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गुरुवार, 31 मार्च 2016
नैनीताल में एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन ने काम करना शुरु किया
अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में भारत ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है...नैनीताल में एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन ने काम करना शुरु कर दिया है...सबसे खास तो ये रहा कि इस दूरबीन को पीएम मोदी ने बेल्जियम की जमीन से देश को इसे समर्पित किया..अब उम्मीद है कि इसकी मदद से भारत अंतरिक्ष की दुनिया में नए आयाम छूने में कामयाब रहेगा...कुछ इस तरह देश से सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पर बेल्जियम शहर से शुरु हुआ एशिया का सबसे बड़ा ऑप्टिकल टेलीस्कोप....अपनी बेल्जियम यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बेल्जियम के प्रधानमंत्री चार्ल्स मिचेल ने रिमोट टेक्निकल एक्टिवेशन टेक्निक के जरिए नैनीताल में बने 3.6 मीटर व्यास के टेलीस्कोप को एक्टिवेट किया...इस दौरान केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री डॉ हर्षवर्धन देवस्थल में मौजूद रहे। Asia's largest optical telescope at Nainital.करीब 150 करोड़ की लागत से 9 सालों में बनकर तैयार हुआ ये टेलीस्कोप भारत का ही नहीं बल्कि एशिया की ऐसी पहला शक्तिशाली टेलीस्कोप है, जिसकी क्षमता अब तक की सभी दूरबीनों से लगभग 3 गुना अधिक है...इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये दुनिया
के किसी भी कोने से ऑपरेट की जा सकती है। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज़ ने एशिया की सबसे बड़े टेलीस्कोप की स्थापना का काम 1980 में शुरू किया था...देश के कई जगहों पर इसे स्थापित करने की संभावना तलाशने के बाद आख़िरकार नैनीताल से 60 किमी दूर धारी तहसील के देवस्थल को इस मिशन के लिए चुना गया...देवस्थल 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है...लिहाज़ा इस जगह को दूरबीन लगाने के लिए सही पाया गया...केंद्र सरकार ने 2007 में इसके लिए 120 करोड़ रुपये के
प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी.और टेलीस्कोप के निर्माण का काम 2007 में ही शुरु हुआ था। इस टेलीस्कोप से तारों के चुंबकीय क्षेत्र की संरचना को समझने में मदद मिलेगी... आकाशगंगा यानि मिल्की-वे के रासायनिक विकास को समझना आसान हो जाएगा...अब कम रौशनी वाले स्टार्स पर भी रिसर्च हो सकेगी ..यही नहीं तारों के इर्दगिर्द घूमने वाले मलबों पर रिसर्च से ग्रहों के निर्माण को समझने में मदद मिलेगी...और 3.6 मीटर व्यास वाला देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप 360 डिग्री घूमकर अतंरिक्ष की गतिविधियों पर नज़र रखेगा इस टेलीस्कोप को बनाने में 7 फीसदी हिस्सेदारी बेल्जियम की और 93 फीसदी हिस्सेदारी भारत की है ..जो न केवल चारों दिशाओं का समझने में सक्षम है बल्कि क्रिटिकल ऑब्जर्वेशन में मील का पत्थर भी साबित होगी..कुल मिलाकर भारत की झोली में एक और बड़ी कामयाबी है जिसका फायदा पूरी दुनिया को मिलेगा ।
बुधवार, 30 मार्च 2016
निर्यात बढ़ाने की राह में निवेश और मॉनसून बड़ी चुनौती- वित्तमंत्री
केंद्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा कि भारत में आर्थिक सुधार को पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया है। खासकर कराधान सुधार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में उन्होंने कहा भारत इस समय तीन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इनमें सिकुड़ते वैश्विक व्यापार को देखते हुए निजी निवेश को बढ़ाना, दो लगातार खराब मानसून के बाद बेहतर मानसून की आशा ताकि अपर्याप्त बारिश की समस्या से बचा जा सके। वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने सिडनी में ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री सुश्री जुली बिशप से मुलाकात के दौरान ये बातें कहीं।
