसी नदियां हैं – अरासालार, अर्पा, बेतवा, व्‍यास, भावनी, बुरहीडिहिंग, चम्‍बल, कावेरी, दामोदर, धादर, गंगा, गोदावरी, कालीं किम कालीसोट, कालू, कन्‍हन, कोलार, कृष्‍णा, काठजोड़ी, खारखाला, माही, मारकंडा, नर्मदा, पंचगंगा, पाताल गंगा, रंगावली, सॉख, सिकराना, सिवनाथ, ताम्‍बिरापरानी, उम्‍तरेव, उल्‍हास, वैगई, तापी एवं टोन्‍स। अनास, आम्‍बिका, अरकावती, बालेश्‍वर खाड़ी, बाराकर, ब्राहमणी, भत्‍सा, डिक्‍चू,ध्‍नश्री हेवरा, हुन्‍द्री, कुन्‍डू, कदमबयार, कुआखाई, कावेरी, कृष्‍णा, मानेर, मालप्रभा, मानेखोला, माही, महानदी, तीस्‍ता, मंदाकिनी, नर्मदा, पालर, पेन्‍नार, पनाम, पुझककाल, रिहन्‍द, रानिचू, साबरमती, सरयू, तुंगभद्रा, उल्‍हास एवं यमुना नदियों में ऐसे अन्‍य 36 फैलाव हैं जहां बीडीओ मानदंड 3-6 मि.ग्रा./लीटर रहता है।

सड़क सुरक्षा: हम सबकी जिम्मेदारी

सड़क सुरक्षा एक बहुक्षेत्रीय और बहुआयामी मुद्दा है। इसके अंतर्गत सड़क ढांचे का विकास एवं प्रबंधन, सुरक्षित वाहनों का प्रावधान, विधायन एवं विधि प्रवर्तन, गतिशीलता की आयोजना, स्वास्थ्य एवं अस्पताल सेवाओं का प्रावधान, बाल सुरक्षा, शहरी भूमि इस्तेमाल, आयोजना आदि शामिल है। दूसरे शब्दों में, इसके दायरे में एक तरफ सड़क एवं वाहन दोनों पहलुओं की इंजीनियरी और दूसरी तरफ ट्रामा यानी अभिघात से सम्बन्धित मामलों (दुर्घटना परवर्ती परिप्रेक्ष्य में) के लिए स्वास्थ्य एवं अस्पताल सेवाएं आती हैं। सड़क सुरक्षा सरकार और सिविल समाज के अनेक पक्षों का साझा, बहुक्षेत्रीय दायित्व है। सभी देशों में सड़क सुरक्षा की सफलता सम्बन्धी कार्य नीतियां सभी सम्बद्ध पक्षों से सहायता के व्यापक आधार और संयुक्त कार्ररवाई पर निर्भर करती है। 14 अप्रैल, 2004 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के पूर्ण अधिवेशन में भारत द्वारा सह-प्रायोजित एक प्रस्ताव में सड़क दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या में होने वाली मौतों पर गंभीर चिंता प्रकट की गई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2004 को सड़क सुरक्षा वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा भी की थी और अप्रैल 2004 में ‘‘सड़क सुरक्षा अर्थात किसी भी दुर्घटना से मुक्ति‘‘ के नारे के साथ विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाने की शुरूआत हुई। सड़क यातायात क्षति निवारण के बारे में विश्व बैंक एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2004 की रिपोर्ट में कहा गया था कि सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली क्षति अत्यंत व्यापक है लेकिन यह वैश्विक जन-स्वास्थ्य की उपेक्षित समस्या है। इसके प्रभावकारी और स्थायी समाधान के लिए एकीकृत प्रयासों की आवश्यकता है। रोजमर्रा के आधार पर काम आने वाली जितनी भी प्रणालियां हैं उनमें सड़क परिवहन सर्वाधिक जटिल और यातायात का सर्वाधिक असुरक्षित माध्यम है। हर रोज होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के पीछे की त्रासदी पर मीडिया का ध्यान उतना नहीं जाता, जितना कभी-कभार होने वाली असामान्य प्रकार की त्रासदियों की ओर जाता है। रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया गया था कि यदि अधिक प्रयास और नए उपाय नहीं किए गए तो विश्व भर में 2000-2020 की अवधि में सड़क यातायात के दौरान होने वाली क्षतियों और मौतों की कुल संख्या में 65 प्रतिशत बढ़ोतरी हो जायेगी। कम आय और मध्यम आय वाले देशों में तो इस क्षति में और मृत्यु की घटनाओं में 80 प्रतिशत तक इजाफा होगा। वर्तमान में यातायात दुर्घटनाओं में मरने की अधिक आशंका ‘‘कमजोर और सड़क का इस्तेमाल करने वालों, पैदल यात्रियों, पैडल साइकिल सवारों और मोटर साइकिल सवारों‘‘ की होती है। उच्च आमदनी वाले देशों में, यातायात मौतों में सबसे अधिक संख्या कार का इस्तेमाल करने वालों की है किन्तु, प्रति व्यक्ति जोखिम सड़क इस्तेमाल करने वालों में ही सबसे अधिक है। रिपोर्ट में इस चिंता को रेखांकित किया गया है कि असुरक्षित सड़क परिवहन प्रणाली का जन-स्वास्थ्य और वैश्विक विकास पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। स्वभाविक है कि सड़क हादसों में होने वाली मौतें और क्षतियां अस्वीकार्य हैं और काफी हद तक उन्हें टाला जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों (वर्ष 2002) के अनुसार हर वर्ष दुनिया भर में करीब 11.8 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं, जिनमें से 84,674 मौतें भारत में होती है। 2004 में इन मौतों की संख्या बढ़कर 92618 पर पहुंच गई। भारत में मृत्यु दर 8.7 प्रति एक लाख है जबकि ब्रिटेन में यह 5.6 और स्वीडन में 5.4 तथा नीदरलैंड में 5 और जापान में 6.7 है। प्रति 10,000 वाहनों के संदर्भ में मृत्यु दर भारत में सबसे अधिक 14 है जबकि इसकी तुलना में अन्य देशों में यह 2 है। विकसित देशों में सड़क दुर्घटनाओं की लागत सकल घरेलू उत्पादन के संदर्भ में एक से दो प्रतिशत के बीच आती है। 2002 में योजना आयोग के एक अध्ययन में बताया गया था कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं की सामाजिक लागत 55,000 करोड़ रुपये वार्षिक (2000 के मूल्यों के अनुसार) बैठती है, जो सकल घरेलू उत्पाद का 3 प्रतिशत है। सड़कों में व्यापक निवेश और वाहनों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि को देखते हुए यह अनिवार्य हो गया है कि एक ऐसी प्रणाली कायम की जाय जिसमें सड़क सुरक्षा पर असर डालने वाले सभी विषयों को एकीकृत किया जाय और साथ ही एक ऐसे संगठन के साथ उसे सम्बद्ध किया जो सड़क सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं जैसे इंजीनियरी, शिक्षा, प्रवर्तन, चिकित्सा और व्यवहार विज्ञान की आवश्यकताएं पूरी कर सके।

ODC of my Ph.D Scholar

 Seeing our scholar defending his PhD thesis during ODC was a great moment. This was the result of his hard work. Dr. Sanjay Singh, a senior...