ऑस्ट्रेलिया के चार दिनों के आधिकारिक दौरे के दूसरे दिन उन्होंने कहा कि भारत में विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी निवेश की बहुत अधिक संभावनाएं है। इनमें अन्य क्षेत्रों के साथ रेलवे, रक्षा उपकरण निर्माण के क्षेत्र शामिल हैं जिनमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी दी गई है। वित्त मंत्री ने मौजूदा भारत सरकार द्वारा 22 महीने के दौरान आर्थिक सुधार के उठाये गए कदमों और पहलों के बारे बातचीत की और ऑस्ट्रेलिया के उद्योगपतियों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया।
इस मौके पर ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री जुली बिशप ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया भारत को विभिन्न तरह की सेवाएं प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इनमें अन्य क्षेत्रों के अलावा नवाचार, अनुसंधान और विकास तथा डिजाइनिंग, व्यावसायिक प्रशिक्षण और कौशल विकास के क्षेत्र में विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया अपनी सेवाएं दे सकता है।
वित्त मंत्री ने बताया कि भारत में नौजवान उद्योगपतियों के बीच नवाचार को बढ़ावा देने के लिए स्टार्ट-अप योजना शुरू की गई है। श्री जेटली ने यूरेनियम की आपूर्ति के लिए नागरिक नाभिकीय सहयोग पर प्रशासनिक व्यवस्था करने के लिए ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री को धन्यवाद दिया।
हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय दौरों को याद करते हुए दोनों नेताओं ने कई क्षेत्रों और द्विपक्षीय सहयोग पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने विभिन्न द्विपक्षीय और वैश्विक विकास पर चर्चा की। दोनों नेताओं ने दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संपर्क के महत्व पर प्रकाश डाला और ऑस्ट्रेलिया में होने वाले फेस्टिवल ऑफ इंडिया तथा बढ़ते पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का स्वागत किया।
मंगलवार, 29 मार्च 2016
सागरमाला: नील क्रांति की ओर बढ़ते कदम
वर्तमान में, भारतीय बंदरगाह मात्रा की दृष्टि से देश के निर्यात व्यापार का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संभालते हैं तथापि, भारत के सकल घरेलू उत्पाद में व्यावसायिक व्यापार में चालू अनुपात केवल 42 प्रतिशत है जबकि विश्व में कुछ विकसित देशों जैसे जर्मनी और यूरोपियन संघ में यह क्रमश: 75 और 70 प्रतिशत हैं इसलिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद में व्यावसायिक व्यापार में इसके हिस्से को बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। केंद्रीय सरकार के ''मेक इन इंडिया'' के प्रयास में यह अपेक्षा की गई है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में व्यावसायिक व्यापार का हिस्सा बढ़ाया जाना जरूरी है तथा विकसित देशों में इसका स्तर प्राप्त कर लिया गया है। भारत बंदरगाहों का बुनियादी ढांचा तथा ढुलाई संरचना के मामले में काफी पीछे है। सकल घरेलू उत्पाद में रेलवे के 9 प्रतिशत तथा सड़कों के 6 प्रतिशत हिस्से के मुकाबले बंदरगाहों का हिस्सा केवल एक प्रतिशत है। इसके अलावा ढुलाई की उच्च लागतों से भारत का निर्यात प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाता है। अंत: सागरमाला परियोजना बंदरगाहों तथा शिपिंग को भारतीय अर्थव्यवस्था में सही स्थान देने तथा बंदरगाहों का विकास करने के लिए बनाई गई है।
भारतीय राज्यों में गुजरात बंदरगाहों के विकास की रणनीति अपनाने में प्रमुख रहा है तथा इसने उल्लेखनीय परिणाम हासिल किए हैं जबकि 1980 में राज्य ने 5.08 प्रतिशत प्रतिवर्ष वृद्धि दर्ज की (राष्ट्रीय औसत 5.47 प्रतिशत था), 1990 में यह बढ़कर 8.15 प्रतिशत हो गया (अखिल भारतीय औसत 6.98 प्रतिशत) तथा इसके पश्चात बंदरगाह-विकास मॉडल से इसमें प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई।
सागरमाला का उद्देश्य
भारत के समुद्री क्षेत्र की वृद्धि में कई बाधाएं सामने आईं जिनमें औद्योगिकीकरण, व्यापार, पर्यटन और परिवहन को बढ़ावा देने में बुनियादी सुविधाओं के विकास में कई एजेंसियों का समावेशन; दोहरी संस्थागत संरचना की उपस्थिति जिससे प्रमुख तथा गैर प्रमुख बंदरगाहों का विकास अलग-अलग तथा बिना जुड़े रहा; प्रमुख और गैर प्रमुख बंदरगाहों से निकासी के लिए अपेक्षित बुनियादी सुविधाओं की कमी; भीतरी प्रदेशों के संपर्क में कमी की वजह से परिवहन तथा कार्गो की लागत में वृद्धि होना; भीतरी प्रदेशों में आर्थिक गतिविधियां तथा शहरी निर्माण के केंद्रों का अल्प विकास; भारत में अंतर्देशीय शिपिंग तथा समुद्री दोहन में कमी, भारत में विभिन्न बंदरगाहों पर अन्य सुविधाओं का अभाव, सीमित तकनीकीकरण तथा प्रक्रियागत बाधाओं जैसी नीतिगत चुनौतियां शामिल हैं।
सागरमाला के तहत इन चुनौतियों का मुकाबला करने पर ध्यान केंद्रित किया जायेगा। इसमें विकास के तीन स्तंभों (1) समन्वित विकास के लिए उपयुक्त नीति तथा संस्थागत सहयोग एवं अंतर-एजेंसी और मंत्रालय/विभागों/राज्यों के समावेश को सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत रूपरेखा तैयार करना तथा इनका सहयोग लेना, (2) बंदरगाह बुनियादी सुविधाओं का बढ़ावा जिनमें इनका आधुनिकीकरण तथा नई बंदरगाहों का गठन भी शामिल है और (3) भीतरी प्रदेशों से तथा इनमें सकुशल निकासी की व्यवस्था करना शामिल है।
सागरमाला के तहत कुशल तथा अर्ध कुशल जनशक्ति को बडे पैमाने पर रोजगार दिया जायेगा। रोजगार औद्योगिक समूहों तथा पार्कों, बडे बंदरगाहों, समुद्री सेवाओं, ढुलाई सेवाओं तथा अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में दिया जायेगा। इसका प्रत्यक्ष तथा परोक्ष प्रभाव पडेगा। जहाजों, क्रूज शिप, जलयानों के निर्माण से औद्योगिक उत्पादन बढेगा और रोजगार का सृजन भी होगा।
बंदरगाह-नेतृत्व विकास की अवधारणा
सागरमाला परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य बंदरगाह के नेतृत्व में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विकास को बढ़ावा देते हुए शीघ्रता, कुशलता और लागत प्रभावी रूप से बंदरगाहों से माल परिवहन के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना है। इसलिए, सागरमाला परियोजना में, अन्य बातों के साथ, एक युक्तिसंगत समाधान के साथ नए विकास क्षेत्रों के उपयोग को विकसित करने के उद्देश्य से रेल विस्तार, अंतर्देशीय जल, तटीय और सड़क के माध्यम से मुख्य आर्थिक केन्द्रों के साथ संपर्क को बढ़ावा दिया जाएगा।
"सागरमाला" के लिए एक व्यापक और समन्वित योजना बनाने के क्रम में, छह महीने के भीतर समूचे समुद्र तट के लिए एक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (एनपीपी) तैयार की जाएगी जो संभावित भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान करेगी और इसे तटीय आर्थिक क्षेत्र (सेज) के नाम से जाना जाएगा। एनपीपी की तैयारी करते समय, सहक्रिया और समाकलन के साथ योजान्वित औद्योगिक गलियारें, समर्पित भाड़ा गलियारें, राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम, औद्योगिक समूह और तटीय आर्थिक क्षेत्र के साथ तालमेल को सुनिश्चित किया जाएगा। चिहिन्त तटीय आर्थिक क्षेत्रों के लिए विस्तृत मास्टर प्लान तैयार किए जाएगें और इनके माध्यम से ही परियोजनाओं की अग्रणी पहचान और उनकी विस्तृत परियोजना रिपोर्टो को तैयार किया जाएगा।
विकास परियोजनाओं के प्रकार की एक व्याख्यात्मक सूची को सागरमाला पहल में शामिल किया जा सकता है। इनमें शामिल हैं: (1) बंदरगाह के नेतृत्व में औद्योगीकरण (2) बंदरगाह आधारित शहरीकरण (3) बंदरगाह आधारित और तटीय पर्यटन और मनोरंजक गतिविधियां (4) शॉर्ट-सी शिंपिंग तटीय शिपिंग और अंतर्देशीय जलपरिवहन (5) जहाज निर्माण, जहाज की मरम्मत और जहाज का पुनर्निर्माण (6) रसद पार्क, भंडारण, समुद्री क्षेत्र/सेवाएं (7) समुद्रतटीय क्षेत्र के साथ समाकलन (8) अपतटीय भंडारण, प्लेटफॉर्मो की ड्रिलिंग (9) खास आर्थिक गतिविधियों जैसे ऊर्जा, कंटेनरर्स, रसायन, कोयला, कृषि उत्पादों आदि में बंदरगाह की विशिष्टता (10) प्रतिष्ठानों के लिए बंदरगाहों के आधार के साथ अपतटीय नवीकरण ऊर्जा परियोजनाएं (11) वर्तमान बंदरगाहों का आधुनिकीकरण और नए बंदरगाहों का विकास। इस रणनीति में बंदरगाह के नेतृत्व में विकास के साथ-साथ बंदरगाह के नेतृत्व में प्रत्यक्ष विकास और बंदरगाह के नेतृत्व में अप्रत्यक्ष विकास दोनों पहलू शामिल हैं।
वर्तमान बंदरगाहों की संचालन कुशलता में सुधार, जो सागरमाला पहल का एक उद्देश्य है, को वर्तमान बुनियादी ढांचे के उन्नयन और उन्नत व्यवस्था में सुधार और आधुनिकीकरण की प्रक्रियाओं और कार्यप्रणालियों के माध्यम से किया जाएगा। कागज रहित और समेकित लेनदेनों को सुनिश्चित करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी और स्वचालन का उपयोग मध्यस्थता का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र होगा। सागरममाला परियोजना के अंतर्गत, तटीय नौवहन का उपयोग बुनियादी ढांचे के विकास और नीति पहलों के समन्वय के माध्यम से बढ़ाया जाएगा।
सागरमाला पहल के तहत तटीय आर्थिक क्षेत्रों में रहने वाली जनसंख्या के दीर्घकालिन विकास को सुनिश्चित भी किया जाएगा। यह कार्य समुदायों से संबंधित और ग्रामीण विकास, जनजातीय विकास और रोजगार सृजन, मत्स्य पालन, कौशल विकास और पर्यटन को प्रोत्साहन देने जैसे राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के मंत्रालयों की मौजूदा योजनाओं और कार्यक्रमों के सहयोग से किया जाएगा। ऐसी परियोजनाओं और गतिविधियों को कोष उपलब्ध कराने के क्रम में एक पृथक निधि के माध्यम से इसके लिए 'समुदाय विकास कोष' तैयार किया जाएगा।
संस्थागत ढांचा
सागरमाला को कार्यान्वित करने के लिए संस्थागत ढांचे हेतु केंद्र सरकार को एक समन्वयक की भूमिका निभानी होगी। सागरमाला परियोजना के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए, यह 'सहयोग संघवाद' के स्थापित सिद्धांतों के अंतर्गत क्रमबद्धता और समन्वय के साथ काम करने हेतु केंद्र, राज्य सरकारों और स्थानीय प्राधिकरणों के लिए एक मंच के तौर पर होना चाहिए। समग्र नीति दिशानिर्देशों और उच्चस्तरीय सहयोग के साथ-साथ योजना और परियोजनाओं के कार्यान्वयन के विभिन्न पक्षों की समीक्षा के लिए एक राष्ट्रीय सागरमाला सर्वोच्च समिति (एनएसएसी) उल्ल्िखित हैं। एनएसएसी की अध्क्षता जहाजरानी मंत्री के द्वारा की जायेगी और इसमें मंत्रालयों के हित धारकों के तौर पर कैबिनेट मंत्री और समुद्री क्षेत्र से जुड़े राज्यों के बंदरगाहों के प्रभारी के तौर पर मुख्यमंत्री/मंत्री सदस्य के रूप में होंगे। कार्यान्वयन की पहल के लिए नीति निर्देश और दिशानिर्देश देते समय यह समिति समग्र राष्ट्रीय संदर्भ योजना (एनपीपी) को स्वीकृति देगी और इन योजनाओं के कार्यान्वयन की प्रगति की समीक्षा करेगी।
सागरमाला से संबंधित परियोजनाओं में समन्वय और सुविधाओं के लिए राज्यस्तर पर प्रभारी तंत्र बनाने के क्रम में, राज्य सरकारें राज्य सागरमाला समिति के गठन का सुझाव देगी। इनकी अध्यक्षता बंदरगाहों के प्रभारी के तौर पर मुख्यमंत्री/मंत्री, संबंधित विभागों और एजेंसियों के साथ करेंगे। राज्य स्तर की समिति एनएसएसी में लिए गए फैसलों को प्राथमिकता के तौर पर देखेगी। राज्य स्तर पर राज्य समुद्री क्षेत्र बोर्ड/राज्य बंदरगाह विभाग, राज्य सागरमाला समिति को सेवा प्रदान करेंगे और एसपीवी (आवश्यकता के अनुसार) और निरीक्षण के माध्यम से व्यक्तिगत परियोजनाओं के सहयोग और कार्यान्वयन के लिए भी जिम्मेदार होंगे। प्रत्येक तटीय आर्थिक क्षेत्र का विकास व्यक्तिगत परियोजनाओं और इनको सहायता देने वाली गतिविधियों के माध्यम से किया जायेगा, जिनकी देखरेख राज्य सरकार, केन्द्रीय मंत्रियों और एसपीवी के द्वारा की जायेगी, जिन्हें राज्य स्तर पर राज्य सरकारों द्वारा अथवा एसडीसी और बंदरगाहों द्वारा आवश्यकता के अनुरूप गठित किया जायेगा।
सागरमाला समन्वय और परिचालन समिति का गठन कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में किया जायेगा, इसमें जहाजरानी, सड़क परिवहन और राजमार्ग, पर्यटन, रक्षा, गृहमंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन, राजस्व विभाग, व्यय, औद्योगिक नीति मंत्रालयों के सचिवों, रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी, एनआईटीआई आयोग सदस्य के तौर पर शामिल होंगे। समिति विभिन्न मंत्रालयों, राज्य सरकारों और कार्यान्वयन के साथ जुड़ी एजेंसियों के बीच सहयोग प्रदान करेगी और राष्ट्रीय महत्व की योजना के कार्यान्वयन, विस्तृत मास्टर प्लानों और परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा करेगी। इसके साथ-साथ यह परियोजनाओं को निधि प्रदान करने और उनके कार्यान्वयन से संबंधित मुद्दों पर भी विचार करेगी। यह समिति परियोजनाओं के कोष के लिए उपलब्ध वित्तीय विकल्पों की भी समीक्षा के साथ-साथ परियोजना के वित्त पोषण/निर्माण/संचालन में सार्वजनिक-निजी साझेदारी की संभावनाओं पर भी विचार करेगी।
केन्द्र स्तर पर सागरमाला विकास कम्पनी को राज्य स्तर/क्षेत्रीय स्तर के विशेष प्रयोजन वाहनों (एसपीवी) की सहायता के लिए कम्पनी अधिनियम 1956 के अंतर्गत गठित किया जायेगा और परियोजनाओं के कार्यान्यन हेतु इक्विटी सहायता के साथ बंदरगाहों के द्वारा एसपीवी का गठन किया जायेगा। व्यक्तिगत क्षेत्रों के लिए दो वर्ष की अवधि के भीतर तैयार विस्तृत मास्टर प्लानों को एसडीसी द्वारा अपनाया भी जायेगा। एसडीसी की व्यवसायिक योजना को 6 महीनों की अवधि के भीतर अंतिम रूप दिया जायेगा। एसडीसी उन सभी शेष परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए कोष प्रदान करेगा जिन्हें किसी अन्य माध्यम से वित्त पोषण नहीं हो सकता है।
परियोजना कार्यान्यन और वित्त पोषण
परियोजनाओं के कार्यान्वयन को प्रारम्भ करने के क्रम में सागरमाला की अवधारणा में कार्यान्वयन हेतु शामिल चिह्नित परियोजनाओं को शुरू करने का प्रस्ताव है। ये चिह्नित परियोजनायें प्रारम्भिक चरण में कार्यान्वयन के लिए उपलब्ध आंकड़ों और सम्भाव्य अध्ययन रिपोर्टों और राज्य सरकारों एवं केन्द्रीय मंत्रालयों द्वारा की गई तैयारियों, दिखाई गई रूचि पर आधारित होंगी।
इन परियोजनाओं के कार्यान्वयन के सभी प्रयासों को निजी क्षेत्रों और सार्वजनिक-निजी साझेदारी जहां तक भी संभव हो के माध्यम से किया जायेगा। सागरमाला वित्तीय वर्ष 2015-16 के लिए परियोजना के प्रारम्भिक चरण में परियोजनाओं के कार्यान्वयन को प्रारम्भ करने के लिए आवश्यक कोष 692 करोड़ रूपये परिलक्षित है। आगामी वर्षों के लिए तटीय आर्थिक क्षेत्रों हेतु विस्तृत मास्टर प्लान के पूर्ण हो जाने के बाद धन की और आवश्यकता को निर्धारित किया जायेगा। एससीएससी के द्वारा स्वीकृत संबंधित मंत्रालयों के द्वारा परियोजनाओं के कार्यान्वयन हेतु इन कोषों का उपयोग किया जायेगा।
सुभाष चंद्र बोस की गुप्त फाइलों को ऑनलाइन किया गया
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से संबंधित 50 गुप्त फाइलों की दूसरी श्रृंखला को बुधवार को सरकार की ओर से सार्वजनिक किया जायेगा। इन फाइलों को केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और नागरिक उड्डयन मंत्री 29 मार्च, 2016 को अपराह्न 3 बजकर 30 मिनट पर वेब पोर्टल www.netajipapers.gov.in पर जारी करेंगे। वर्तमान 50 फाइलों की श्रृंखला में 10 फाइलें प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित हैं, 10 फाइलें गृह मंत्रालय से हैं और 30 फाइलें विदेश मंत्रालय से संबंधित हैं। ये फाइलें 1956 से 2009 की अवधि की हैं।
गौरतलब है कि नेताजी से संबंधित 100 फाइलों के पहली श्रृंखला को प्रारंभिक संरक्षण व्यवहार और डिजिटलीकरण के बाद 23 जनवरी 2016 को नेताजी की 119वीं जयंती के अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सार्वजनिक किया था।
50 फाइलों की वर्तमान श्रृंखला को आम जनता की लगातार हो रही मांग के तहत जारी किया जायेगा और इसे स्वतंत्रता संग्राम की समूची पृष्ठभूमि पर भविष्य में विद्वानों के अनुसंधान की सुविधा के लिए जारी किया जायेगा। इन ज्यादातर फाइलों को विशेष रूप से गठित अभिलेखों से संबंधित विशेषज्ञों की समिति ने जांच के बाद जारी किये हैं। विशेषज्ञों ने निम्नलिखित पहलुओं पर गौर किया :
1 संरक्षण इकाई द्वारा जहां कहीं भी संरक्षण और जरूरी सुधार की जरूरत हो, उसके मुताबिक फाइलों की भौतिक स्थितियों को तय किया गया।
2 वेब पोर्टल www.netajipapers.gov.in को अपलोड करके इसके डिजिटल रिकॉर्ड्स की गुणवत्ता का सत्यापन किया गया।
3 फाइलों के किसी भी डुप्लीकेशन को जांचा गया।
इन बातों को अनुसंधानकर्ताओं और सामान्य जनता के इस्तेमाल के लिए इंटरनेट पर जारी किया जा रहा है।
आगे यह तथ्य भी जोड़ा जा सकता है कि 1997 में भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार ने रक्षा मंत्रालय की ओर से भारतीय राष्ट्रीय सेना (आजाद हिन्द फौज), और 2012 में खोसला आयोग से जुड़ी 1030 फाइलें/आइटम और गृह मंत्रालय से न्यायमूर्ति मुखर्जी जांच आयोग की 759 फाइलें/आइटम प्राप्त कीं। इन सभी फाइलों/आइटमों को पहले ही पब्लिक रिकॉर्ड्स के लिए सार्वजनिक किया जा चुका है।
रविवार, 27 मार्च 2016
2017 विश्वकप फुटबॉल अंडर-17 प्रतियोगिता के भारत में आयोजन को मंजूरी
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत में फेडरेशन इंटरनेशनल डी फुटबॉल एसोसिएशन (फीफा) अंडर-17 विश्वकप 2017 के आयोजन से संबंधित निम्नलिखित निर्णयों को मंजूरी दे दी है।
(क) आयोजन स्थल निम्नलिखित होंगे:
1) जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, नई दिल्ली
2) डी.वाई. पाटिल स्टेडियम, नवी मुंबई
3) जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, कोच्चि
4) सॉल्ट लेक स्टेडियम, कोलकाता
5) जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, फैटोरडा गोवा
6) आईजी स्टेडियम, गुवाहाटी
(ख) खेल विभाग के सचिव, एसएआई के डीजी एवं खेल विभाग के वित्तीय सलाहकार से निर्मित एक समिति को अखिल भारतीय फुटबॉल संघ (एआईएफएफ)/ एफआईएफए के परामर्श से आयोजन स्थलों में किसी परिवर्तन से संबंधित कठिनाइयों को दूर करने के लिए आवश्यक समायोजन करने के लिए अधिकृत किया गया है।
(ग) डिसप्ले बोर्ड आदि समेत उपरिशायी एवं उपकरण के लिए व्यय का दायित्व लिया जा सकता है। बहरहाल, कुल लागत 95 करोड़ रुपये के भीतर होगी जैसी कि पहले मंजूरी दी जा चुकी है।
(घ) कोष की किसी अतिरिक्त आवश्यकता की संभावना में खेल विभाग इस मामले को व्यय विभाग के सामने प्रस्तुत करेगा।
(ङ) खेल मंत्रालय को प्रतियोगिता के संचालन के लिए आयोजन समिति गठित करने के लिए अधिकृत किया गया है।
गोवा में राष्ट्रीय आरोग्य मेला शुरू
भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा गोवा राज्य सरकार एवं भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के सहयोग से आयोजित गोवा में एक राष्ट्रीय स्तर के आरोग्य मेले की शुरुआत पणजी के निकट बैम्बोलीन में गोवा विश्वविद्यालय परिसर में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इनडोर स्टेडियम में हुई। केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री श्रीपद येस्सो नाईक ने गोवा के मुख्यमंत्री श्री लक्ष्मीकांत पारसेकर, गोवा विधानसभा के स्पीकर श्री अनंतशेट, गोवा के उपमुख्यमंत्री श्री फ्रांसिस डिसूजा, वन मंत्री श्री राजेन्द्र अरलेकर, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री सुश्री अलीना सलदान्हा एवं विपक्ष के नेता श्री प्रकाश सिंह राणे की उपस्थिति में इस चार दिवसीय मेले का उद्घाटन किया।
इस अवसर पर केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री श्रीपद येस्सो नाईक ने 21 जून, 2016 को आयोजित होने वाले दूसरे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिए योगा प्रोटोकॉल का विमोचन भी किया।
अपने उद्घाटन भाषण में मंत्री महोदय ने कहा कि आयुर्वेद विश्व को भारत का उपहार है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भारत ने विश्व भर में चिकित्सा की इस पारंपरिक प्रणाली को लोकप्रिय बनाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ एक समझौता किया है। श्री नाईक ने कहा कि भारत ने कैंसर के क्षेत्र में आयुष के तहत एक संयुक्त अनुसंधान के लिए अमेरिका के साथ एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किया है।
केंद्रीय मंत्री ने जानकारी दी कि केंद्र सरकार देश के प्रत्येक जिले में एक आयुष अस्पताल खोलने पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि आयुष मंत्रालय की योजना निकट भविष्य में एक अखिल भारतीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान तथा गोवा में प्रत्येक पद्धति की एक ईकाई स्थापित करने की भी है।
इस चार दिवसीय मेले का उद्देश्य लोगों के बीच आयुष प्रणालियों की प्रभावोत्पादकता, उनकी कम लागत और सामान्य बीमारियों के बचाव एवं उपचार के लिए उपयोग में आने वाले हर्ब एवं पौधों की उपलब्धता के बारे में विभिन्न जन मीडिया चैनल द्वारा उनके दरवाजे पर जानकारी उपलब्ध कराना है जिससे कि सबके लिए स्वास्थ्य का लक्ष्य अर्जित किया जा सके।
एसकेजे/एनआर-1660
भारत को एक मजबूत और दूरदर्शी नेतृत्व की ज़रुरत
भारत का आने वाले दिनों में दशकीय दोहरे अंक की आर्थिक वृद्धि दर प्राप्त करना तय है, साथ ही, एक अरब से अधिक खुशहाल लोगों के साथ उसका एक महाशक्ति बनना भी तय है। अगर हम अधिक पारदर्शिता के साथ बड़े पैमाने की लागत का लाभ उठाएं और शुरू किए गए कार्यों की निगरानी करें तो भारत के पास बहुत जल्द खुद को रुपांतरित करने एवं विकसित देशों के समूह में प्रवेश कर जाने की क्षमता है। केंद्रीय बिजली, कोयला एवं नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री पीयूष गोयल ने ये उद्गार व्यक्त किए। श्री पीयूष गोयल आज यहां युवा भारतीयों पर सम्मेलन ‘एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत का निर्माण ’ सत्र को संबोधित कर रहे थे।
बहरहाल, समाज के निचले स्तर के लोगों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की जरूरत की चेतावनी देते हुए श्री गोयल ने कहा कि ‘हम तक एक आर्थिक महाशक्ति नहीं बन सकते जब तक सामाजिक संरचना के अंतिम पायदान के खड़े व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने, कुशल बनने तथा एक बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन स्तर की दिशा में बढ़ने का समान अवसर प्राप्त नहीं हो जाता।’ मेरे विचार से देश भर के गांव में बिजली सुविधा की कमी एक राष्ट्र के रूप में हमारे लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे लगभग 50 मिलियन भर घर हैं जिनके पास बिजली की सुविधाएं नहीं हैं। अरुणाचल प्रदेश में ऐसे लगभग 808 गांव हैं जहां बिजली सुविधाओं की कमी है। हम जहां अब सिक्किम एवं अरुणाचल प्रदेश में एक ग्रिड का निर्माण करने पर कार्य कर रहे हैं, इसमें अभी वक्त लगेगा। इसलिए हम अंतरिम तौर पर ऑफ-ग्रिड समाधानों पर भी नजर रख रहे हैं।
एक साथ मिलकर कार्य करने के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि ‘सरकार एवं युवाओं को मिलकर कार्य करने, एक साथ विचार करने तथा विचारों को एक साथ क्रियान्वित करने की तथा एक टीम के रूप में काम करने की जरूरत है जिससे कि हम विकास के फलों को सामाजिक संरचना के अंतिम पायदान तक खड़े व्यक्ति तक पहुंचा सकें।’
उन कार्यों का उदाहरण देते हुए, जहां सरकार और युवाओं ने सफलतापूर्वक परिणामों को प्रदर्शित किया हैं कि एक टीम वर्क से उल्लेखनीय लाभ हासिल हो सकते हैं, उन्होंने कहा, ‘उज्जवल डिस्कॉम एंश्योरेंस योजना बिजली क्षेत्र में हाल में की जाने वाली सबसे व्यापक सुधार योजनाओं में से एक है, जिसकी परिकल्पना बिजली मंत्रालय की एक युवा टीम द्वारा की गई थी। ठीक इसी प्रकार एक कोयला तथा बिजली की कमी वाले देश से एक अधिशेष स्थिति तथा कोल इंडिया द्वारा उत्पादन में बढ़ोतरी करने की रुपरेखा कोल इंडिया की सहायक कंपनियों द्वारा बनाई गई थी, जिसने 500 युवा लोगों की एक टीम गठित की थी, जो कि इस उदाहरण के मुख्य वास्तुकार थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि 365 इंजीनियरों से अधिक की एक युवा टीम गांवों के विद्युतिकरण की दिशा में काम कर रही है जहां बिजली की कोई सुविधा नहीं है और उन्होंने 7000 गांव में बिजली पहुंचा भी दी है।’
सरकार द्वारा क्रियान्वित की जा रही विभिन्न योजनाओं पर एक समग्र दृष्टिकोण की जरूरत की विवेचना करते हुए श्री गोयल ने कहा, ‘हमें वर्तमान प्रणाली में अवसरों को पहचानने तथा यह देखने की जरूरत है कि किस प्रकार इन्हें कार्य योग्य एजेंडा में तब्दील किया जा सकता है। अगर भारत सरकार द्वारा पिछले 22 महीनों के दौरान शुरू किए जाने वाली योजनाओं को अलग करके देखा जाए तो उनका बहुत प्रभाव नहीं भी हो सकता है। अगर हम यह महसूस करें किे किस प्रकार ये विभिन्न योजनाएं (स्किल इंडिया कार्यक्रम, जनधन योजना, मुद्रा योजना, मिशन अन्वेषण आदि) एक दूसरे के साथ समेकित हैं और एक साथ मिलकर सहायता संघ के रूप में काम करती हैं तो इन सभी योजनाओं का लाभ भारत के युवाओं के बेहतर भविष्य के सभी कायक्रमों के साथ जुड़ सकता है।’
भारत के पास मौजूद युवाओं की बड़ी आबादी के लाभ की चर्चा करते हुए श्री गोयल ने कहा कि इस बड़ी युवा आबादी का लाभ हमारी सबसे बड़ी ताकत है और हमें इसका फायदा उठाना चाहिए। इस कार्यक्रम तथा भारत के युवा किस प्रकार एक महाशक्ति बनने में एक प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं, के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, ‘मेरे विचार से यह योजना एक रुपांतकारी पहल की धुरी बन सकती है।‘ उन्होंने युवाओं से सरकार के साथ साझेदारी करने और एक साथ मिलजुलकर कार्य करने की अपील की है।
एक विकसित देश की दिशा में आगे बढ़ने में अन्वेषण एवं प्रौद्योगिकियों की सुविधा की मुख्य भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, ‘अगर हम सभी क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ प्रौद्योगिकी प्राप्त करने की तरफ गौर करें जैसा कि बिजली के क्षेत्र में हुआ है, बड़े पैमाने की लागत का इस्तेमाल करें और विनिर्माण को प्रोत्साहित करें तो यह भारत को अकुशल प्रौद्योगिकियों, परिसंपत्तियों एवं प्रचलनों को पीछे छोड़कर तेजी से आगे निकलने तथा ऐसी प्रौद्योगिकियों का उपयोग करने जो ज्यादा कुशल तथा कम उत्सर्जनकारी हो, में मददगार साबित होगा।’
श्री गोयल ने नितिन गडकरी के नेतृत्व के तहत सृजित एक लघु कार्यसमूह का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह कार्यसमूह भारत के 2030 तक शतप्रतिशत बिजली वाहनों की दिशा में रुपांतरित होने की संभावना का मूल्यांकन कर रहा है। यह योजना एक स्व वित्त पोषण पर आधारित होगी तथा उन बचतों के मौद्रीकरण पर विचार करेगी जो उपभोक्ताओं को पेट्रोलियम उत्पादों पर प्राप्त होंगे।
बिजली मंत्रालय के प्रमुख कार्यक्रमों में से एक की सफलता को रेखांकित करते हुए श्री गोयल ने कहा, ‘भारत के एलईडी कार्यक्रम का परिणाम वार्षिक रूप से 100 बिलियन यूनिट की बचत के रूप में सामने आएगा तथा उपभोक्ताओं को इसका सीधा लाभ मिलेगा। आर्थिक रूप से यह सालाना 6.5 बिलियन डॉलर की बचत में सहायक होगा। पर्यावरण चिंताओं को देखते हुए यह कार्यक्रम लगभग 80 मिलियन टन कार्बन डायआक्साइड में कमी लाएगा। यह कार्यक्रम प्रदर्शित करता है कि किस प्रकार बड़े पैमाने की किफायत का लाभ एलईडी बल्बों की कीमत में उल्लेखनीय कमी के रूप में प्राप्त हो सकता है।’
एक महाशक्ति की दिशा में देश के आगे बढ़ने में ऊर्जा सुरक्षा के महत्व की चर्चा करते हुए श्री गोयल ने कहा कि भारत के पास आज उत्पादित होने वाली बिजली से 150 प्रतिशत अधिक बिजली उत्पादन की क्षमता है। उन्होंने कहा कि अगर हम उन परिसंपत्तियों का इस्तेमाल करें जिनका उपयोग नहीं हो पाता तो भारत का ऊर्जा के लिहाज से सुरक्षित होना तय है। उन्होंने कहा, ‘अब हम तेल एवं गैस पर अपनी निर्भरता कम करने पर काम कर रहे हैं। इसके साथ-साथ हम अपने खपत को कम करने के कार्यक्रम पर भी कार्य कर रहे हैं। हम ऐसे खपत को बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं जिसे पेट्रोल के साथ मिश्रित किया जा सके। अब हम पेट्रोल के साथ 5 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और अगले स्तर पर इसका किसानों की आय पर एक रुपांतकारी प्रभाव पड़ेगा।’
एसकेजे/एनआर-1656
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